Tuesday, January 13, 2026
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 (बॉलीवुड के अनकहे किस्से) गुलशन ग्रोवर को ऐसे मिली फिल्म सदमा

अजय कुमार शर्मा

बैडमैन के नाम से विख्यात गुलशन ग्रोवर दिल्ली के एक बेहद गरीब परिवार में जन्मे और काफी संघर्ष के बाद उन्होंने सिनेमा में अपनी यादगार पहचान बनाई। 500 से ज्यादा फिल्में कर चुके गुलशन ग्रोवर केवल बॉलीवुड में ही नहीं बल्कि हॉलीवुड में भी बेहद सक्रिय रहे हैं । उन्होंने दुनिया भर के कई देशों की फिल्मों में काम किया है। 1970 के दशक में वह दिल्ली के त्रिनगर से अपना एक्टिंग करियर शुरू करने बंबई (अब मुंबई ) पहुंचे । माता- पिता ने उन्हें वहां भाग्य आजमाने के लिए केवल छह महीने दिए। वे बांद्रा के प्रसिद्ध मरीना गेस्ट हाउस में ठहरे जो उस समय फिल्मों में काम तलाशने वाले उन जैसे हजारों युवाओं के लिए एक सस्ता और सुविधाजनक अड्डा हुआ करता था।

तीन महीने के संघर्ष के दौरान उन्होंने महसूस किया कि एक्टर के रूप में अपनी ताकत और अपनी कमजोरियों को समझने के लिए उन्हें मुकम्मल ट्रेनिंग की जरूरत है। ट्रेनिंग में ज्यादा पैसे लगने थे, इसलिए पैसे तथा माता- पिता से अनुमति लेने वह दिल्ली वापस आए और एफ.टी.आई.आई से अभिनय का कोर्स करने के इरादे से पुणे पहुंच गए । लेकिन छात्रों की हिंसक हड़ताल के कारण यह पाठ्यक्रम बंद कर दिया गया था। तभी इसी इंस्टीट्यूट के एक्टिंग गुरु रोशन तनेजा ने अपना स्वयं का एक साल का एक्टिंग कोर्स शुरू किया। गुलशन ने रोशन तनेजा के एक्टिंग स्कूल में दाखिला ले लिया। इस बैच में अनिल कपूर, मजहर खान, सुरेंद्र पाल सिंह, मदन जैन, राजहंस सिंह और राजेश माथुर उनके साथी थे। वसीम खान उर्फ विक्की भी थे जो शशि कपूर के ड्राइवर के बेटे थे और शहजाद अस्करी भी जो अभिनेत्री मुमताज के भाई थे। कुल मिलाकर इस बैच में 20 छात्र थे। यहां रोशन तनेजा के अलावा एफ.टी.आई.आई से एक्टिंग का कोर्स करके निकले मिथुन चक्रवर्ती, ओम पुरी, गीता खन्ना और बेंजामिन गिलानी भी पढ़ाने आते थे।

एक साल खत्म होने के बाद काम की तलाश शुरू हुई । कोई काम न मिलने पर वे तनेजा जी के इंस्टीट्यूट में पढ़ाने भी चले जाते थे जिससे कुछ खर्चा- पानी निकल आता था। इसी बुरे वक्त में अनिल कपूर उनकी परेशानियां देखकर उन्हें दक्षिण की एक फिल्म में काम दिलाने का लालच देकर अपने साथ ऊटी ले गए। जबकि सच यह था कि अनिल कपूर उनका मन बदलने के लिए उन्हें अपने साथ वहां ले आए थे और फ्लाइट का टिकट भी उन्होंने खुद लिया था न कि किसी फिल्म निर्माता ने। होटल जाते समय यह सच जानकर गुलशन ग्रोवर को अनिल पर बहुत गुस्सा आया लेकिन अनिल उन्हें मन की भड़ास निकालने का कोई मौका न देकर जल्दी से होटल की लॉबी में घुस गए और वहां बैठे कई दक्षिण भारतीय सज्जनों से उन्हें मिलवाने लगे। इससे गुलशन का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था और उनकी आंखें अंगारे जैसी दहकने लगीं । वहीं बैठे एक सज्जन बालू महेंद्र का ध्यान उनकी दहकती आंखों की ओर गया जो मणिरत्नम के फोटोग्राफर थे। इस सब से बेखबर गुलशन ग्रोवर अनिल से लड़ने उनके रूम में चले गए।

अनिल जब रूम में आए तो दो लोग यानी मणिरत्नम और बालू महेंद्र उनके साथ थे। गुलशन अपने गुस्से को शांत करते हुए कमरे से बाहर निकल आए। बाद में उन्हें पता चला कि उनके जाने के बाद बालू ने अनिल से कहा की उनके दोस्त का चेहरा काफी दिलचस्प है और आंखों से अंगारे बरसते हैं। उन्होंने अनिल से पूछा क्या यह एक्टिंग कर सकता है तब उन्होंने बताया कि वे दोनों एक्टिंग स्कूल में क्लासमेट थे और वह एक बेहतरीन एक्टर है तब कहीं जाकर तमिल सिनेमा के विख्यात सिनेमेटोग्राफर, एडिटर, डायरेक्टर और राइटर ने अपनी पहली हिंदी फिल्म सदमा में उन्हें खलनायक बलुआ का रोल दे दिया। कमल हासन और श्रीदेवी की इस हिंदी फिल्म की काफी चर्चा हुई और गुलशन ग्रोवर का काम और नाम दोनों चमक उठे।

चलते चलते

गुलशन ग्रोवर की साइन की हुई पहली फिल्म रॉकी थी जो उन्हें तनेजा के एक्टिंग स्कूल में पढ़ाने के दौरान मिली थी क्योंकि तब संजय दत्त ने अभिनय की ट्रेनिग वहीं ली थी। रॉकी में उन्हें संजय दत्त के दोस्त जग्गी का रोल दिया गया था जो कि एक कॉमिक लव गुरु है जिसकी हर सलाह हमेशा फेल होती है। संजू के यह सभी दोस्त बाइक पर साथ-साथ धूम मचाते हुए और कई स्टंट करते नजर आते हैं। बाइक पर ही इन पर एक गीत भी फिल्माया गया था। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले जब मोटरसाइकिल स्टंट की तैयारी चल रही थी तब अचानक दत्त साहब को लगा कि गुलशन सहित अन्य दोस्त बाइक चलाने में ज्यादा कंफर्टेबल नहीं हैं । इसका कारण जानने पर पता चला कि उन सभी पर अपनी-अपनी बाइक नहीं हैं जिस कारण वह केवल स्टंट मास्टर के साथ थोड़ी देर ही रिहर्सल कर पाते हैं। यह जानते ही दत्त साहब ने तुरंत उन्हें और उनके अन्य दोस्तों के लिए दिन-रात चलाने और अपने पास रखने के लिए बाइकें खरीद कर दे दीं।

(लेखक, राष्ट्रीय साहित्य संस्थान के सहायक संपादक हैं। नब्बे के दशक में खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए ख्यातिलब्ध रही प्रतिष्ठित पहली हिंदी वीडियो पत्रिका कालचक्र से संबद्ध रहे हैं। साहित्य, संस्कृति और सिनेमा पर पैनी नजर रखते हैं।)

मुकुंद

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