के. विक्रम राव
एक हैं ’पी.के’। (आमिर खान की सिनेमा नहीं।) मयखाने का हालावाला भी नहीं। वह हैं पंडित प्रशांत किशोर पाण्डेय बक्सरवाले। राजनीतिज्ञ हैं। पार्टियों को सत्ता पर बिठाना गिराना उनका पेशा है। सियासतदां के सितारे चमकाने की कारीगरी उनमें है। करीब सभी जननायकों के साथ रहे। कैलेंडर की भांति उन्हें बदलते भी रहे। आजकल यूरेशियन कांग्रेसी प्रियंका वाड्रा और उनकी इतालवी अम्मा के साथ हैं। बेटा भारत के बाहर है। देश की इस 137 वर्ष पुरानी कांग्रेस पार्टी का कायाकल्प कर, सोनिया को राजरानी बनवाने उनका लक्ष्य है। क्या कांग्रेस कि निहुरायी रीढ तथा शुष्क झुर्रियां सुधरेंगी? पीके को अपने पर भरोसा है। काठ की हांडी को फिर चूल्हे पर चढ़ाने का। एक कार्टून था कि डंडे से सिर के ऊपर बंधी गाजर देखकर गर्दभ बढ़ता चलता है, खा नहीं पाता। सत्ता का रुप गाजर का है। मगर पीके अनहोनी पर यकीन रखते हैं। नामुमकिन कुछ मानते ही नहीं। मगर उनके बूते की बात नहीं लगती कि पप्पू को राजा वे बना सकते हैं। कारण? पप्पू अटल है, न बदलेगा, न सुधरेगा। पीके जितना भी ओवरटाइम कर लें। जैसे दुनिया चौपट चौकोर नहीं हो सकती। गोल ही रहेगी। अगर कही पीके ने राहुल को या उनकी मां बहन को सत्ता पर ला दिया तो? तब मानना पड़ेगा कि अंधा भी बटेर पकड़ सकता है। आधारभूत कारण यह है कि भारतीय लोकतंत्र और मतदाता भोंदू नहीं है। वोट का महत्व आंकते हैं। पीके समूचा भारत नहीं है। मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना। बिहार के इस ब्राह्मण को इतना तो पता ही होगा। फिर प्रश्न पूछेंगे लोग कि नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री तिबारा कैसे बने? प्रधानमंत्री भी? नीतीश कुमार को शत्रु लालू की गोद में बिठाने वाले ने कैसे यह कर दिखाया? हाल ही में ममता की एक बार और सरकार बनवा दी? अर्थात जादूगर तो पीके होंगे ही! तो क्या जादू हर बार चलता है? सोनिया तो 1999 में शपथ लेने राष्ट्रपति केआर नारायण के पास जा रहीं थीं। मुलायम सिंह यादव ने लंगड़ी लगा दी। सपा सांसदों का समर्थन नहीं मिला। एक अवसर आया जब राहुल का अभिषेक तय था। पुलवामा हो गया। कांग्रेस को पंजाब में (2017) में सत्ता पर बैठा देने वाले पीके कांग्रेस को यूपी में कहीं पहुंचा ही नहीं पाये! तो अब सात साल में कौन से हूर के पर लग गये सोनिया कांग्रेस में? कौन मोहित होगा? कैसे होगा? मगर गाजर खाने की लालसा सोनिया में प्रबल कर दी, पीके ने। आगामी लोकसभा चुनाव (2024) बड़ा दिलचस्प होगा। नरेन्द्र मोदी हैट्रिक को होने देंगे? पीके के दिये बल्ले से सोनिया छक्का लगा पायेंगी? इतिहास प्रतीक्षा करेगा?
पंजाब का गिरा मान
पीके महाशय की संसदीय चुनावी रणनीति की पृष्ठभूमि में एक अन्य घटना को जोड़कर देखें। पंजाब में सोनिया कांग्रेस सरकार में लगातार रहा। कैप्टन थे मुख्यमंत्री जो पीके के लाभार्थी भी रह चुके हैं। मगर वहां एक नौसिखिया पार्टी भारती बहुमत में आ गयी। बिना पीके की मदद के। उनसे मिलती जुलती हैं। अरविन्द केजरीवाल की हाथ की सफाई द्वारा। मगर क्या हुआ उनके नामित पंजाब मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ? अब उनकी गाथा पढ़िये। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की घटना पर गौर कर लें। पवित्र गुरुद्वारा दमदमा साहिब में बैसाखी पर्व (14 अप्रैल) पर माथा टेकने मुख्यमंत्री मान गये थे। नशे में धुत पाये गये। दैनिक ट्रिब्यून तथा जागरण में समाचार छपा था। टीवी चैनलों से भी प्रसारित हुआ था। भाजपा सांसद तेजिंदर सिंह बग्गा ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज करायी है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने सिख संगत की मर्यादा भंग करने पर मान से क्षमा प्रार्थना की मांग की है। पूर्व अकाली मुख्यमंत्री सुखवीर सिंह बादल ने कार्रवाई की अपील की है। हालांकि सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी ने इस घटना को नकारा है। पवित्र गुरुग्रंथ साहिब में निर्देश है कि मदिरा पान पाप है। उनके साथी और साक्षी बताते हैं कि मुख्यमंत्री मान शराब के अगाध प्रेमी है। बिना हया या हिचक के। कई बार शराब छोड़ने की कसमें खा चुके हैं। वायदे किये हैं। जब वे सांसद थे (दो बार रहे), मान द्वारा नशे की अवस्था में सदन में आने की शिकायत सदस्य हरिन्दर सिंह खालसा ने अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन से किया था। अर्थात आदत है, पुरानी भी। मगर गत विधानसभा चुनाव में अपने माताश्री की वे सौगंध खा चुके थे कि अब नहीं। पर रुके नहीं। मान की शिकायत के अलावा, कई अकाली नेता भी आरोप लगा चुके हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री और मान के नेता अरविन्द केजरीवाल चण्डीगढ़ में पंजाब सरकार के आला अफसरों से सीधे वार्ता करते है, तबादला भी। प्रशासनिक तौर यह औचित्यहीन है। कदाचित नयी शासकीय आचार संहिता केजरीवाल रच रहे है। भगवंत मान की हरकतें अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा निर्वाचनों पर असर डालेंगी। गुजरात, हिमाचल आदि राज्यों में आम आदमी पार्टी ऐलानिया तौर पर अभियान करेगी। क्या वहां भी मान जैसे मुख्यमंत्री को पेश किया जायेगा जो अपना मान बचा नहीं पाये और न ही गुरुग्रंथ साहिब का ही मान रख पाये। अब निर्भर करता है अरविन्द केजरीवाल क्या नयी, मगर विकृत कार्य संस्कृत सजायेंगे?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं आइएफडब्लूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)
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