Tuesday, January 13, 2026
Homeविचारतेवारी, तिवारी, तिवाड़ी और त्रिपाठी!

तेवारी, तिवारी, तिवाड़ी और त्रिपाठी!

शम्भू नाथ शुक्ल

विंध्य के इस पार के भारत में यह सरनेम बहुत कॉमन है। कहीं इनको तेवारी बुलाया ज़ता है तो कहीं तिवारी। राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में इन्हें तिवाड़ी बोलते हैं। जब तत्सम शब्दों का चलन शुरू हुआ तो ये तिवारी त्रिपाठी हो गए। त्रिपाठी यानी तीन पाठ करने वाला अथवा जो रोज़ तीन बार पाठ करता हो। लेकिन किसका यह स्पष्ट नहीं है। यूँ तिवारी सरल और भोले होते हैं। इसीलिए एक कहावत बहुत प्रचलित है, “तिवारी हरजुतना!” अर्थात् जो हल चलाता है या अपनी भूमि पर ख़ुद जोता-बोता है। यह कहावत इसलिए बनी होगी कि अवध की पट्टीदारी प्रथा में ब्राह्मण-ठाकुर हल नहीं चलाते थे। वे हलवाहों से खेती करवाते थे। लेकिन गंगा-यमुना के दोआबे में बसे ब्राह्मण-ठाकुर खेती स्वयं करते हैं। तिवारी कथा से पहले एक बात को स्पष्ट करना ज़रूरी है कि यह सरनेम लगाने का चलन शुरू कब से हुआ? क्योंकि प्राचीन भारत में ब्राह्मण तो मिलते हैं लेकिन तिवारी, शुक्ल आदि सरनेम नहीं मिलते। यहाँ तक कि अन्य जातियों में भी नहीं। न पुराण काल में न रामायण-महाभारत के समय, न नंद, मौर्य, शुंग, गुप्त, हर्षवर्धन के समय न भोज, परमार या चंदेलों के वक्त और न ही राजपूती काल में। किसी भी वंश ने सिंह सरनेम नहीं लगाया। ऊपर मैंने जिन नंद, मौर्य, शुंग, सातवाहन, काकतीय, चोल, पांड्य, गुप्त या भोज, परमार अथवा चंदेल, पाल, सेन वंश का ज़िक्र किया है, उनके नामके आगे जो वंश लिखा है वह उनके किसी जातीय गोत्र या उपनाम की पहचान नहीं बल्कि उनके प्रतीक मात्र हैं। उस समय तक जो भी राज करता वह क्षत्रिय और जो वेद पाठ करता वह ब्राह्मण। इसी तरह कृषि-कर्म व व्यापार से जुड़ी हुई जातियाँ थीं लेकिन यह रूढ़िबद्ध नहीं था। भारत तब भी विविधताओं, अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं वाला देश था। लेकिन अंतर्भुक्ति होती रही और एक दूसरे के समान-धर्मा लोग दूसरे में विलुप्त होते रहे। शक और हूण के आने तक यही चला।
किंतु जब तुर्क देश में आए तो वे अपने साथ एक भिन्न सभ्यता और सुगठित धर्म लेकर आए। उनके साथ यह अंतर्भुक्ति असम्भव थी। क्योंकि उनका पुरोहित वर्ग बहुत ताकतवर और कट्टर था। भारत में राजा के धर्म को लेकर प्रजा में कोई आसक्ति नहीं रही। इसलिए भारत की प्रजा को इन तुर्क शासकों से कोई मतलब नहीं रहा। इन तुर्कों का भी सामना एक विचित्र देश से पड़ा। जहां जनता में कोई राजनीतिक चेतना नहीं थी। उन्हें शासक वर्ग से कोई मतलब नहीं था। न खानपान न पहरावा। भारत में वह वर्ग जो राज-काज से जुड़ा हुआ था, वह या तो सुदूर पहाड़ों या दुर्गम स्थानों की तरफ़ निकल गया या घर में दुबक कर बैठ गया। सबसे ज़्यादा दिक़्क़त आई कायस्थों को। उनके पास ज़मीन अथवा अचल सम्पत्ति थी नहीं और नए निज़ाम से उनका कोई तालमेल तो दूर संवाद तक नहीं था। दिल्ली में पहले सूफ़ी संत हुए हज़रत निज़ामुद्दीन चिश्ती। हालाँकि उनका जन्म 1238 में बदायूँ में हुआ और सूफ़ी संत फ़रीदुद्दीन के शिष्य बन गए और दिल्ली के गयास पुर इलाक़े में आकर बसे। उन्होंने दिल्ली के हिंदुओं की पीड़ा को समझा और उनको दिल्ली सल्तनत के क़रीब पहुँचाया। चूँकि मुस्लिम दरबारों में जाने के कुछ क़ायदे थे इसलिए हिंदुओं ख़ासकर कायस्थों ने नौकरी पाने के लिए उनकी ज़ुबान सीखी और उनका पहरावा अपनाया। मगर अपने घरों में वे घोर परम्परावादी सनातनी हिंदू ही रहे। तब तक दिल्ली के अलावा राजपूताना, मालवा, बुंदेलखंड, डेक्कन और सुदूर दक्षिण में हिंदू राजे अपना राज चलाते रहे। तुर्क सुल्तान गंगा-यमुना के मैदानों की तरफ़ बढ़ते हुए बंगाल तक पहुँच गए। बाद में इन तुर्क सुल्तानों ने भी हिंदुआनी रीति-रिवाज, पहरावा और सामाजिक नियम भी अपनाए। जैसे कि 1526 में जब दिल्ली सुल्तान इब्राहीम लोदी पानीपत में मुग़ल हमलावर बाबर से युद्ध करने गया, तब उसके माथे पर विजय का प्रतीक तिलक था और वह स्वयं हाथी पर सवार था। किंतु बाबर के पास आधुनिक हथियार थे। वह तोपों का सामना नहीं कर सका।
