– गंगा में स्नान के साथ माघ पर्यंत स्नान-दान, जप, व्रत शुरू
वाराणसी (हि.स.)। पौष पूर्णिमा पर शुक्रवार को काशीपुराधिपति की नगरी में श्रद्धालुओं ने कड़ाके की ठंड के बावजूद पवित्र गंगा में आस्था की डुबकी लगाई और दान पुण्य किया। गंगा स्नान के लिए अलसुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ घाटों पर उमड़ती रही। पूरे आस्था के साथ गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने अन्न, वस्त्र आदि का दान कर मंदिरों में भी दर्शन पूजन किया।
गंगा स्नान के लिए दशाश्वमेध घाट, शीतला घाट, दरभंगाघाट, अहिल्याबाई, पंचगंगा, भैसासुर, अस्सीघाट और सामने घाट पर श्रद्धालुओं के चलते मेले जैसा नजारा दिखा। श्रद्धालुओं के सुविधा और सुरक्षा के लिए गोदौलिया से दशाश्वमेधघाट पर जाने वाले मार्ग पर वाहनों का आवागमन प्रतिबंधित किया गया था। जल पुलिस और 11 एनडीआरएफ की टीम गंगा में मुस्तैद दिखी।
पौष पूर्णिमा पर गंगा स्नान के साथ ही माघमाह पर्यंत स्नान-दान सहित अन्य अनुष्ठान भी शुरू हो गया। शिवाराधना समिति के संस्थापक डॉ मृदुल मिश्र ने बताया कि पौष पूर्णिमा पर गंगा में स्नान के साथ माघ पर्यंत स्नान-दान, जप, व्रत, नियम, संयमादि का आरंभ हो गया। ये विधान माघ पूर्णिमा यानी पांच फरवरी तक चलेंगे। माघ मास में ब्रह्म मुहूर्त में गंगा, नर्मदा, यमुना में स्नान करने से पापों का क्षय होता है। इस माह में दान-पुण्य, रोगियों, निशक्तों की सेवा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।
उन्होंने बताया कि पौष पूर्णिमा के दिन दान करने से व्यक्ति के पाप कटते हैं और अमोघ फल की प्राप्ति होती है। इसके बाद माघ का महीना शुरू हो जाता है। पूरे माघ महीना पवित्र नदियों में स्नान का संकल्प लेने वाले भक्त पौष पूर्णिमा से इसकी शुरुआत कर माघ पूर्णिमा को समापन करते हैं। माना जाता है कि माघ मास में जहां कहीं भी जल हो वह गंगाजल के समान ही होता है, फिर भी प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, काशी, नासिक, उज्जैन तथा अन्य पवित्र तीर्थों और नदियों में स्नान का बड़ा महत्व है। स्नान से पूर्व हरि-हर का ध्यान, स्नान के दौरान सूर्यदेव को अर्घ्य और बाद में श्रीहरि का पूजन-अर्चन करना चाहिए।
श्रीधर
