– कूड़ा-करकट बीन कर कर रहे जीवन यापन
– हमारी आवाज फाउंडेशन ने कोरोना काल में मास्क पहनने और महामारी से बचने की फैलाई जागरुकता
नई दिल्ली (हि.स.)। हमारे समाज में बहुत सारे लोग ऐसे मौजूद हैं जो रहते तो हमारे साथ हैं मगर उनका नाम सरकार के रजिस्टर में दर्ज नहीं है। इनके पास ना तो पहचान पत्र है, ना ही राशन कार्ड है। यही नहीं उन्हें वोट डालने का अधिकार भी प्राप्त नहीं है। राजधानी दिल्ली में ऐसी कई बस्तियां है जहां यह लोग दयनीय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कहने तो इन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया बताया जाता है जबकि यह लोग कहते हैं कि यह बंगाल, असम, ओडिशा और बिहार से आकर यहां बसे हुए हैं। इनकी बस्तियों में सरकार की तरफ से भी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। जैसे-तैसे यह अपना जीवन बिता रहे हैं। इन मलिन बदबूदार बस्तियों में एक संस्था शिक्षा का अलख जगाने के लिए भरपूर प्रयास कर रही है। ‘हमारी आवाज’ फाउंडेशन नामक इस संस्था की अध्यक्ष शबीना खान यहां पर आकर उन्हीं की झुग्गियों में बैठकर उन्हें शिक्षित करने का काम कर रही हैं।
कालिंदी कुंज झुग्गी बस्ती में रह रहे यह लोग अपने बच्चों का पालन पोषण करने के लिए शहर के गली मोहल्ले में घूम-घूम कर कूड़ा करकट बीनने का काम करते हैं जबकि इनकी महिलाएं घरों में साफ सफाई का काम करके दो पैसा कमाती हैं। इस बस्ती में आकर देखने पर पता चलता है कि यह लोग कितनी कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इनके बच्चों के पास तन ढकने के लिए कपड़े भी मौजूद नहीं है। बच्चों को इस बस्ती के बाहर की दुनिया के बारे में पता ही नहीं है और ना ही उन्हें रहने-सहने का सलीका है। यह बच्चे पूरी तरह अशिक्षित और कुपोषण का भी शिकार हैं।
शबीना खान ने बताया कि इन बच्चों के बारे में उन्हें कुछ दिनों पहले ही पता चला है। तभी से वह यहां पर आकर बच्चों को पढ़ाने, उनके स्वास्थ्य की देखभाल करने और उनके लिए कपड़े वगैरह का इंतजाम करने में जुटी हुई है। उनका कहना है कि बच्चों को उन्हीं के घर में उन्हीं की बस्ती में आकर पढ़ाने में उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है लेकिन बच्चों के पास इतने संसाधन नहीं है कि वह बस्ती से बाहर स्कूल आदि में दाखिला लेकर शिक्षा प्राप्त कर सकें। उनका कहना है कि वह रोज या एक-दो दिन का गैप देकर यहां पर आती हैं और अपना काम करती हैं।
उन्होंने बताया कि कोरोना वायरस महामारी के दौरान भी उन्होंने यहां आकर बच्चों को कोरोना वायरस महामारी से बचाव करने के लिए जानकारी दी। उन्हें मास्क पहनने और उसका इस्तेमाल करने का तरीका बताया है। उनका कहना है कि अगर कोरोना वायरस जैसी महामारी ने यहां पर पैर पसार लिया तो उनका इलाज कराना काफी मुश्किल हो जाएगा क्योंकि जब दिल्ली में रहने वाले संपन्न लोगों को अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिल रहा है तो उन्हें कौन आसरा देगा। उनका कहना है कि यह सच है कि इन लोगों के पास किसी भी तरह का कोई नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है लेकिन कम से कम इंसान होने के नाते तो इन्हें नागरिक सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए। क्या यह लोग इसी तरह अभाव में अपना जीवन व्यतीत करते रहेंगे? इनके जीवन में किसी तरह का सुधार नहीं आएगा। अपने मां-बाप की तरह बच्चे भी कूड़ा बीनने और घरों में साफ-सफाई का काम करते हुए इस दुनिया से रुखसत हो जाएंगे।
