प्रयागराज (हि.स.)। बुद्ध पूर्णिमा के दिन स्पर्श ध्यान (मेडिटेशन) करने का विशेष महत्व हैं। इससे शारीरिक और मानसिक लाभ होता है। ध्यान भारतीय संस्कृति का अति प्राचीन हिस्सा है, जो हमारे श्रेष्ठ पूर्वज करते थे। तनाव व डिप्रेशन से बचने और खुद को अंदर से ठीक करना, मन को शांत रखने की क्रिया ही मेडिटेशन है।
एसकेआर योग एवं रेकी शोध प्रशिक्षण और प्राकृतिक संस्थान प्रयागराज रेकी सेंटर पर शुक्रवार को जाने-माने स्पर्श चिकित्सक सतीश राय ने बुद्ध जयंती के उपलक्ष्य पर लोगों को स्पर्श ध्यान का अभ्यास कराया। तत्पश्चात् उन्होंने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि ज्यादातर लोगों का मानना है कि ध्यान महात्मा बुद्ध के समय से है, जबकि ध्यान का उल्लेख हमारे वेद ग्रंथों में भी मिलता है जो आगे चलकर लुप्त हो गई थी। भगवान बुद्ध ने लुप्त हुई इस पद्धति को पुनर्जीवित किया तथा जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। इसे लोगों को जीवन जीने की कला के रूप में सर्वसुलभ कराया। भगवान महावीर ने भी ध्यान के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में ध्यान की दो विधियां ज्यादा प्रचलित है भगवान बुद्ध की ध्यान विधि विपश्यना और महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग। भगवान बुद्ध ने वर्षों पूर्व विपश्यना विधि से ध्यान कर बुद्धत्व ज्ञान प्राप्त किया था। विपश्यना में स्पर्श-ध्यान क्रिया को आत्म निरीक्षण और आत्म शुद्धि का सबसे सरल पद्धति माना। उन्होंने कहा कि किसी भी विधि से ध्यान करने वालों को यम नियम का पालन करना जरूरी है। यम नियम के अनुसार सत्य बोलना, मन, वचन, कर्म, वाणी से अहिंसक बनना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, नशे से दूरी बनाना है।
सतीश राय ने कहा कि योग में विभिन्न अभ्यास शामिल है। जैसे शारीरिक आसन, नियंत्रित श्वांस (प्राणायाम), ध्यान आदि। वर्तमान में लोग सीधे ध्यान सीखते हैं। इसे लोग सरल और आसान समझते हैं। जब कोई व्यक्ति योग करता है तो वह शारीरिक व्यायाम की तुलना में काफी कम ऊर्जा खर्च करता है जबकि सामान्य व्यायाम के मुकाबले योग से काफी अधिक लाभ होता है।
विद्या कान्त
