Wednesday, January 14, 2026
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जब राज्यपाल को इस्तीफा देकर रिक्शे से घर लौटे मुख्यमंत्री!

फीचर डेस्क

उत्तर प्रदेश को कुशल नेताओं की फैक्ट्री कहा जाता है. सूबे के कई नेता प्रधानमंत्री बने, मुख्यमंत्री बने तो वहीं कुछ ऐसे भी किरदार उभर कर सामने आए, जो केवल अपने आंदोलनों के लिए जाने गए. खैर, सूची बड़ी है, सो बीते कल के किस्सों की कड़ी को अपने उस सियासी किरदार की ओर मोड़ेंगे, जिसे उपचुनाव में मिली पराजय के बाद मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था. वह राज्यपाल को इस्तीफा देने के बाद सरकारी गाड़ी छोड़ दिया बौर रिक्शे पर बैठकर अपने घर लौट गए थे. हालांकि, कुछ लोगों ने उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश जरूर की थी, पर वे रूके नहीं थे. ऐसा था पहले के नेताओं का चरित्र. हम यहां बात कर रहे हैं सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव की. दरअसल, आजमगढ़ उपचुनाव में मिली पराजय के बाद उन्हें मुख्यमंत्री के पद इस्तीफा देना पड़ा था, जिसके बाद जनता पार्टी ने बिगड़े सियासी हालात को यथाशीघ्र दुरुस्त करने के मकसद से बनारसी दास को यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया. बताते चलें कि रामनरेश यादव की सरकार में ही मुलायम सिंह पहली बार राज्यमंत्री बने थे.
यूपी की सियासत में कई ऐसे मुख्यमंत्री हुए, जिनको लेकर कोई न कोई किस्सा गाहे-बगाहे सामने आते रहे. रामनरेश यादव भी ऐसे ही मुख्यमंत्रियों में एक हैं. साल 1977 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के लिए राज्यपाल को सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए वे रिक्शे से ही राजभवन गए थे और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भी वह रिक्शे से ही अपने घर लौटे. यूपी की सियासत में रामनरेश यादव एक ऐसी पहेली रहे, जिन पर लगातार शोध की जरूरत जान पड़ती है. साथ ही यह सवाल भी उठते हैं कि आखिर क्यों उन्हें 1977 में मुख्यमंत्री बनाया गया था, उनके मुख्यमंत्री बनने से किसे लाभ हुआ था? खैर, ये ऐसे सवाल हैं, जिनके उत्तर आज भी नहीं मिल सके हैं. लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि रामनरेश यादव सादगी की वह प्रतिमूर्ति बने, जिनकी छवि बेदाग और ईमानदार के रूप में थी. वहीं, फरेब और छल-प्रपंच की सियासी से दूर रामनरेश यादव ने सूबे के पिछड़ों को यह रास्ता दिखा दिया कि चाहे लखनऊ की गद्दी हो या फिर दिल्ली की, उनकी पहुंच से दूर नहीं है. एक बार रामनरेश यादव किसी काम के सिलसिले में समाजवादी नेता राजनारायण से मिलने गए थे और उनसे मिलते ही राजनारायण की आंखों में चमक आ गई। वो उन्हें जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मिलवाने ले गए. उस वक्त यूपी विधानसभा में जनता पार्टी बहुमत में थी. लेकिन जनता पार्टी के नेता इस उधेड़बुन में थे कि किसे मुख्यमंत्री बनाया जाए राजनारायण ने उस दिन रामनरेश यादव को चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई से मिलवाया थे. इस मुलाकात के बाद तत्काल उन्हें एक पत्र दिया गया और इसके साथ ही हिदायत भी दी गई कि पत्र को बिना किसी को बताए सूबे के राज्यपाल को वो सौपेंगे. ऐसे में उस पत्र लेकर रामनरेश यादव दिल्ली से लखनऊ आए और एक रिक्शे पर बैठकर राजभवन पहुंचे. हालांकि, राजभवन आने के क्रम में उन्हें रास्ते में रवींद्रालय के सामने आकाशवाणी के एक वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे अपनी गाड़ी में बैठने को कहा, पर उन्होंने गाड़ी में बैठने से इनकार कर दिया. इधर, राजभवन में राज्यपाल से मिलने के बाद 23 जून, 1977 को रामनरेश यादव ने यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
रामनरेश यादव का जन्म एक जुलाई, 1928 को यूपी के आजमगढ़ जिले के गांव आंधीपुर में एक सामान्य यदुवंशी किसान परिवार में हुआ था. रामनरेश का बचपन खेत-खलिहानों से होकर गुजरा था. उनकी माता भागवन्ती देवी गृहिणी थीं और पिता गया प्रसाद महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राममनोहर लोहिया के अनुयायी थे. रामनरेश के पिता प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक थे. मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने सबसे अधिक ध्यान आर्थिक, शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के उत्थान के कार्यों पर दिया और गांवों के विकास के लिए समर्पित रहे. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों के अनुरूप यूपी में अन्त्योदय योजना का शुभारम्भ किया. रामनरेश यादव ने साल 1977 में आजमगढ़ से छठी लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया था. वह 23 जून 1977 से 15 फरवरी 1979 तक मुख्यमंत्री रहे. रामनरेश ने 1977 से 1979 तक निधौली कलां (एटा) विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया और 1985 से 1988 तक शिकोहाबाद (फिरोजाबाद) से विधायक रहे. वह 1988 से 1994 तक राज्यसभा सदस्य रहे और 1996 से 2007 तक आजमगढ़ के फूलपुर विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया. आठ सितंबर 2011 को उन्होंने मध्य प्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ ग्रहण की और सात सितंबर 2016 तक मध्य प्रदेश के राज्यपाल रहे. इसके बाद 22 नवंबर 2016 को लंबी बीमारी के बाद उनका लखनऊ में निधन हो गया.

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