Tuesday, February 10, 2026

नजमी की कलम से

नआते पाक

रब की उल्फ़त हमे जो पाना है,
मुस्तफ़ा के ही दर पे जाना है

शाने अक्दस् मे नर्म लहजा हो,
वरना दोज़ख़ ही फिर ठिकाना है

जामे कौसर पियेगा वो ही कल
जिसने कहना नबी का माना है

सिलसिल ए नबवी खत्म अहमद पर,
अब क़यामत को सिर्फ़ आना है

कितने सादिक़ अमी थे प्यारे नबी
दुश्मनो ने भी इसको माना है

दीन ए अहमद के जो हैं दीवाने
उनको आसां नहीं मिटाना है

गालियाँ सुनके जो दुआएं दे
उसपे मेरा सलाम जाना है

सीरते मुस्तफा बयाँ कैसे
नजमी आँसू ही बस बहाना है


(सलाललाहो अलैहे वा सल्लम्म)

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