Saturday, March 7, 2026
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द कश्मीर फ़ाइल्स : सेपियंस पीड़ा का एक और आख्यान

शैलेन्द्र कुमार पाण्डेय

द कश्मीर फ़ाइल्स मूवी जिस बात की सबसे ज़्यादा तस्दीक़ करती है, वह यह है कि मनुष्य जाति को समग्र रूप से अपने ही लोगों के साथ किए गए हिंसा और बर्बर व्यवहार पर शर्मिंदा होने की ज़रूरत है। चाहे वो किसी भी रूप या काल में घटित क्यों न हुआ हो। यह आश्चर्य नहीं कि कोई भी धर्म, वर्ग, लिंग या जाति इसका अपवाद नहीं है। अश्वेतों, दलितों तथा स्त्रियों के साथ हुए भेदभाव और बुरे व्यवहार के लिए हम सभी दोषी हैं। दो विश्वयुद्ध हम इंसानों की पाप गाथाएँ हैं। बंदूक़ से निकली हुई गोली अंततोगत्वा किसी न किसी स्त्री के हृदय में जाकर धंसती है। इस्लामी आतंकवाद ने तो पूरी दुनिया को समान रूप से प्रभावित किया हुआ है। आदिकाल से लेकर अब तक हज़ारों घटनाएँ ऐसी हैं जिनको उद्धृत किया जा सकता है, जो मनुष्यता के माथे पर कलंक हैं और सेपियंस के सभ्य होने के दावे के ठीक उलट हैं। द कश्मीर फ़ाइल्स मूवी भी कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुई ज़्यादती और हिंसा पर हम मनुष्यों को लज्जित होने का एक अवसर देती है। कम से कम पढ़ें लिखे लोगों को इसको इसी रूप में देखना चाहिए।
द कश्मीर फ़ाइल्स मूवी पर सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया बेहद दिलचस्प है। एक बड़ा समूह इस फ़िल्म के माध्यम से ज़ोर शोर से अपने पीड़ित होने का नैरेटिव सेट करने में जुटा हुआ है। बल्कि कहें तो अपने पीड़ित होने से ज़्यादा मुसलमानों के आततायी और ग़ैर भरोसेमंद होने का नैरेटिव। ध्यान से विश्लेषण करने पर पता चलेगा कि इस्लामिक दुनिया ने अपने पीड़ित होने के नैरेटिव को बहुत पहले से ही एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। जैसे एक शायर ने कहा है कि “हमको मालूम है कि हम निशाने पे हैं, चलती बंदूक़ों के दहाने पर हैं।” बात-बात पर “ख़तरे में आ जाने” के भाव का जन्म यहीं से होता है। जबकि अधिकतर इस्लामी देशों में अल्पसंख्यक हिंदू, सिक्खों, बौद्धों या अन्य समूहों के लिए सम्मानजनक जीवन एक दूर की कौड़ी है। इस पूरे एपिसोड पर कुछ बुद्धिजीवी अभी भी मनुष्य धर्म से विमुख होकर किसी न किसी वाद से अपनी वफ़ादारी साबित करने में उलझे हुए हैं। कई लोग तो कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुई ज़्यादती और हिंसा को ही झुठलाने पर तुले हुए हैं लेकिन वे न्यायशास्त्र के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत कि ‘इनजस्टिस एनीव्हेर इज ए थ्रीट टू जस्टिस इवरीव्हेर’ को नहीं समझ पा रहे हैं। आश्चर्य यह है कि ऐसे लोग फ़िलिस्तीन पर आँसू बहाते हुए मिल जाते हैं। कुल लब्बोलुआब बस इतना है कि अन्याय और अत्याचार किसी भी पंथ, समाज, वर्ग, लिंग और जाति के साथ हुआ हो, जब तक उसकी एक स्वर में सभी लोग भर्त्सना नहीं करेंग,े तब तक एक भरोसेमंद समाज और बेहतर दुनिया की कल्पना साकार नहीं हो सकती है। कुछ घटनाओं का कोई जस्टिफ़िकेशन नहीं होता है बल्कि जस्टिफिकेशन के किसी भी प्रयास से इंसानियत और भी ज़्यादा रुसवा होती है।
एक सबसे ज़रूरी बात कि क्या हमें किसी दर्दनाक घटना को दिखाने वाली फ़िल्म को देखकर सामने वाले के प्रति या साफ़ शब्दों में कहें तो एक धर्म या समुदाय के प्रति नफ़रत से भर जाना चाहिए? मेरे विचार से नहीं! निश्चित ही नफरत करना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। यदि हम ऐसा करते हैं तो यह मनुष्यता के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण होगा। घृणा यह बताती है कि हम तर्क के स्तर पर उससे मुक़ाबला नहीं कर सकते। मेरा मानना है कि किसी भी हिंसा में धार्मिक पूर्वाग्रह से ज़्यादा भूमिका इंसानी उन्माद और राजनैतिक सहूलियतों की होती है। यदि