Wednesday, January 14, 2026
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बाल वैज्ञानिक ने पराली से थाली-प्लेट-कटोरी बनाई

बस्ती (हि.स.)। जनपद के बेगम खैर गर्ल्स इंटर कालेज की छात्रा नीलाक्षी ने पराली को लेकर अद्भुत खोज कर उसको जन उपयोगी बना दिया है। विद्यालय की प्रधानाचार्या मुस्लिमा खातून ने बताया कि कि हमारे विद्यालय की छात्रा नीलाक्षी मौर्या ने 30वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान 2022-23 के मुख्य विषय “स्वास्थ्य और पर्यावरण हित के लिए पराली से प्लेट बनाने तक की यात्रा” अध्ययन के दौरान बाल वैज्ञानिकों ने पाया कि वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण एक अहम समस्या है। जिसमें वायु प्रदूषण मुख्य है।

वायु मंडल को दूषित करने में पराली दहन एक बड़ा कारण है। मूलत: यह पराली धान की फसल का अवशेष होती है। पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के अधिकतर किसान इसे जला देते है इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता प्रभावित होते है पराली जलाने से पर्यावरण नुकसान से अधिक मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। केवल एक टन पराली जलाने से 5.5 किग्रा नाइट्रोजन 2.3 किग्रा फास्फोरस 25 किग्रा सल्फर जैसे पोषक तत्व नष्ट हो जाते है। पराली जलाने के नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभावों से फसल की उत्पादकता भी कम होती है। और अर्थव्यवस्था व स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

उत्तर भारत में जलने वाली पराली की वजह से देश को लगभग 02 लाख करोड़ का नुकसान होता है। यह नुकसान वायु प्रदूषण की आर्थिक के साथ बीमारियों के खर्च के तौर पर होता है। यह आकलन अर्न्तराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) ने लगाया है। इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए हमने इस प्रोजेक्ट के माध्यम से इस समस्या का हल निकाला है। अगर हम पराली को जलाये नहीं वरन् उसके स्थान पर पराली को एकत्रित करके उससे इकोफ्रेण्डली प्लेट-कटोरी बनाएगें। इससे इस समस्या का निवारण हो सकेगा ।

अध्ययन के दौरान हमने पाया कि कई वर्ष पूर्व ग्रामसभा में पारम्परिक वस्तुओं का बहुत महत्व था। जैसा कि पेड़ के पत्तों तथा मिट्टी के पात्रों का उपयोग करना आदि। बढ़ते हुए भौतिकतावादी युग के कारण लोगों ने कुछ परम्परागत चीजों को पूर्णतः छोड़ दिया है तथा प्लास्टिक थर्माकोल जैसे प्रदूषकों का उपयोग कर रहे हैं। जिससे पर्यावरण प्रदूषण हो रहा है तथा हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। वर्तमान समय की मांग है कि अपनी परम्परागत चीजो से इकोफ्रेण्डली वस्तुओं का निर्माण कर उसका उपयोग करें। जैसे पराली से प्लेट बनाने की विधि।

नीलाक्षी मौर्या ने जब अपने गांव में देखा कि अक्टूबर व नवम्बर में खरीफ की फसल के बाद अधिकतर किसान खेत में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों (पराली) को जला रहे है। जिससे वायु प्रदूषण हो रहा है। इसका सीधा असर 60 साल से अधिक बुजुर्ग व्यक्ति तथा 05 साल तक के बच्चों पर पड़ता है इन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है। पराली के अवशेष को जलाने से मिट्टी की उर्वरकता भी नष्ट हो जाती हैं। पराली जलाने से पैदा होने वाली ग्रीन हाऊस गैस से पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। पराली जलाने से तीव्र श्वसन संक्रमण भी होता है। पराली जलाने से 190 बिलियन डॉलर या भारत के सरल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.7 प्रतिशत नुकसान होता है। तब हमें यह सूझा कि हम पराली से बहुत कुछ बना सकते हैं और हम दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले प्लास्टिक थर्माकोल जैसे प्रदूषकों की जगह पराली से बने प्लेट-कटोरी इत्यादि का उपयोग करें। यह बिल्कुल पर्यावरण अनुकूल भी होगा।

महेंद्र/मोहित

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