– सुप्रीम कोर्ट का मामले के सभी पक्षों को लिखित नोट दाखिल करने का निर्देश
नई दिल्ली (हि.स.)। सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण के जरिये ईसाई और मुस्लिम धर्म अपनाने वाले दलितों को आरक्षण देने के मामले पर सभी पक्षों से लिखित नोट दाखिल करने का निर्देश दिया। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले पर 11 जुलाई को अगली सुनवाई करने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि यह एक संवैधानिक सवाल है कि क्या राज्य धर्म के आधार पर भेदभाव कर सकता है। केंद्र सरकार कह रही है कि आयोग बनाया गया है, लेकिन क्या कोर्ट को सरकार के इस बयान पर बार-बार इंतजार करना चाहिए। प्रशांत भूषण ने कहा कि 2004 में याचिका दाखिल की गई है। 19 साल बीत चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस पर विचार करना चाहिए।
जस्टिस कौल ने कहा कि रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया गया है। जस्टिस कौल ने एएसजी केएम नटराज से पूछा कि संविधान में इसके लिए जो उचित है उसे किया जाय, यहां मुद्दा तो यही है। जब केंद्र की तरफ से कहा गया कि आयोग बनाया गया है वह अपना काम कर रहा है। इस पर जस्टिस कौल ने कहा कि जिस संवैधानिक मुद्दे की बात हो रही है क्या उसे आयोग के जवाब तक इंतजार करना चाहिए। एक याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि अगर कोई धर्मांतरित मुस्लिम दस या बीस साल बाद फिर से हिंदू धर्म स्वीकार कर लेता है तो उसका फिर से एससी-एसटी का दर्जा वापस मिल जाता है। इस पहलू पर भी कोर्ट को ध्यान देना चाहिए।
सात दिसंबर 2022 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि इस मामले में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट की अनुशंसाओं को लागू नहीं कर रही है। केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा था कि इस मसले की पड़ताल के लिए जस्टिस बालाकृष्णन की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया है।
धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम या ईसाई बनने वाले दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग करते हुए 2004 से लेकर 2020 तक कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं। आज सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं में से एक की तरफ से कहा गया कि इस मामले में मुद्दे तय किए गए हैं कि क्या हिंदुओं, बौद्धों और सिखों के अलावा अन्य धर्मों को मानने वाली अनुसूचित जाति को बाहर रखा जा सकता है। क्या ईसाइयों और मुसलमानों को अनुसूचित जाति को दिए जाने वाले आरक्षण में शामिल नहीं करना भेदभावपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फिलहाल सुनवाई की कोई तारीख तय नहीं की है। कोर्ट ने कहा कि जनवरी में संविधान बेंच और अन्य मामलों की भी सुनवाई होनी है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि हो सकता है कोर्ट इस मामले में सुनवाई से पहले जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी समिति की रिपोर्ट का भी इंतजार करें, जिसके आधार पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ाया जाए।
संजय/पवन