धार्मिक जुड़ाव की भावना इतनी बलवती होती और सहधर्मियों के प्रति नरम होती तो इस्लामी मुल्क जैसे ईरान और ईराक़ आपस में कभी नहीं लड़ते या खाड़ी युद्ध कभी नहीं होता। तथाकथित मुस्लिम राष्ट्रों ने आपस में इतनी मारकाट की है कि ख़ुदा भी शरमा जाए। दो विश्व युद्धों में भागीदार रहे अधिकांश देश एक ही ईसा मसीह को मानने वाले थे। लेकिन क्या उन्होंने एक दूसरे के लोगों को मारते वक्त ईसा मसीह के उपदेशों के बारे में पल भर भी सोचा? क्या हिंदू धर्म में शूद्रों के साथ दुर्व्यवहार नहीं हुआ है? बात बहुत साफ़ है कि सभी धर्मों (रिलीजंस) के हिस्से में पाप और पुण्य दोनों दर्ज हैं। दुनिया में धर्म के नाम पर जितने पाप हुए हैं उनका कोई हिसाब नहीं है। कोई धर्म (रिलीज़न) उतना भी निष्कलंक नहीं है जितना उसके अंधानुयायी बताते हैं और कोई धर्म (रिलीज़न) उतना भी दोषपूर्ण नहीं है जितना घृणा करने वाले लोग आरोप लगाते हैं ।
कल्पना करिए कि हम धार्मिक-नस्लीय नफ़रत की सर्वोच्च उपलब्धि यानि दुनिया में सिर्फ़ एक ही मज़हब और एक ही नस्ल के लोग रहें, को पा लें तो क्या दुनिया में हमेशा के लिए शांति हो जाएगी? क्या मनुष्य एक दूसरे पर प्रहार करना बंद कर देंगे? इसका जवाब एक बड़े ना के रूप में है। हिंसा एक क्रिया से पहले एक विचार है और एक बार किसी धर्म, वर्ग या समुदाय ने इसे अपने यूएसपी के रूप में स्वीकार कर लिया तो एक न एक दिन यही विचार स्वयं उसे ख़त्म कर देंगे। एक सरल उदाहरण से इसे समझा जा सकता है कि द्विराष्ट्र सिद्धांत को मानते हुए अलग पाकिस्तान देश बनाने वाले लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि अलग संस्कृति और भाषा के आधार पर सिर्फ़ 20-25 साल के अंदर एक दूसरे देश बांग्लादेश का निर्माण हो जाएगा। एक बार पुनः पाकिस्तान के हुक्मरानों ने पूर्वी पाकिस्तान यानि बांग्लादेश में खून बहाते समय एक बार भी नहीं सोचा कि वे अपने सहधर्मियों की हत्या कर रहे हैं। ये और बात है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ अत्याचार आजकल सुर्ख़यिं में है। स्वयं हिंसा बर्दाश्त करके एक अलग राष्ट्र हासिल करने वाले लोग आजकल दूसरे लोगों पर किसी दूसरे बहाने हिंसा कर रहे हैं। समकालीन विश्व में नव राष्ट्रीयताओं के अभ्युदय के प्रमुख कारणों में से एक सबसे प्रमुख कारण शांति पूर्ण सहअस्तित्व की प्रणाली से दूर होना भी है। घूम फिर कर हमें गाँधी याद आते हैं। कहने का तात्पर्य बस इतना है कि विविधता के विचार को स्वीकार करने में ही सबकी भलाई है और इसे राजनीति से ज़्यादा समाज को स्वीकार करना होगा। याद रखिए पहले समाज है फिर राजनीति। कभी-कभी आपको महसूस होता है कि आपको किस दिशा में मुड़ना चाहिए तो सबसे पहले हमें भीतर की तरफ़ मुड़ना चाहिए। मानव मन की प्रवृति है संसार को दोहरे दृष्टिकोण से देखने की। तिब्बती कहावत है कि जिस ख़ुशी की आपको तलाश है उसे आप स्वयं प्राप्त कर सकते हैं और जिस दुख की आपको तलाश है उसे भी आप स्वयं प्राप्त कर सकते हैं। नफ़रत एक बहुत ही जटिल भावना है। नफ़रत से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है वो गर्म स्वभाव की होती है। वह अपने आस पास के सभी वस्तुओं का विनाश करके ही चैन लेती है। याद रखिए आँख के बदले आँख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना सकता है। फिर प्रश्न उठता है कि क्या हिंसा करने वाले लोगों से हमें प्रेम करना चाहिए। इसका भी उत्तर नहीं में है। यह राज्य की ज़िम्मेदारी है कि ऐसे हिंसक प्रवृति के लोगों के साथ कठोरता के साथ पेश आए और पीड़ितों के प्रति न्याय सुनिश्चित करे । ताकि आम जन-मानस पाप से घृणा करे पापी से नहीं।
(लेखक भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी हैं और लेख में प्रयुक्त विचार उनके निजी हैं।)

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