मुग़ल जब भारत आए तब राजपूताने में राणा सांगा, बुंदेलखंड में तमाम हिंदू राजे और सुदूर दक्षिण में हिंदू नरेश राज कर रहे थे। डेक्कन में जो सुल्तान थे उनको भी मुग़लों से कोई भय नहीं था। इसके अलावा अवध के पूरे क्षेत्र में अफ़ग़ान पठान थे। जो मुग़लों को टक्कर देने में सक्षम थे। बाबर ने इन सब बारीकियों को समझा और इसीलिए उसने अपने बेटे हुमायूँ को कहा, कि वह राजपूतों से दोस्ती करे और उनसे विवाह सम्बंध स्थापित करे। हुमायूँ को तो दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने में अपनी ही जान के लाले पड़े थे इसलिए वह तो यह नहीं कर सका। लेकिन उसके बेटे अकबर को सौभाग्य से और अपने चतुर संरक्षक बैरम ख़ाँ के चलते निष्कंटक राज मिल गया। अकबर ने सचमुच में एक राष्ट्र-संघ के बारे में सोचा। और सभी स्वतंत्र शासकों को यह मानने पर बाध्य किया कि वे दिल्ली के बादशाह की अधीनता स्वीकार करें। अकबर के समय ख़ुद मुग़ल शासकों का राज्य पंजाब से लेकर गंगा-यमुना के संगम इलाहाबाद तक सीमित था। इस इलाक़े से जो कर आता वह बादशाह के ख़ज़ाने में जमा होता। इसमें भी ख़ासकर आगरा से इलाहाबाद तक की जागीर मुग़ल शासकों की निजी थी। उसने अपने दरबार में कायस्थों के अलावा राजपूतों और ब्राह्मणों को भी आश्रय दिया तथा यह भी छूट दी कि वे अपने परंपरागत पहरावे में ही दरबार में आ सकते हैं। तिलक लगा कर आने की भी छूट दी। पहली बार ब्राह्मण राज दरबार में घुसे। इनमें कालपी के एक भट्ट ब्राह्मण बीरबल और मियाँ तानसेन प्रमुख रहे। अकबर ने ही राजपूतों को सिंह सरनेम लगाने को कहा और ब्राह्मणों को आस्पद प्रदान कीं। लेकिन दोनों में से किसी ने इस नियम को नहीं माना। सिवाय जयपुर के और किसी राजपूत राजा ने सिंह सरनेम नहीं लगाया न ब्राह्मणों ने अपने आस्पद। अकबर के समकालीन किसी भी ब्राह्मण के नाम के आगे शुक्ल, मिश्र, तिवारी आदि उपनाम नहीं मिलता। यहाँ तक कि औरंगज़ेब के समय भी नहीं।
लेकिन आस्पद बाँटने का एक क़िस्सा लोक में बहुत प्रचलित है। ब्राह्मण परस्पर ऊँचे-नीचे ब्राह्मणों को लेकर बहुत लड़ते थे। कई बार आपस में लठ चलते। आगरा से लेकर इलाहाबाद तक के इन ब्राह्मणों की शिकायत दरबार में पहुँची। अकबर ने सब को बुलाया और ऊँचे या नीचे ब्राह्मणों के बीच बँटवारा किया। ऊँचे ब्राह्मणों को लगान में पूरी छूट दी गई तथा नीचे ब्राह्मणों को कम। इन कान्यकुब्ज सँवर्ग के कनौजिया ब्राह्मणों में षट-कुल (छह घर) की परंपरा यहीं से शुरू हुई। षट-कुल यानी पूरे बीस बिस्वा के कनौजियों को लगान में शत-प्रतिशत छूट। इसके बाद 16, 12, 8 और चार को इसी आधार पर छूट मिली। कहते हैं अकबर के दरबार में अपनी आस्पद लेने सबसे बाद में जो ब्राह्मण पहुँचे, वे थे चौबे, पाठक और उपाध्याय। इसीलिए कनौजियों में इन्हें सबसे छोटा माना जाता है। यह लोक मान्यता है, इसलिए इसमें कोई दुराव नहीं पालें। इन षट-कुल के बारे में कहा जाता है, कि ये ब्राह्मण इतने दुराग्रही हो गए कि न तो ये खेती करते न कोई पूजा-पाठ। न पुरोहिताई का कर्म न कोई व्यवसाय। बस षट-कुल की मर्यादा का लाभ उठाते। सभी