-सिंचाई के कृत्रिम साधन सही विकल्प नहीं बन सकते
कानपुर(हि.स.)। कानपुर मण्डल समेत पूरे उत्तर प्रदेश में फरवरी माह में अचानक बढ़े तापमान से फसलों को नुकसान का खतरा बढ़ गया है। सबसे अधिक क्षति गेहूं और सरसों में हो सकती है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ.एस.एन.सुनील पांडेय ने बताया कि गर्मी अधिक होने की वजह से गेहूं, सरसों समेत रबी के अन्य फसलों को अधिक क्षति की आशंका है। रबी की फसलों को परिपक्व होने के लिए कम तापमान की आवश्यकता होती है लेकिन धूप तेज होने की वजह से गर्मी अधिक होगी, जो फसलों के लिए ठीक नहीं है।
गर्मी इन रबी फसलों को खराब कर सकती है। अल नीनो इस साल बारिश को कम कर सकता है। इससे धान और बाजरा जैसी खरीफ फसलें प्रभावित होंगी। इससे सीधे-सीधे महंगाई पर असर पड़ने के आसार हैं। गर्म हवाएं ताजा उपज के परिवहन को भी प्रभावित करती हैं। भारत में पर्याप्त कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। अत्यधिक गर्मी अक्सर परिवहन में बड़े खाद्य नुकसान का कारण बनती है।
जनवरी और फरवरी में सर्दियों के महीनों के दौरान उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में मौसम की स्थिति काफी क्रूर रही। फरवरी माह की बात करें तो पश्चिम और पूर्वी उत्तर प्रदेश, पूर्वी और पश्चिमी मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली के उपमंडलों में 95-100% वर्षा की कमी हुई है।
मौसम प्रणालियों की अनुपस्थिति और फलस्वरूप सर्दियों की बारिश ने पूरे क्षेत्र में गर्मी का तनाव बढ़ा दिया है। दिन और रात दोनों का तापमान लगातार सामान्य से काफी ऊपर बना हुआ है। घटती प्राकृतिक वर्षा की भरपाई के लिए आवश्यक सिंचाई चक्रों में वृद्धि हुई है। इससे लागत भी बढ़ेगी।
वर्षा की कोई भी बड़ी कमी फसलों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाती है और सिंचाई के कृत्रिम साधन सही विकल्प नहीं बन सकते हैं। देश के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के महत्वपूर्ण गेहूं उत्पादक राज्यों को मौसम की स्थिति के कारण दोहरी मार झेलनी पड़ी है। माना जाता है कि फरवरी का ठंडा महीना पारा भिन्नता की अनुमेय सीमा को पार कर गया है। अभी तक मासिक औसत तापमान लगभग 2.5 से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक है और महीने के शेष दिनों में इसके गिरने की उम्मीद नहीं है।
राम बहादुर
