कानपुर (हि.स.)। मां बारादेवी मंदिर के प्रति भक्तों की आस्था एवं विश्वास इतना है कि मन्नत पूरी हो जाने के बाद नवरात्रि के मौके पर उन्हें खुश करने के लिए अपने गाल में नुकीला भाला घुसेड़कर पहुंचते हैं। इस तरह आस्था विश्वास और परंपरा को निभाते हुए प्रतिदिन हजारों भक्त पहुंचते हैं। जिला प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद कुछ प्रथाओं को बंद करा दिया गया है। नहीं तो पहले तो लोग आस्था में अपनी गर्दन रेतकर व जिहवा काटकर मां को खुश करते थे।
प्राचीन बारादेवी मंदिर और भक्तों की आस्था बारादेवी चौराहा मंदिर के चौतरफा इतनी भीड़ हो जाती है कि पैर रखने की जगह नहीं रहती। यह हाल तब है जब चारों तरफ ट्रैफिक डायवर्जन करके मंदिर की ओर जाने वाली सभी सड़कों को खाली करा दिया गया है। एक-दो नहीं मंदिर के चौतरफा गाल में भाला आर-पार करके नाचते-गाते हजारों की भीड़ मंदिर की ओर बढ़ रही है। भीड़ के इस जत्थे को जवारा भी कहते हैं। गाल में आर-पार भाला लगाए हुए जत्थे के जत्थे मंदिर पर पहुंचते हैं।
मां बारा देवी को खुश करने के लिए गोविंद नगर की शिव नगर निवासी संजय का बेटा अपने गाल के आर-पार करके सड़को लोगों के साथ पहुंचा। जानकारी ली गई तो उसके साथ के लोगों ने बताया कि बेटा होने की पुत्र पाने के लिए मन्नत मांगी थी और वह पूरी हो गई, जिससे इतना कष्ट करके आज वह मां को खुश करने के लिए जा रहा हैं। वजनी भाले को उसके साथ सात लोग पकड़े हुए नजर आए। इस आस्था के साथ सपरिवार, रिश्तेदार और मोहल्ले के लोगों के साथ करीब 35 लोग गाल में भाला घुसेड़कर मंदिर पहुंचे हैं।
मंदिर का इतिहास
मंदिर के कार्यकारी प्रबंधक रूपम शर्मा ने बताया कि यह मंदिर लगभग चार सौ वर्ष पुराना है। हालांकि पुरातत्व विभाग के सर्वे में मां का मंदिर लगभग 1700 वर्ष पुराना बताया गया है। मंदिर से जुड़े कहानी के संबध में उन्होंने बताया कि पिता से हुई अनबन पर अपने पिता के क्रोध से बचने के लिए एक साथ घर छोड़कर बारह बहने भाग गई। सभी बहने किदवई नगर में मूर्ति बनकर स्थापित हो गई। पत्थर बनी यही बारह बहनें कई वर्ष बाद बारा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गई। पुजारी बताते हैं कि देवी के नाम से दक्षिण के अधिक क्षेत्रों का नाम भी रखे गए हैं। जैसे बर्रा एक से लेकर बर्रा नौ तक बिन्गवा, बारा सिरोही और बर्रा विश्व बैंक का नाम भी देवी के नाम पर ही रखा गया है।
वर्तमान में मां बारा देवी के वंशज बर्रा गांव में रहते हैं। नवरात्रि में उनके घर से ज्योति आने के बाद ही पूजा पाठ शुरू होता है। दुर्गा चालीसा में भी बारहदेवी का जिक्र है। पांच बहनों का गांव में ही पंचेश्वरी देवी का मंदिर बना है। इसके साथ ही तपेश्वरी देवी, हटिया का बुद्धा देवी मंदिर भी बारह देवी मंदिर की बहनों के नाम से हैं।
नवरात्रि में सुबह से लेकर देर रात तक लाखों की संख्या में भक्त मां का दर्शन कर पुण्य अर्जित करने आते रहते हैं। पुजारी दीपक कुमार ने बताया मंदिर में जिन दंपत्ति को संतान सुख की प्राप्ति नहीं होती। वह मां के दर पर आते हैं और चुनरी बांध कर मन्नत मांगते हैं। माता रानी की कृपा से उनके आंगन में किलकारियों की गूँज सुनाई देती है। अगले नवरात्रि पर बच्चे का पहला मुंडन मंदिर परिसर पर ही होता है। मुंडन के बाद दंपत्ति चुनरी खोल लेते हैं।
सप्तमी से नवमी तक निकलते हैं जवारे
नवरात्र की अष्टमी तिथि पर श्रद्धालु मां बारा देवी को जवारा निकालते हैं। मंदिर के आसपास आस्था का सैलाब उमड़ता है। इस दौरान मां काली और भगवान शिव के तांडव नृत्य को देख लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बारा देवी को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालु खतरनाक करतब भी कर दिखाते हैं। कोई आग से खेलता है तो कोई अपने गाल के आरपार नुकीली धातु पार कर दिखाता है। नाचते गाते श्रद्धालुओं का जगह-जगह स्वागत कर फूल बरसाए जाते हैं। यहां बड़ों के साथ बच्चों और महिलाओं ने भी सांग लगाती हैं।
राम बहादुर