ब्राह्मण इन षट-कुल ब्राह्मणों की पूजा करते और उन्हें भेंट देते। इनके बच्चों की शादियों में खूब दहेज मिलता और ये उसी में मस्त रहते। एक कहावत है कि एक संपन्न ब्राह्मण ने इस षट-कुल में अपनी कन्या ब्याही। खूब दहेज दिया। किंतु वर के पास भूनी-भाँग तक नहीं। एक बार उस कन्या का पिता अपनी लड़की की ससुराल गया तो देखा कि उसकी लड़की छूँछी कड़ाही में यूँ ही कलछुल चला रही है। बाप ने पूछा-“का कर रही हो बिट्टो?” बेटी ने जवाब दिया-“कुल कल्हार रही हूँ बप्पा!” यानी यह हाल था इन बीसों बिस्वा वालों का। हिंदी के प्रख्यात कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को इसी षट-कुल के चलते अपनी बेटी सरोज को गँवाना पड़ा था। बेटी की मृत्यु से आहत निराला ने कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के इस षट-कुल पर कोसते हुए लिखा था-
ये कान्यकुब्ज कुल कुलांगार,
खा कर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या अर्थ खेद।
इस विषम-बेल में विष ही फल,
है दग्ध मरुस्थल नहीं सुजल।
फिर सोचा-“मेरे पूर्वजगण
गुजरे जिस राह, वही शोभन
होगा मुझको, यह लोक-रीति
कर दूँ पूरी, गो नहीं भीति
कुछ मुझे तोड़ते गत विचार;
पर पूर्ण रूप प्राचीन भार
ढोते मैं हूँ अक्षम; निश्चय
आयेगी मुझमें नहीं विनय
उतनी जो रेखा करे पार
सौहार्द-बन्ध की, निराधार।
वे जो जमुना के-से कछार
पद फटे बिंवाई के, उधार
खाए के मुख ज्यों, पिये तेल
चमरौधे जूते से सकेल
निकले, जी लेते, घोर-गन्ध,
उन चरणों को मैं यथा अन्ध,
कल घ्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूँ, ऐसी नहीं शक्ति।
ऐसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह।
निराला जी स्वयं कान्यकुब्ज तिवारी ही थे। और इनमें दमा, गुपाल, गोवर्धन, चट्टू के तिवारी षट-कुल में माने जाते हैं तथा शिवली, सखरेज, मना, बरुआ के तिवारी गौण। संयोग देखिए, मैंने जिस शुक्ल परिवार में जन्म लिया वह कनौजियों में सबसे निचले पाँवदान पर था। किंतु मेरी मां तिवारी कुल से थीं। मान्य वर्ग में फूफा भी तिवारी और बहनोई भी। तथा मेरी एक बेटी भी तिवारी कुल में ब्याही है। इस नाते मैं यह तो कह ही सकता हूँ कि तिवारी सरल होते हैं।
तिवारी या त्रिपाठी गुजरात, ओडीसा और बंगाल में भी मिलते हैं तथा पंजाब में भी। कनौजियों के अलावा सरयूपारीण ब्राह्मणों में भी तिवारी होते हैं तथा गौड़ ब्राह्मणों में भी। भूमिहार ब्राह्मण भी तिवारी सरनेम लगाते हैं। यह उपनाम नेपाल में भी खूब मिलता है। कुछ मुस्लिम भी तिवारी लिखते हैं और ईसाई तो काफ़ी संख्या में मिल जाएँगे। लेकिन माना जाता है कि तिवारी या त्रिपाठी मूल रूप से कान्यकुब्ज जनपद के हैं और यहीं से निकल कर वे बाहर गए। ओडीसा में त्रिपाठी लोग संस्कृत और ओड़िया के प्रतिष्ठित साहित्यकार भी हुए हैं। इसी तरह गुजराती साहित्य में भी त्रिपाठियों का बड़ा नाम है। कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी पंजाब से हैं। उनके पिता डॉ. विश्वनाथ तिवारी पंजाबी के प्रसिद्ध कवि थे उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था। हिंदी और अंग्रेज़ी में भी उन्होंने लिखा है। 1982 में कांग्रेस के टिकट पर वे राज्यसभा के लिए चुने गए। पर 1984 में सिख आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी। वे चंडीगढ़ में पंजाब यूनिवर्सिटी के पंजाबी भाषा विभाग में भाई वीर सिंह चेयर के अध्यक्ष थे। मनीष की माँ अमृत कौर सिख परिवार से थीं और वे भी पंजाबी की कवि थीं। मनीष जी के पिता ने एक बार कहा था कि उनका परिवार डेढ़ सौ साल पहले उन्नाव से पंजाब आ कर बसा था।

