Wednesday, February 11, 2026
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ढाई दशक में पहली बार मार्च-अप्रैल में होगा पंचायत चुनाव

प्रादेशिक डेस्क

लखनऊ। उप्र में पिछले दो-ढाई दशक की बात करें तो तीनों प्रमुख पार्टियों सपा-बसपा और भाजपा के हाथ सूबे की सत्ता रही है। इस दौरान सभी पार्टियों ने मार्च-अप्रैल में चुनाव से दूरी बनाई है। पिछले ढाई दशक में इस बार पहला मौका है जब मार्च-अप्रैल में पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं। शायद हाईकोर्ट का सख्त आदेश न होता तो शायद इस बार भी मार्च-अप्रैल में चुनाव नहीं होते।
दो दशक पहले की बात करें तो उस समय प्रदेश की सत्ता भाजपा के हाथों में थी। वर्ष 1995 में तो पंचायत का चुनाव मार्च-अप्रैल में हुआ था लेकिन उसके बाद कभी नहीं हुआ। 1995 के बाद प्रदेश में बसपा की मायावती, भाजपा के कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, रामप्रकाश गुप्ता, सपा के मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकारें रहीं। लेकिन कभी इन दो महीनों में चुनाव नहीं हुआ। राज्य निर्वाचन आयोग के रिकार्ड के मुताबिक वर्ष 2000 का पंचायत चुनाव मई-जून में, 2005 का चुनाव जुलाई में शुरू होकर अक्टूबर तक चला। इसी तरह वर्ष 2010 में सितंबर-अक्टूबर में और पिछला यानी 2015 में पंचायत का चुनाव सितंबर से दिसंबर के बीच कराया गया था। मार्च-अप्रैल में चुनाव नहीं कराने के पीछे तर्क भी दिया जाता रहा। कहा गया कि वित्तीय वर्ष का अंतिम माह होने से मार्च में सरकारी कर्मियों की व्यस्तता अधिक रहती है। गेहूं सहित रबी फसलों की कटाई होने से किसान भी खाली नहीं रहते हैं। इस बार कोरोना के कारण यदि कोई दिक्कत न होती तो अक्टूबर से दिसंबर के बीच ही चुनाव होते। सरकार की तरफ से परिसीमन और आरक्षण का काम समय से न कराने के कारण चुनाव टलता जा रहा था। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 25 दिसंबर को समाप्त हुआ था इसलिए उससे अधिकतम छह माह यानी 25 जून से पहले ही चुनाव कराए जाने की अनिवार्यता थी। ऐसे में सरकार की जो तैयारी थी और आयोग ने जैसा अपना कार्यक्रम बनाया था, उससे मई तक चुनाव प्रक्रिया चलनी थी लेकिन अब हाईकोर्ट के आदेश से चुनाव तो मार्च-अप्रैल में ही होने हैं। आयोग के अपर निर्वाचन आयुक्त वेद प्रकाश वर्मा का कहना है कि राज्य सरकार जैसे ही पदों के आरक्षण की अधिसूचना आयोग को उपलब्ध करा देगी, आयोग चुनाव की अधिसूचना जारी कर देगा ताकि कोर्ट द्वारा तय समय सीमा में ही चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जा सके।
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट के कड़े तेवर दिखाने के बाद चुनावी प्रक्रिया तेज करने को लेकर सरकार की सक्रियता बढ़ी है। आरक्षण नीति को लेकर पेच फंसा है, लेकिन चक्रानुक्रम फार्मूले पर पंचायतों का आरक्षण निर्धारित होना तय है। यानी पिछले चुनाव में जिस वर्ग के लिए सीट आरक्षित थी, इस बार उस वर्ग में आरक्षित नहीं होगी। गत पांच चुनावों में अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित नहीं रहीं क्षेत्र व जिला पंचायतों को इस बार आरक्षित किया जाएगा। दूसरी ओर लगातार आरक्षण के दायरे में आयी सीटों को इस बार अनारक्षित किए जाने की राह तलाशी जा रही है। आरक्षण के इन प्रस्तावों पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है। पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जल्द ही इस बारे में फैसला लिया जाएगा। नई नीति में ऐसी व्यवस्था करने की तैयारी है कि अनुसूचित वर्ग के आरक्षण की पूर्ति हो सके और अनारक्षित वर्ग की उपेक्षा भी न होने पाए। इसके लिए सरकार ने वर्ष 2015 से पहले हुए चार चुनावों में आरक्षित सीटों का आकलन करा लिया है। आरक्षण की व्यवस्था चक्रानुक्रम रखते हुए इसमें यह शर्त जोड़ी जा सकती है कि यदि कोई सीट वर्ष 2015 में अनुसूचित या पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित थी तो इस बार यथासंभव इन वर्गों के लिए आरक्षित न की जाए।
पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी की सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2015 में ग्राम पंचायतों का आरक्षण शून्य मानकर नए सिरे से आरक्षण लागू किया गया था। क्षेत्र व जिला पंचायतों में वर्ष 1995 के आरक्षण को आधार मानकर सीटों का आरक्षण चक्रानुक्रम से कराया गया था। सूत्रों का कहना है कि सरकार आरक्षण चक्र को शून्य करने के पक्ष में नहीं है। पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है, जिसे वरीयता क्रम के अनुसार लागू किया जाता है। यानि पहला नंबर अनुसूचित जाति वर्ग की महिला का होगा। अनुसूचित वर्ग की कुल आरक्षित 21 प्रतिशत सीटों में से एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसी तरह पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित 27 प्रतिशत सीटों में भी पहली वरीयता महिलाओं को दी जाएगी। अनारक्षित सीटों पर सामान्य वर्ग से लेकर किसी भी जाति का व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। ग्राम प्रधान पद का आरक्षण आबादी के आधार पर तय किया जाता है। आरक्षित वर्ग की जनसंख्या अधिक होने पर ब्लाक को केंद्र मानकर ग्राम प्रधान का आरक्षण निर्धारित किया जाता है। क्षेत्र पंचायत का आरक्षण जिले की आबादी के आधार पर किया जाता है। इसी क्रम में जिला पंचायत का आरक्षण प्रदेश स्तर पर तय होगा।

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