आजाद हिन्द सरकार के स्थापना दिवस पर याद किये गये बोस
वाराणसी (हि.स.)। आजाद हिन्द सरकार के स्थापना दिवस पर गुरूवार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कृतित्व और विशाल व्यक्तित्व को याद किया गया। विशाल भारत संस्थान एवं सोसाइटी फॉर हिस्टोरिकल एण्ड कल्चरल स्टडीज के संयुक्त तत्वावधान में लमही स्थित सुभाष भवन में आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि वाराणसी के अपर पुलिस आयुक्त सुभाष चन्द्र दूबे ने कहा कि सुविधाओं के अभाव में भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित करके फौज बनाना, नेताजी जैसा व्यक्तित्व जिसे अंग्रेज भी अपने समय में नहीं झुका सके, उसे आजाद हिन्दुस्तान में कोई छिपा नहीं सकता है।
कहा आजाद हिन्द फौज से अंग्रेजों को लगा कि हिंसक विद्रोह सैन्य विद्रोह में बदल रहा था। बाकि सारे आन्दोलन ने अंग्रेजों की नींव को कमजोर किया था तो आजाद हिन्द फौज ने तारीख तय कर दी कि अंग्रेजों की इमारत अब टूट चुकी है। गोष्ठी में डॉ तपन कुमार घोष ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के वक्त यदि सुभाष के नीतियों की उपेक्षा न की गयी होती तो अंग्रेज कभी देश विभाजन का दुस्साहस नहीं करते और न ही देश में अपने स्वार्थ के लिये देश को पीछे करने वाली नेताओं की जमात खड़ी होती। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस दुनिया के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्हें एक राजा और एक संत की तरह पूजा जाता है। सुभाष चन्द्र बोस के इतिहास की खोज जारी रहेगी और नेताजी के इतिहास को उजागर किया जायेगा।
आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के नाम सामने आने से हिन्दू मुस्लिम एकता मजबूत तो होगी ही, अखण्ड भारत के पुनर्निर्माण का रास्ता खुल जायेगा। ‘नीलगंज की काली डायरी’ से आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों की कुर्बानी और अंग्रेजों की क्रूरता सामने आयेगी। गोष्ठी में अन्य वक्ताओं ने कहा कि आजाद हिन्द सरकार के फैसलों एवं नीतियों से अखण्ड भारत को आजादी मिलने वाली थी लेकिन जिन्ना और नेहरू ने देश विभाजित कर दिया। आजाद हिन्द फौज की कुर्बानी को इतिहास से हटाने का प्रयास वामपंथी इतिहासकारों ने किया। गोष्ठी में बीएचयू इतिहास विभाग की प्रोफेसर डाॅ मृदुला जायसवाल ने भी विचार रखा। संगोष्ठी का संचालन खुशी रमन भारतवंशी और धन्यवाद डाॅ निरंजन श्रीवास्तव ने दिया।
