देवरिया ( हि. स. ) । देवरिया देवों की धरती कही जाती हैंं। यहां पर देवरहा बाबा जैसे तपस्वी रहे हैं।
देवरिया – कुशीनगर एक में था देवरिया में चीनी मिल था । देवरिया को चीनी का कटोरा कहा जाता था। समय के साथ हालात बदलते गए। चीनी मिले बंद होती गईं। तभी से रोजागर के लिए पलायन शुरू हो गया।
ले. जनरल श्री प्रकाश मणी भाजपा 1999, मोहन सिंह सपा 2004, गोरख प्रसाद जायसवाल बसपा 2009, कलराज मिश्र भाजपा 2014 फिर भाजपा रमापति राम त्रिपाठी 2019 रहे ।
स्थानीय मुद्दा हैं –
बेरोजगारी, चीनी मिल बंद उसको चालू किया जाए, सड़क सहित अन्य मुद्दा हैं।
जाति समिकरण को देखा जाए तो – –
मिली जानकारी के अनुसार- ब्राहमण 27, एसी 14, अल्प संख्ययक 12, यादव 8, वैश्य 8, सैथवार 6, कुर्मी 5 , क्षत्रिय 5, राजभर 4 , कायस्थ 4, निषाद 3, बाकी 4 प्रतिशत अन्य बिरादरी 4 प्रतिशत हैं।
लोक सभा में वोटो को देखा जाए तो – पुरूष 950812, महिला 784666 ,शहर में हैं। ग्रामीण में 1729583 हैं।
भाजपा ने शनिवार को पहली सूची आने के बाद से ही जिले में कयासबाजियों का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक विश्लेषक अपने-अपने स्तर से इसकी अलग-अलग ब्याख्या कर रहे हैं। इसमें से अधिकांश का दावा है कि दावेदारों की लंबी लिस्ट ने इस सीट पर पेंच फंसा दिया है। पार्टी पूरा ठोंक-बजाकर ही किसी को यहां मैदान में उतारेगी।
पिछले दो चुनावों से लोकसभा क्षेत्र देवरिया में भाजपा एकतरफा जीत दर्ज कर रही है। 2014 में कलराज मिश्र 51.07% फीसदी वोट हासिल कर मोदी लहर में यहां के सांसद बने थे। वे यहां से चुनाव लड़ने आए तो बाहरी होने का सवाल उठा। इसका जवाब देते हुए उन्होंने प्यासी से अपना नाता जोड़ते हुए कहा कि उनके पुरखे यहीं के रहने वाले थे। मोदी लहर पर सवार कलराज मिश्र ने अपने राजनीतिक कौशल से यहां बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने इस चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा के नियाज अहमद को 2,65,386 मतों के अंतर से हराया। इस चुनाव में कलराज मिश्र को 4,96,500 और नियाज अहमद को 2,31,114 मत मिले। सपा के बालेश्वर यादव 1,50,852 मतों के साथ तीसरे और कांग्रेस के सभाकुंवर 37,752 मतों के साथ चौथे स्थान पर रहे। इससे पहले भाजपा के श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने 1996 और 1999 में देवरिया सदर सीट जीत हासील की थी।
वर्ष 2019 के आम चुनाव में भाजपा ने उम्र की बाध्यता के चलते कलराज मिश्र का टिकट काट उनकी जगह पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी को यहां से मैदान में उतारा। इन्हें भी बाहरी होने के सवालों जूझना पड़ा। इस बार सामना सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी विनोद जायसवाल से था। माना जा रहा था कि मुकाबला कांटे का होगा, लेकिन डा. रमापति राम त्रिपाठी ने 57.11 फीसदी वोट हासिल करते हुए एकतरफा जीत दर्ज की। उन्हें कुल 5,75,115 मत मिले। इस चुनाव में बसपा के विनोद जायसवाल को 3,28,634 (32.64%) और कांग्रेस के नियाज अहमद को 50,809(5.05%) मत मिले।
2024 में भाजपा यहां जीत की हैट्रिक बनाने की तैयारी में है। ऐसे में पार्टी काफी सोच समझ कर निर्णय लेना चाहती है। माना जा रहा है कि इसी के चलते पहली लिस्ट में इस सीट से प्रत्याशी की घोषणा अटक गई। जिसकी वजह से चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। इस सीट को लेकर टिकट के दावेदार व उनके समर्थकों की धड़कन बढ़ गई है। कुछ दावेदार तो दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। वे वहां से अपने समर्थकों को सांत्वना दे रहे हैं कि अबकी उन का पक्का है, तो वहीं कुछ दावेदार जिले में रहकर पार्टी की संसदीय समिति के निर्णय पर नजर जमाए हैं। अब पार्टी निर्णय चाहें जो भी ले फिलहाल देवरिया की सीट को लेकर जिले का राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है। इस सीट पर वर्तमान सांसद डा. रमापति राम त्रिपाठी समेत दावेदारों की लिस्ट काफी लंबी है।
कांग्रेस के खाते में देवरिया
इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन में देवरिया की सीट कांग्रेस के खाते में है। अभी उसने भी अपने प्रत्याशी के नाम का ऐलान नहीं किया है। 17 चुनावों में छह बार कांग्रेस, चार बार भाजपा, दो-दो बार सपा व जनता दल और एक-एक बार सोशलिस्ट पार्टी, लोकदल व बसपा के खाते में यह सीट रही है।
1951 में सरयू मिश्र, 1962, 1967 और 1971 में विश्वनाथ राय, 1980 में रामायण राय और 1984 में राजमंगल पाण्डेय यहां से कांग्रेस के टिकट पर यहां के सांसद चुने गए थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए आठवें आम चुनाव में 55.71 फीसदी मतों के साथ कांग्रेस ने यहां जीत दर्ज की थी।
स्थानी जनता का क्या कहना हैं
शिवचन राजभर का कहना हैं कि युवओं को रोजगार उपलब्ध कराई जाए।
रोहित ने बताया कि उ.प्र. विकाश की ओर अग्रस हो रहा हैं। लेकिन उ.प्र. रोजगार परक बनाए जाए। बेरोजगार घर पर ही रह कर अपने परिवार के साथ रह कर काम करें।
डा . मनीष ने कहा कि देवरिया में मेडिकल कॉलेज सड़कों का जाल बिछ रहा हैं। समय के साथ बदल रहा है।
ज्योति/बृजनंदन
