– गांवों की चौपालों पर कभी महीने भर तक सजती थी फागं की महफिलें
हमीरपुर(हि.स.)। फागुन का महीना शुरू होते ही गांवों की चौपालों पर फाग गीतों के बोल गूंजने लगते थे। और यह सिलसिला होली जलने के एक सप्ताह बाद तक लगातार चलता रहता था। लेकिन, युवा पीढ़ी का मोहभंग होने के चलते अब फाग गायन की कला अपना अस्तित्व खोती जा रही है।
कभी बुंदेलखण्ड में होली के अवसर पर फाग गायकी से सजने वाली चौपाले सूनी हो चली हैं। युवा पीढ़ी का इससे मोहभंग होता जा रहा है। जिससे बुजुर्गाे में अच्छा खासा मलाल है। अब युवा पीढ़ी कैसेट के माध्यम से फागों का लुत्फ उठाती है। कभी बुंदेलखंड में ईश्वरी की फागे गूंजती थी। लेकिन अब विलुप्त सी होती जा रही हैं।
वैसे तो उत्तर प्रदेश के अनेक भागों में फाग गायन की कला अनूठी है लेकिन, बुंदेलखण्ड में फाग गायन का अलग ही महत्व था। होली जलने से एक सप्ताह पहले गांव-गांव में फाग की महफिल जमती थी। लेकिन अब इक्का-दुक्का स्थानों पर ही फगुवारे नजर आते हैं। फाग गायन में रुचि रखने वाले बुजुर्ग बताते हैं कि होली जलने से पहले फागों का गायन शुरु होता था।
होली जलते समय फाग गायक अपनी-अपनी टोली लेकर मौके पर पहुंचते थे। जिससे होलिका दहन में खासी रोचकता दिखाई देती थी। लेकिन, अब तो आसपास की चौपाले सूनी पड़ी रहती हैं। युवा पीढ़ी इस गायन की परंपरा पर रुचि नहीं दिखाती। जिससे यह ओझल होती जा रही है। बुंदेलखंड में ईश्वरी की फागे सुनकर श्रोता ओतप्रोत हो जाते थे। लेकिन अब फाग गायन सुनाई नहीं पड़ता।
बुजुर्ग बताते हैं कि होली के त्यौहार पर लगातार 8 दिन तक फाग गायकी का कार्यक्रम चौपालों में चलता था। अलग-अलग सुर और लय के साथ इस पुरानी परंपरा को बुजुर्ग निभाते चले आए। लेकिन, युवा पीढ़ी ने एकदम इस गायकी से नाता तोड़ लिया। बताया कि अब शराब और भांग के नशे में धुत युवक डीजे पर अश्लील गीत बजवाकर अपनी शौक पूरी कर रहे हैं।
पंकज
