के. विक्रम राव
भारत के मित्र, मोदी के यार, हिन्द की वायुसेना को राफेल लड़ाकू वायुयान देने वाले, इमैनुअल मैक्रोन के दोबारा फ्रांस के राष्ट्रपति चुने जाने से यूरोप से दक्षिण पंथी खतरा समाप्त हो गया। विगत दिनों में यह स्पष्ट हो गया था जब तटवर्ती तमिलनाडु, पुदुचेरी तथा कराईकल तटों पर सदियों से बसे अप्रवासी फ्रेंच वोटरों ने गत रविवार (24 अप्रैल 2022) को जाहिर कर दिया था कि उन्होंने उदारवादी दि रिपब्लिक पार्टी के प्रत्याशी मैक्रोन को अपना वोट दिया है। ये फ्रांसीसी नागरिक समझते हैं कि उनकी जन्मभूमि भारत को लाभ कहां से होगा। विकल्प था नेशनल फ्रंट। धुर दक्षिणपंथी पार्टी की महिला उम्मीदवार मेरीन ली पेन का समर्थन करने का तात्पर्य था कि कट्टरता का पक्षधर बनना। गैर यूरोपीय फ्रेंच नागरिक इसके खिलाफ थे। लीपेन हिजाब तथा बुर्का पर पूरी पाबंदी चाहतीं हैं। अरब अफ्रीका के मुसलमानों को फ्रांसीसी नागरिकता के लीपेन विरुद्ध रहीं हैं। कारण यही हैं कि पश्चिम यूरोप में सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या का देश फ्रांस है। तीन दशक पूर्व लीपेन के पिता ज्यां लीपेन उससे भी कही कठोर इस्लाम विरोधी रहे। ठीक दो दशक बीते (अप्रैल 2002) के चुनाव में फ्रांस के राष्ट्रपति लीपेन ने उदारवादी जेकस शिराक को चुनौती दी थी। कारण कई थे। मानवीय तथा रहमदिली। वृद्ध (73 वर्ष) ज्यां लीपेन की घोषणा थी कि विदेशी (अधिकतर अरब मुसलमान) जन के फ्रांस जन्मे शिशुओं को नागरिकता न दी जाये। उत्तर अफ्रीका (खासकर अलजीरिया, सोनेगल, सूडान, बुर्कीना फासो,बेनिन आदि) से आये इस्लामियों को नागरिकता कदापि न दी जाये। अतः राज्य सहायता के लाभार्थी ये विदेशी नहीं हो पायेंगे। लीपेन मुसलमानों के साथ यहूदियों के भी खिलाफ थे।
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उन्होंने याद दिलाया था कि जब एडोल्फ हिटलर ने फ्रांस पर कब्जा किया था और यहूदियों का संहार किया था तो इन अरब मुसलमानों ने फ्रांस की सड़कों पर खुले आम जलसा मनाया था और नमाज अता की थी। नाजी जर्मनी द्वारा यहूदियों के वध का स्वागत किया था। हालांकि लीपेन दोनों (यहूदी तथा मुसलमान) को फ्रांस से निकाल देना चाहते थे। तब विजयी राष्ट्रपति जेकस शीराक ने सार्वजनिक तौर पर लीपेन के साथ टीवी डिबेट (2012) में भाग लेने से से इनकार कर दिया था। ’मैं कठोर कटुता भरी विचारधारा के समर्थक इस प्रतिद्वंद्वी के साथ दिखना नहीं चाहता हूं।’ तुलना में इमेनुअल मैक्रोन ने अपने देश द्वारा उत्तर अफ्रीका में स्वाधीनता प्रेमियों की हत्या के लिये (जलियांबाग माफिक) क्षमा याचना (4 मार्च 2021) की थी। फ्रेंच उपनिवेशवादी पुलिस (23 मार्च 1957) हत्या के करीब बासठ साल बाद। उनकी पुत्री गत रविवार को पराजित हो गयी। अतः मैक्रोन की राय में उनका जनतांत्रिक राष्ट्र बच गया। इस बार के आम चुनाव में मैक्रोन ने एक मुद्दा और उठाया था। उनकी हरीफ मेरीन लीपेन रुसी तानाशाह व्लादीमीर पुतीन के सखा तथा समर्थक हैं। मैक्रोन लगातार यूक्रेन के पक्षधर हैं तब अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा रुस पर फौजी कार्रवाही चाहते हैं। इसीलिए भारत से इस पुनर्निवार्चित राष्ट्रपति मैक्रोन के रिश्ते का विवरण आवश्यक है, बेहतर जानकारी हेतु। गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2016) पर मैक्रोन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमंत्रण पर मुख्य अतिथि बनकर दिल्ली आये थे। उन्हें याद रहा कि किस प्रकार भारतीयों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया था।
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पिछली बार मैक्रोन भारत आये थे (9-12 मार्च 2018) जब वार्ता द्वारा पारंपरिक आर्थिक संबंधों को मजबूती मिली थी। विषय था सैन्य, आंतरिक सुरक्षा, ऊर्जा, आतंकवादी से लड़ना, मौसम परिवर्तन, युवा मसले आदि। फ्रांस जो विश्व की सांतवीं अर्थ व्यवस्था है, ने भारत में ग्यारह अरब डालर निवेश किया हैं। लगभग हजार फ्रांसीसी कंपनियां इसमें शिरकत कर रहीं हैं। इसके अलावा फ्रांस, संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्य बनाना चाहता है। फिलहाल रक्षा आयुधों में फ्रांस भारत की बड़े पैमाने पर मदद कर कर रहा है। नये दौर में राष्ट्रपति पद पर दोबारा आसीन होने के बाद मैक्रोन चीन तथा रुस की आक्रमकता के मद्दे नजर भारत से संबंधों में सामीप्य को बेहतर बनायेगा। फ्रांस के हाल ही के चुनाव में इस्लामिक कट्टरपंथ और हिजाब बेहद अहम मुद्दा रहा। मैक्रोन का रुख कुछ नरम है तो ली पेन सीधे हिजाब पर रोक की मांग करती हैं। कोविड के दौर में मैक्रोन की लोकप्रियता कुछ कम हुयी। मगर इससे वह कमजोर नहीं हुए। आतंकवाद पर मैक्रोन सख्त हैं और चाहते हैं कि हथियारों को लेकर अमेरिका पर यूरोप अपनी निर्भरता कम करे। वह फ्रांस को नम्बर एक एटमी ताकत बनाना चाहते हैं। मैक्रोन का चुनाव में एजेंडा अर्थव्यवस्था सुधार और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित था। वहीं ली पेन घोर राष्ट्रवादी नेता हैं। ली पेन रूस की भी करीबी मानी जाती हैं और उनका कहना है कि युद्ध की समाप्ति के बाद रूस से अच्छे संबंध बन सकते हैं। भारत को परख कर नीति तय करनी होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं आइएफडब्लूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

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