Monday, March 2, 2026
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नौकरशाही के व्यवहार पर प्रश्न चिन्ह

वीर विक्रम बहादुर मिश्र

भारतीय प्रशासनिक सेवा के कुछ अधिकारियों के उत्तेजित व्यवहार को लेकर नौकरशाही के चयन और उसके प्रशिक्षण पर सवाल उठ रहे हैं। देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का संयम टूटना और उनका अप्रत्याशित व्यवहार चिंता का विषय है। इसके मूल में उन पर काम का बोझ हो सकता है, पर उनकी पात्रता का चयन भी तो तरह-तरह की कसौटियों पर कसने के बाद ही होता है। ऐसे में सत्ता के प्रतीक इन अधिकारियों को संयमित रखने की चेष्टा होनी चाहिए। इस संदर्भ में इस संवर्ग के अधिकारियों के अद्भुत संयम के प्रदर्शन की एक घटना याद आती है। वर्ष 1988 का प्रकरण है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही चल रही थी। इसी बीच सूचना मिली कि सचिवालय कर्मचारियों ने तत्कालीन शिक्षा सचिव जगदीश चंद्र पंत के कक्ष में उनके साथ अभद्र व्यवहार कर रहे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विधायकों की जबरदस्त पिटाई कर उन्हें लहूलुहान कर दिया है। तत्कालीन संसदीय कार्य और लोक निर्माण मंत्री डा अम्मार रिजवी समेत सरकार के कई मंत्री स्थिति संभालने के लिए दौड़ कर पहुंचे। सदन की प्रेस दीर्घा में मौजूद मेरे अतिरिक्त अनेक पत्रकार भी घटना स्थल पर पहुंचे, जहां उपस्थित सैकड़ों सचिवालय कर्मी विधायकों की पिटाई कर रहे थे। डा रिजवी के बहुत अनुनय विनय के बाद उत्तेजित कर्मचारी शांत हुए और अपने-अपने कक्षों में वापस गये। रक्त स्रवित विधायकों को स्ट्रेचर से सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। घटना के मूल में शिक्षा सचिव जगदीश चंद्र पंत के साथ विधायकों द्वारा किया गया दुर्व्यवहार था। विधायकों के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा में तत्कालीन नेता विरोधी दल सत्यपाल सिंह यादव बोर्ड परीक्षा केंद्र बदलवाने के संदर्भ में शिक्षा सचिव के पास गये थे। शिक्षा सचिव श्री पंत ने परीक्षा केंद्र बदला जाना उपयुक्त नहीं पाया और विधायकों की बात मानने से इनकार कर दिया। इस पर आक्रोशित विधायकों ने उन पर अनर्गल शब्दों की बौछार करते हुए उन्हे कुर्सी पर खड़े होने का दंड सुना दिया। विधायकों के उद्दंडतापूर्ण व्यवहार के बीच शिक्षा सचिव का निजी सचिव कोई फाइल लेकर भीतर आया और उसने बैठे हुए विधायकों के सामने अपने सचिव को खड़ा पाया। उसनै देखा, सचिव शांत और संयत खड़े हैं और विधायक उन पर अपमानित शब्दों की बौछार कर रहे हैं। फिर यह घटना आग की तरह फैली और सचिवालय कर्मियों ने एकजुट होकर सभी विधायकों की पिटाई कर डाली। विधायक तो जनप्रतिनिधि होते हैं जनता के बीच उनका बड़ा सम्मान है। सामान्य प्रोटोकाल में भी उनका स्थान मुख्य सचिव जो वरिष्ठतम आईएएस होता है, उससे भी ऊपर होता है। फिर एक आईएएस के आचरण की मान्यता देखिए कि उसके अपमान के विरुद्ध आक्रोश ने विधायकों की पिटाई करवा दी। पूजा व्यक्ति के आचरण की होती ह, पद की नहीं। इंद्र देवताओं का राजा है पर उसकी पूजा नहीं होती। सत्ता के गुमान में अंधे लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। गायत्री के अनन्य उपासक पंत जी तो एक उदाहरण हैं। देश की इस सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में उच्च आदर्शों वाले एक से एक अच्छे अधिकारी हैं, पर उनमें जब कोई अपवाद मिलता है तो बात खटकती जरूर है। विधायकों के अपमान जनक व्यवहार के विरुद्ध स्वयं को संयमित न रखकर पंत जी ने भी यदि अपना आक्रोश सार्वजनिक कर दिया होता तो स्थिति कुछ और होती.पर उन्होने स्वयं को संतुलित विनम्र और सहज रखा जिससे स्थिति में सुधार हुआ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व सम-सामयिक विषयों पर टिप्पणीकार हैं।)

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