Wednesday, April 1, 2026
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ड्रग्स पर छूट होने तक शांति थी, एनसीबी सक्रिय हुआ तो मचा बवाल

सुरेंद्र किशोर

पिछले कुछ महीनों में एनसीबी ने अपनी धरपकड़ बढ़ाई है जिसकी वजह से मुंबई के एक खास वर्ग को परेशानी हो रही है। जब नशे के सौदागरों को उच्च स्तर से बचाने व संरक्षण देने का दौर चल रहा था,तब तक हर जगह शांति थी। लेकिन सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जब नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने मुंबई में अपनी सक्रियता तेज कर दी तो लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया। पिछले कुछ महीनों में एनसीबी ने अपराधियों को गिरफ्त में लेने का एक रिकॉर्ड बनाया है। सरकारी एजेंसियों और नशे के सौदागरों के बीच सह अस्तित्व की कहानी चर्चित वोहरा कमेटी की रपट में दर्ज है। तरह-तरह के नशीली पदार्थ लेने के कारण किस तरह पीढ़ियां बर्बाद होती रही हैं,इस बात से लोगबाग तब भी अवगत थे और आज भी हैं। फिर भी तब सौदागर लगभग निश्चिंत होकर अपने काम में जुटे थे। वैसे अब काफी फर्क आया है। लेकिन ऐसे नशा विरोधी अभियान की एक कीमत है जो कर्तव्यनिष्ठ अफसरों को चुकानी पड़ सकती है। देखना है कि इसकी तार्किक परिणति कैसी होती है। सन 1993 में बंबई में हुए सिरियल बम विस्फोटों के बाद वोहरा कमेटी का गठन किया गया था। मुंबई में 12 जगहों पर भीषण बम विस्फोटों के पीछे माफिया गिरोह का हाथ था। उन विस्फोटों में 257 लोगों की जानें गई थीं। मुंबई के माफिया गिरोह अन्य अपराधों के साथ-साथ नशीली पदार्थों की तस्करी के धंधे में भी लगे रहते हैं।
जानकार सूत्रों के अनुसार, नशे के व्यापार से आए पैसों में 15 प्रतिशत पैसों का इस्तेमाल कश्मीर में आतंक फैलाने में भी खर्च होता रहा है। तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एनएन वोहरा के नेतृत्व में गठित उस चर्चित कमेटी में केंद्र सरकार के राजस्व सचिव भी सदस्य थे। वोहरा समिति की रपट का एक अंश नशीली पदार्थों के सौदागरों और लाभुकों की अपार ताकत की पूरी तस्वीर पेश करता है। वोहरा समिति ने अपनी रपट 1993 में ही केंद्र सरकार को सौंप दी थी। उसमें नशा के अलावा भी बहुत सारी बातें हैं जो देश की सुरक्षा से जुड़ी हैं। पांच दिसंबर, 1993 को एनएन वोहरा ने अपनी सनसनीखेज रपट गृह मंत्री को सौंपी थी। रपट में कहा गया कि ‘इस देश में अपराधी गिरोहों, हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों, तस्कर गिरोहों, आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लॉबियों का तेजी से प्रसार हुआ है।’ रपट के मुताबिक, इन लोगों ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी पदों पर आसीन लोगों, राज नेताओं, मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किये हैं। इनमें से कुछ सिंडिकेटों की विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय सबंध भी हैं।’’
