फर्रुखाबाद (हि.स.)। जंगे-ए-कर्बला का ऐतिहासिक वाक्या जो इस्लामी तारीखों के साथ लंबे अरसे के बाद भी आज तक लोगों की जुबां पर तरोताजा है। उसके मुताबिक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने साथी कुनबे के साथ शहादत दी थी। उस वक्त विरोधी यजीदी समझे थे कि व जंग जीत गए और अब सब कुछ उन्हीं के तौर से होगा।
यही सोच कर खुशियां मना रहे थे, कि तब तक हुसैन के बेटे व दूसरे लोगों ने दुनिया के सामने सच्चाई बयां कर दी। हकीकत से पर्दा उठते ही गैर इंसानियत पसंद काम करने बालों के खिलाफ सारी दुनिया के लोग विरोध में आकर खड़े हो गए । इस काम में शहादत के बाद से केवल 40 दिन का ही अरसा गुजरा और आखिर गैर इंसानियत पर चलकर खून खराबा करने वाले हार गए। वह इस्लामिक तवारीख के मुताबिक यही आज का दिन था।
तब से लेकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत को सजदा कर उनके मानने वाले चेहल्लुम रस्म पूरी करके, ताजिए सुपुर्द-ए-खाक करते हैं। इसको मानते हुए आज चेहल्लुम के मौके पर अकीदतमंदों द्वारा नजर-ए-न्याज फातिहा ख्वानी के वाद मजलिस-ए पढ़ी गयी। वही जगह-जगह शरबत पिलाते हुए, तबर्रुक तक्सीम कर लंगर चलाए गए। प्रसाद के रूप में इमाम के चाहने वालों ने बांटी गई चीजें यकीन के साथ ली।
इस मौके पर कायमगंज क्षेत्र के ग्राम कटरा भुड़िया, लालबाग अताईपुर, किला चौक, मऊ रसीदाबाद, गऊटोला, कुबेरपुर आदि स्थानों पर से पूरी संजीदगी के साथ रखे गए ताजिए उठाए गए। दिन के लगभग 2:00 बजे सभी ताजिए मैदान ए कर्बला में सुपुर्द ए खाक कर दिए गए। इस मौके पर तमाम शिद्दत पसंद लोगों की आंखें नम होती दिखाई दी। ताजिया उठाने से लेकर पूरे रास्ते भर एवं कर्बला तक सुरक्षा व्यवस्था के लिए प्रशासनिक स्तर से पुलिस की पूरी तरह व्यवस्था चाक-चौबंद रही।
