डा. राकेश भारती
23 सितंबर, 1895 को जम्मू में जन्मे हरी सिंह महाराजा प्रतापसिंह के भाई राजा अमर सिंह के पुत्र थे। महाराजा हरी सिंह की चर्चा मुख्यतः 1947-48 में जम्मू कश्मीर के भारत में विलय और पाकिस्तान की साजिशों के संदर्भ में होती है। उनको केवल इस संदर्भ में देखना उनके व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी होगी। उनके कार्यकाल में किए गए विविध सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक सुधार आज भी उनकी नेतृत्व क्षमता को दर्शाते हैं। महाराजा हरी सिंह को सदैव सामाजिक सुधारों के प्रणोता और आधुनिक व समावेशी शिक्षा के शिल्पकार के रूप में सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। उनकी महत्वाकांक्षा जम्मू-कश्मीर राज्य को शैक्षिक रूप से आधुनिक और उन्नत राज्य बनाने की थी। महाराजा ने राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्राथमिक से लेकर कालेज स्तर तक की संस्थाओं की एक प्रभावी श्रृंखला स्थापित की। महाराजा ने 6-14 वर्ष के आयु वर्ग में निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का प्रविधान राज्य में लागू किया। शिक्षा बजट 1907 में दो लाख रुपये से बढ़ाकर 1931 में साढ़े उन्नीस लाख कर दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप राज्य में स्कूलों की संख्या 1925 के 706 से बढ़कर 1945 में 20,728 हो गई। बच्चों को आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए अनिवार्य रूप से स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया गया और कुछ लोगों ने इसे जबरी स्कूल (बलपूर्वक) का नाम दे दिया।
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पिछड़े वर्ग के छात्रों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बड़ी संख्या में छात्रवृत्तियां प्रदान करना महाराजा के समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने 1938 में राज्य में शिक्षा की बुनियादी योजना को व्यावहारिक रूप देने के लिए केजी सैयदैन की अध्यक्षता में एक शिक्षा पुनर्गठन समिति का गठन किया गया था। विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए शिल्प कार्य, बागवानी, लकड़ी का काम, कताई और बुनाई जैसे कार्यक्रम पाठ्यक्रम में निर्धारित कर रटकर सीखने के बजाय रचनात्मक तरीके से सीखने पर जोर दिया गया। आधुनिक शिक्षा और व्यापक अनुभव ने महाराजा हरी सिंह को सामाजिक समानता के लिए प्रतिबद्ध किया जिसमें महिलाएं मुख्य रूप से शामिल थीं। तत्कालीन विरोध के बावजूद महाराजा ने सह-शिक्षा (को-एजुकेशन) को भी राज्य में सफलतापूर्वक बढ़ावा दिया। राज्य में तालीम-ए-वालिदैन के नाम से वयस्क निरक्षरता के खिलाफ एक विशेष अभियान शुरू किया गया था। महाराजा हरी सिंह मानते थे कि शिक्षा सामाजिक प्रगति का सबसे बड़ा कारक है। सामाजिक-आर्थिक समानता लाने के लिए उन्होंने जाति, धर्म, पंथ, लिंग, क्षेत्र आदि के भेदों को नकार कर राज्य में निरक्षरता के खिलाफ अभियान में ठोस प्रयास किए।
(लेखक जम्मू विश्वविद्यालय के दूरस्थ शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं)
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