समिति की मुख्य सलाह यह है कि गृह मंत्रालय के तहत एक नोडल एजेंसी तैयार हो जो देश में जो भी गलत काम हो रहे हैं, उसकी सूचना वह एजेंसी एकत्र करे। ऐसी पक्की व्यवस्था भी की जाए ताकि सूचनाएं लीक नहीं हों। वोहरा रपट तो व्यापक है। लेकिन अभी जो कुछ मुम्बई में हो रहा है, इसका अंदाजा वोहरा रपट में शामिल राजस्व सचिव की टिप्पणी से मिलता है। केंद्रीय राजस्व सचिव की टिप्पणी से साफ जाहिर है कि किस तरह पहले नशे के छोटे -बड़े सौदागरों व उनके मददगार अफसरों को संरक्षण मिल जाया करता था। राजस्व सचिव के अनुसार, ‘राजस्व विभाग के अधीन विभिन्न एजेंसियों द्वारा,उनके द्वारा प्रशासित कानूनों से संबंधित अपराधों के बारे में आसूचना एकत्र करते समय एकत्र की गई सूचना का सामान्य तौर पर कोई इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इस्तेमाल तब तक नहीं किया जाता है जब तक कि इसे राजस्व विभाग के बाहर के अन्य आसूचना एजेंसियों को दिए जाने की आवश्यकता न हो। राजस्व सचिव ने तब कहा था कि ‘आपराधिक सिंडिकेटों द्वारा कायम संबंधों की आम तौर पर तभी पुष्टि होती है जब संबंधित एजेंसियों पर अपराधियों के विरूद्ध कार्रवाई न करने या उनके खिलाफ मामलों में कार्रवाई को धीमा करने के लिए दबाव पड़ता है।’ राजस्व सचिव लिखते हैं ‘इस प्रकार के दबाव या तो छापा डाले जाने के तुरंत बाद पड़ते हैं अथवा उस समय जब अभियोजन की कार्रवाई शुरू की जाने वाली होती है। ये दबाव तब भी डाले जाते हैं,जब कभी भ्रष्ट या अवांछित अधिकारियों को संवेदनशील दायित्वों से अलग स्थानांतरित किया जाता है।’
राजस्व सचिव ने यह भी कहा है कि ‘मादक द्रव्यों के क्षेत्र में, जिसमें अफीम की खेती, नारकोटिक्स की तस्करी आदि शामिल हैं, बहुत बड़े वित्तीय दांव लगे होते हैं। इसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार बहुत अधिक है। यहां तक कि अधीनस्थ अधिकारियों का स्थानंतरण किए जाने पर, बहुत अधिक दबाव डाला जाता है। विशेषकर उन अधिकारियों के तबादले पर जिनकी मदद से गलत काम करने वाले लोग आसानी से धन कमा रहे होते हैं।’ राजस्व सचिव के अनुसार, ‘मादक द्रव्यों के व्यापार में तस्करों का एक विश्वव्यापी नेटवर्क है, जिनका आतंकवादियों के साथ भी बड़ा करीबी संबंध है। आतंकवादी बड़े पैमाने पर विभिन्न विदेशी करेंसियों में धन एकत्र करने के लिए मादक द्रव्यों के व्यापार में संलिप्त होते हैं और यह धन उनके हथियार की खरीद का स्त्रोत बनता है।’ इस तरह राजस्व सचिव के नोट से यह स्पष्ट है कि नशे के व्यापार को नुकसान पहुंचाने का जब केंद्र सरकार व उसकी एजेंसिंयां बीड़ा उठा ले तो तरह-तरह के निहित स्वार्थी तत्वों को कितनी पीड़ा होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। क्या उसी तरह की पीड़ा से मुंबई के प्रभु वर्ग का एक हिस्सा इन दिनों गुजर रहा है? क्या वह वर्ग एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर के कैरियर को बर्बाद करने पर इसीलिए तुला हुआ है? यदि उस अफसर के खिलाफ आरोप सचमुच साबित हो जाए तो उसे नुकसान पहुंच सकता है, किंतु उससे केंद्रीय एजेंसियों के अभियान की गति में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, ऐसे भी संकेत हैं। भले अभी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने फिलहाल मुंबई पर ध्यान केंद्रित किया है,किंतु उसे देर-सवेर देश के अन्य स्थानों पर भी ध्यान देना होगा। वहां जहां नशे की अधिकता के कारण पीढ़ियां बर्बाद हो रही है। यदि नशे के सौदागरों पर कारगर अंकुश लग जाए तो आतंकवादी गतिविधियां भी इस देश में कमजोर होंगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सम सामयिक विषयों पर टिप्पणीकार हैं।)

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