Friday, March 27, 2026
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पितृपक्ष: गंगा तट और पिशाचमोचन कुंड पर तर्पण श्राद्ध के लिए उमड़ी भीड़

वाराणसी (हि.स.)। पूर्वजों को समर्पित पखवाड़ा पितृपक्ष के दूसरे दिन मंगलवार को लोगों ने अपने पूर्वजों की आत्मा को तृप्त करने के लिए गंगा तट और पिशाचमोचन कुंड पर ंमुंडन कराने के बाद तर्पण श्राद्ध कर्म विधि विधान से किया। गंगा में आई बाढ़ के बावजूद लोग श्राद्ध कर्म करने में जुटे रहे।

सिन्धियाघाट, दशाश्वमेध, तुलसीघाट, केदारघाट, प्रह्लाद घाट, पंचगंगा घाटों पर श्राद्ध कर्म कराने के लिए लोगों की भीड़ जुटी रही। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देख कर्मकांडी ब्राम्हण और पंड़े समूह में बैठाकर लोगों का श्राद्ध कर्म कराते रहे। लोगों ने कर्मकांडी ब्राम्हणों, तीर्थ पुराहितों की देखरेख में जौ के आटे का पिंड बनाकर सविधि मंत्रोच्चारण के बीच मां गंगा की जलधार में इसे अर्पित किया। पितरों को जल का अर्पण करने के पूर्व देवों, सप्त ऋषियों व दिव्य पुरुषों को भी क्रमश: चावल व जौ के साथ तर्पण किया गया। यहीं, हाल विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड का रहा। वाराणसी सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आये श्रद्धालु कुंड पर तीर्थ पुराहितों और पंडों की देखरेख में त्रिपिंडी श्राद्ध कराने में जुटे रहे।

पिशाचमोचन कुंड स्थित शेरवाली कोठी के तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडेय,पं. श्रीकांत मिश्र,बबलू मिश्र ने बताया कि पितृपक्ष में पितरों का तर्पण और त्रिपिंडी श्राद्ध पितृदोष शमन के लिए आवश्यक है। सनातन धर्म में पितरों के तर्पण की मान्यता है। श्राद्धकर्म के द्वारा पितरों की आत्मा को तृप्त किया जाता है। पितृ पक्ष के ये 15 दिन पितरों की मुक्ति के माने जाते हैं और इन 15 दिनों के अंदर देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध और तर्पण का कार्य होता है। इसके लिए काशी के अति प्राचीन पिशाचमोचन कुंड विमल तीर्थ पर त्रिपिंडी श्राद्ध होता है।

प्रदीप पांडेय ने बताया कि काशी में अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं भी हुई हो,मगर यहां श्राद्धकर्म हो जाये तो भी व्यक्ति की आत्मा को शांति, प्रेत योनी से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पंडा प्रदीप पांडेय बताते है कि प्रेत बाधाएं तीन तरीके की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं। पितरों के साथ-साथ अन्य पिशाच बाधाएं भी श्राद्ध कर्म से दूर होती है। पिशाचमोचन कुंड के बाद ही गया में किया श्राद्ध कर्म पूर्वजों तक पहुंचता है।

प्रदीप पांडेय बताते है कि पितृ पक्ष में पूर्वज यमलोक से धरती पर आते हैं और अपने परिवार के आसपास ही मौजूद रहते है। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि श्राद्ध कर्म करने से पितरों की तृप्ति मिलती है और खुश होकर अपने वंशजों को आशिर्वाद देकर अपने लोक में लौट जाते है। शास्त्रों में पितरों को भी देवताओं के समान बताया गया है। पितृपक्ष में पितरों की पूजा श्राद्ध तर्पण न करने से पूर्वजों को मृत्युलोक में जगह नहीं मिलती। उनकी आत्मा भटकती रहती है, जिससे पितर नाराज होते हैं और कई दोष लगते हैं।

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