हमारी अन्य खबरों को पढ़ने के लिए www.hindustandailynews.com पर क्लिक करें।

आवश्यकता है संवाददाताओं की

तेजी से उभरते न्यूज पोर्टल www.hindustandailynews.com को गोण्डा जिले के सभी विकास खण्डों व समाचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों तथा देवीपाटन, अयोध्या, बस्ती तथा लखनऊ मण्डलों के अन्तर्गत आने वाले जनपद मुख्यालयों पर युवा व उत्साही संवाददाताओं की आवश्यकता है। मोबाइल अथवा कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग का ज्ञान होना आवश्यक है। इच्छुक युवक युवतियां अपना बायोडाटा निम्न पते पर भेजें : jsdwivedi68@gmail.com
जानकी शरण द्विवेदी
सम्पादक
मोबाइल – 9452137310

कलमकारों से ..

तेजी से उभरते न्यूज पोर्टल www.hindustandailynews.com पर प्रकाशन के इच्छुक कविता, कहानियां, महिला जगत, युवा कोना, सम सामयिक विषयों, राजनीति, धर्म-कर्म, साहित्य एवं संस्कृति, मनोरंजन, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं तकनीक इत्यादि विषयों पर लेखन करने वाले महानुभाव अपनी मौलिक रचनाएं एक पासपोर्ट आकार के छाया चित्र के साथ मंगल फाण्ट में टाइप करके हमें प्रकाशनार्थ प्रेषित कर सकते हैं। हम उन्हें स्थान देने का पूरा प्रयास करेंगे :
जानकी शरण द्विवेदी
सम्पादक
E-Mail : jsdwivedi68@gmail.com

क्या आप श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के सदस्य बनना चाहते हैं?

मित्रों, सादर नमस्कार!
जैसा कि आप अवगत हैं कि इन दिनों देश के सबसे बड़े पत्रकार संगठन इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स से सम्बद्ध जिला इकाई गोण्डा श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के पुनर्गठन की प्रक्रिया प्रचलित है। पत्रकारों के इस विशिष्ट समूह को मुख्यालय के लगभग सभी वरिष्ठ पत्रकारों का समर्थन व सहयोग प्राप्त है। संगठन की प्रदेश इकाई द्वारा जानकी शरण द्विवेदी (9452137310) के संयोजन में एक संयोजक मण्डल का गठन किया गया है, जिसमें उमा नाथ तिवारी (7398483009) व राज कुमार सिंह (8318482987) शामिल हैं। सदस्यता अभियान शुरू है। यूनियन के अनेक वरिष्ठ साथियों के पास संगठन का फार्म उपलब्ध है। जिन पत्रकार मित्रों को हमारे संगठन की सदस्यता लेनी है, वे सदस्यता फार्म को पूर्ण रूप से भरकर पासपोर्ट आकार की एक फोटो, आधार कार्ड व बैंक पासबुक की फोटो कापी के साथ 400 रुपए जमा करके सदस्य बन सकते हैं। होली से पूर्व नई कार्यसमिति के गठन का प्रयास है। शर्त यह है कि इच्छुक व्यक्ति किसी समाचार पत्र, चैनल अथवा पोर्टल से सक्रिय रूप से जुड़ा हो। हम आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि भावी संगठन पत्रकारों के हक की लड़ाई लड़ने और उन्हें सम्मान दिलाने में सफल होगा। यहां यह बता देना समीचीन होगा कि हमारे संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीवी मल्लिकार्जुनैया जी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमंत तिवारी जी तथा राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पाण्डेय जी हैं। मल्लिकार्जुनैया जी का कन्नड़ पत्रकारिता में बड़ा नाम है। वह कनार्टक राज्य से हैं। हेमंत जी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं और सम्प्रति राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हैं। परमांनद जी देश की राजधानी दिल्ली के निवासी तथा उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता भी हैं, जो हमेशा न्यायालय में पत्रकार हितों की लड़ाई लड़ते रहते हैं।

RELATED ARTICLES

Most Popular