राज खन्ना
अप्रेल 1946 की शुरुआत में मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम विधायक सम्मेलन का आयोजन किया। केंद्रीय और प्रांतीय असेंबलियों के लगभग चार सौ मुस्लिम सदस्य इसमें शामिल हुए। जिन्ना ने इस मौके पर कहा, “हम हर कुर्बानी देने को तैयार हैं लेकिन हम बिना अपनी सहमति के बनी किसी सरकार के लिए तैयार नहीं होंगे। यह सम्मेलन हमेशा-हमेशा के लिए साफ-साफ शब्दों में यह तय करेगा कि हम क्या चाहते हैं? हम सर्वसम्मति से पाकिस्तान चाहते हैं। हम उसके लिए लड़ेंगे और जरूरी हुआ तो अपनी जान भी दे देंगे। हम उसे हासिल करके रहेंगे या मिट जाएंगे।“ जुलाई 1946 के आखि़र तक जिन्ना और तल्ख़ हो गए। बम्बई में मुस्लिम लीग काउंसिल के साढ़े चार सौ सदस्यों में जिन्ना जोश भर रहे थे, “अगर आपके पास पूरी ताकत नहीं है तो ताकत पैदा कीजिये। मुस्लिम लीग ने सब कुछ करके देख लिया है। भारत की समस्या का एकमात्र हल पाकिस्तान है। जब तक कांग्रेस और मि. गांधी यह दावा करते रहेंगे कि वे पूरे देश की नुमाइंदगी करते हैं…..जब तक वे सच्ची हकीकत और सम्पूर्ण सत्य से इनकार करते रहेंगे कि मुसलमानों का एकमात्र अधिकारपूर्ण संगठन मुस्लिम लीग है और जब तक वे इसी कुटिल चक्र में घूमते रहेंगे तब तक न कोई समझौता हो सकता है, न ही कोई आजादी मिल सकती है। ..अब तो मिस्टर गांधी सारी दुनिया के सलाहकार की भाषा बोलने लगे हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस भारत की जनता की ट्रस्टी है। पिछले डेढ़ सौ सालों में इस ट्रस्टी का हमें काफी तजुर्बा हो चुका है। हम कांग्रेस को अपना ट्रस्टी नहीं बनाना चाहते। हम बड़े हो चुके हैं। मुसलमानों का केवल एक ट्रस्टी है और वह है मुसलमान राष्ट्र।“ जिन्ना के इस भाषण के अगले दिन लीग काउंसिल की बैठक में हसरत मोहानी चीखे,“ हमें रोशनी का केवल एक ही मीनार रास्ता दिखा सकती है और वह है पूरी तौर पर पृथक पाकिस्तान का राज्य। सिर्फ कायद-ए-आज़म के कहने भर की देर है, हिंदुस्तान के मुसलमान पल भर में बगावत का झंडा उठा लेंगे।“ राजा गजंफर अली खान ने ललकारा, “अगर मि. जिन्ना आवाज देंगे तो जिंदगी के हर हलके से मुसलमान पाकिस्तान हासिल करने के लिए संघर्ष में कूद पड़ेंगे।“
लीग काउंसिल के पूर्ण समर्थन के बाद 29 जुलाई 1946 को जिन्ना की सदारत में लीग की वर्किंग कमेटी ने प्रस्ताव पारित किया, “चूंकि मुसलमान-भारत कोशिश कर-करके थक चुका है, पर उसे समझौते और संवैधानिक तरीकों से भारतीय समस्या का शांतिपूर्ण समाधान करने में कामयाबी नहीं मिल पायी है, चूंकि कांग्रेस अंग्रेजों से सांठगांठ करके भारत में ऊंची जाति के हिन्दुओं की हुकमत कायम करने पर तुली हुई है। चूंकि हाल के घटनाक्रम से साबित हो गया है कि भारतीय मसलों का फैसला ताकत की राजनीति के दम पर होता है, न कि ईमानदारी और इंसाफ़ की बिनाह पर। चूंकि अब पूरी तौर पर साफ हो गया है कि भारत के मुसलमान अब आजाद और पूरी तौर पर संप्रभु पाकिस्तान राज्य की स्थापना के बिना चैन से नहीं बैठेंगे…वक्त आ गया है कि मुसलमान पाकिस्तान राष्ट्र हासिल करने के लिए सीधी कार्रवाई पर उतर कर अपने हकों की दावेदारी करें, अपने गौरव की रक्षा करें, अंग्रेजों की मौजूदा गुलामी और ऊंची जाति के हिन्दू प्रभुत्व के अंदेशे से छुटकारा हासिल करें।“ इस प्रस्ताव को पारित किए जाने के बाद जिन्ना ने कहा, “जिन दो पक्षों से हम वार्ता कर रहे थे, उन्होंने पूरी वार्ता के दौरान हम पर पिस्तौलें ताने रखीं। एक की पिस्तौल के पीछे सत्ता और मशीनगनें थीं और दूसरे की पिस्तौल के पीछे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की धमकी थी। हमें इस हालात का मुकाबला करना ही होगा। हमारे पास भी एक पिस्तौल है।“ जिन्ना जो कह रहे थे, उसे लीग ने कर दिखाया। 16 अगस्त 1946 को सुहरावर्दी की अगुवाई वाली मुस्लिम लीग की सरकार की सरपरस्ती में कलकत्ता में हिंदुओं का व्यापक नरसंहार हुआ। आने वाले काफी दिनों तक प्रतिशोध-हिंसा और साम्प्रदायिक दंगों की आग में बिहार से पंजाब तक के प्रांत जले। इनमें दोनों ओर से मरने वालों की गिनती मुमकिन नही थी। जिन्ना को बेहिसाब मौतों और जनधन की हानि का कोई अफसोस नहीं था। इतिहास की इस शर्मनाक त्रासदी ने उनके पाकिस्तान के सपने को सच करने का काम और आसान कर दिया। अंग्रेजों की गुलामी से निजात पाने के लिए क्रांतिकारी रहे हों या फिर बापू के रास्ते चलने-लड़ने वाले अहिंसक सेनानी। सबकी कुर्बानियों का गौरवशाली लम्बा सिलसिला और इतिहास है। दूसरी ओर जिन्ना को कांग्रेस के मुकाबले खडा होने के लिए अंग्रेजों का भरपूर साथ और समर्थन मिला। उन्हें सिर्फ एक काम करना था- हिंदुओं मुसलमानों के बीच दूरी और नफ़रत बढाना। आजादी की लड़ाई के दौरान जिन्ना ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया। दिल्ली से कराची रवानगी की पूर्व संध्या पर 7 अगस्त 1947 को उन्होंने अपने सन्देश में कहा था, “अतीत को गाड़ दिया जाना चाहिए और हमें हिंदुस्तान और पाकिस्तान-दो स्वतंत्र संप्रभु देशो के रूप में नई शुरुआत करनी चाहिए। मैं हिंदुस्तान के लिए शांति और समृद्धि की कामना करता हूँ।“ क्या ऐसा मुमकिन था? नफ़रत के बबूल से कैसे फल की उम्मीद की जा सकती है! गुजरे 75 सालों से जिन्ना का जिन्न देश को परेशान किये रहता है।…. जब-तब निकल पड़ता है!
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कलमकार हैं।)
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