Sunday, February 8, 2026
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जातीय जनगणना को हवा देकर भाजपा के वोट बैंक को कम नहीं कर पाएंगी क्षेत्रीय पार्टियां

लखनऊ (हि.स.)। पिछड़ी और अति पिछड़े वर्ग को भाजपा ने पहले से ही अच्छी संख्या में भागीदारी दे रखी है। इसके बावजूद बिहार में हुई जातीय जनगणना ने भाजपा नेताओं के चेहरे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी है। इस जनगणना का चुनाव पर बहुत ज्यादा असर तो नहीं पड़ने वाला है, लेकिन जातीय जनगणना की काट भाजपा को जल्द तलाशना पड़ेगा। उप्र में 2001 में सामाजिक न्याय समिति का गठन कर एक सर्वे कराया था, जिसके अनुसार पिछडा वर्ग 54.5 प्रतिशत है।

इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि इसको लेकर क्षेत्रीय पार्टियां बड़ा मुद्दा बनाना चाहती है, लेकिन यह बड़ा मुद्दा नहीं बन पाएगा। इसके बावजूद भाजपा को इसकी काट तलाशनी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन अक्टूबर को गरीबी पर बात कर एक नए बहस को जन्म दे दिया है। यदि इस मुद्दे को आगे बढ़ाया जाता है तो यह बहस का केंद्र बन सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार विजय पांडेय का कहना है कि राजनीति में क्षुद्र मानसिकता के लोग ज्यादा आ गये हैं, जो सिर्फ और सिर्फ अपना हित चाहते हैं। उनके लिए देश बिक जाय, उनको गद्दी चाहिए। यही कारण है कि कुछ लोग इस जातिगत मानसिकता को हवा दे रहे हैं। इसको ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां आगे बढ़ा रही है, लेकिन वे सफल नहीं हो पाएंगी।

वरिष्ठ पत्रकार के.के. मिश्रा का कहना है कि यह मुद्दा अभी भले गर्म हो, लेकिन बहुत जल्द यह ठंडे बस्ते में चला जाएगा। बिहार में जो जातिगत जनगणना में सामने आया है। वह पहले से ही लोगों का अनुमान था। उससे इधर-उधर नहीं है, जबकि वरिष्ठ पत्रकार सुनील शर्मा का कहना है कि यह सिर्फ एक-दूसरे को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने का तरीका है। इसमें क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादा आगे बढ़कर बोल रही हैं।

उपेन्द्र/मोहित

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