डा माधव राज द्विवेदी
आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी कहा जाता है। इसी तिथि को ऋतु के प्रतीक राम ने अनृत के प्रतीक रावण पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी को पूजन का उचित समय अपराह्न में माना जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार, यदि दशमी तिथि नवमी से संयुक्त हो तो अपराजिता देवी की पूजा दशमी को अपराह्न में उत्तर पूर्व दिशा में करनी चाहिए। अपराजिता की पूजा कल्याण और विजय की कामना से की जाती है। इस दिन अपराजिता और शमी वृक्ष के पूजन के बाद अपने ग्राम या नगर की सीमा से बाहर जाकर पुनः घर लौट आना चाहिए। इसे सीमोल्लंघन कहते हैं। उस समय स्त्रियां नये परिधान धारण करके सीमोल्लंघन करने वाले लोगों की आरती उतारती हैं। धर्मसिन्धु में अपराजिता देवी के पूजन के विषय में बताया गया है कि अपराह्न में उत्तर पूर्व दिशा में जाकर स्वच्छ स्थान को गोबर से लीपकर चन्दन से आठ कोणों का एक चित्र बनाना चाहिए और संकल्प करना चाहिए कि मम सकुटुम्बस्य क्षेमसिद्ध्यर्थमपराजिता पूजनमहं करिष्ये। इसके पश्चात् उस चित्र के मध्य में अपराजिता देवी का आवाहन करना चाहिए तथा उसके दायें और बांयें जया और विजया का आवाहन करना चाहिए। इसके साथ ही क्रिया शक्ति और उमा को नमस्कार करना चाहिए। इसके बाद अपराजितायै नमः, जयायै नमः, विजयायै नमः मन्त्रों के साथ अपराजिता, जया और विजया की षोडशोपचार से पूजा करनी चाहिए और यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे देवी अपनी रक्षा के लिए मैंने यथाशक्ति जो पूजा की है, उसे स्वीकार कर आप अपने स्थान को जा सकती हैं। इसके बाद सभी लोगों को गांव के बाहर उत्तर पूर्व दिशा में जाकर शमी वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। कुछ लोग विजया दशमी को राम और सीता की पूजा करना उचित मानते हैं क्योंकि उसी तिथि को राम ने लंका पर विजय प्राप्त की थी। कालिदास ने रघुवंश में वर्णित किया है कि राजा रघु शरद ऋतु आने पर वाजिनी राजना नामक शान्ति कृत्य करते थे। निर्णय सिन्धु में सेना के प्रयाण के समय विशेष पूजन का विधान बताया है, जिस पूजन के बाद प्रार्थना की जाती थी कि सब पर शासन करने वाली हे देवी! मेरी यह सेना जो चार भागों में विभाजित है, शत्रु विहीन हो जाय और आपके अनुग्रह से मुझे सभी स्थानों पर विजय प्राप्त हो। तिथितत्व में ऐसी व्यवस्था है कि राजा को अपनी सेना को शक्ति प्रदान करने के लिए आरती करके जल या गोशाला के समीप खंजन पक्षी का दर्शन करना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए कि हे खंजन पक्षी! तुम पृथ्वी पर आए हो, तुम्हारा गला काला और शुभ है। तुम सभी इच्छाओं को देने वाले हो, तुम्हें नमस्कार है।
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उत्तर भारत में दश दिन तक रामलीला का उत्सव चलता है और आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को समाप्त होता है। इसीलिए इसे दशहरा कहा जाता है। दशहरा पर्व वास्तव में कृषि का उत्सव है। इसीलिए भारत के कुछ भागों में नये अन्नों की हवि देने, द्वार पर धान की हरी और अधपकी बालियों को टांगने तथा गेहूं आदि के अंकुरों को पगड़ी पर रखने के कृत्य किये जाते हैं। कुछ लोगों के मत में दशहरा रण यात्रा का द्योतक है क्योंकि उस समय वर्षा समाप्त हो जाती है, नदियों में बाढ़ थम जाती है और धान आदि अन्न पककर कोष्ठागारों में रखने योग्य हो जाते हैं। शमी का पूजन शक्ति और साहस के प्रतीक अग्नि की उपासना से सम्बन्धित है। प्राचीन काल में शमी के घर्षण से अग्नि उत्पन्न की जाती थी। नवरात्र के पश्चात् विजया दशमी आती है। अतः दशहरा नवरात्र उत्सव से सम्बन्धित माना जाता है। यह उत्सव बहुत महत्वपूर्ण और मंगलकारी माना जाता है। विजयादशमी के इस पावन पर्व पर सभी मित्रों एवं देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएंकृ
(लेखक एमएलके पीजी कालेज बलरामपुर में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहे हैं।)
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