राज खन्ना
आचार्य जे.बी. कृपलानी को विपक्षी घेरते कि आपकी पत्नी भी आपके पक्ष में नहीं हैं। उधर सुचेता जी पर प्रहार होता कि वे अपने चुनाव में पति का समर्थन जुटाने में भी विफल हैं। स्वतंत्रता संघर्ष की अगली पंक्ति में शामिल आचार्य कृपलानी और सुचेता कृपलानी लोकसभा के दूसरे आम चुनाव तक प्रतिद्वंदी खेमे में पहुँच चुके थे, हालांकि इसका उनके दाम्पत्य जीवन पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ा। आचार्य कृपलानी ने 1951 में कांग्रेस से अलग होकर किसान-मजदूर प्रजा पार्टी बनाई थी। खुद कृपलानी जी चुनाव हार गए थे लेकिन सुचेता जी इसी पार्टी के टिकट पर दिल्ली से चुनाव जीती थीं। लोकसभा में पार्टी की नेता भी रहीं लेकिन 1956 में वे कांग्रेस में वापस चली गईं। कृपलानी जी आगे भी जीवन पर्यन्त कांग्रेस विरोध की राजनीति में सक्रिय रहे। 1957 के लोकसभा चुनाव में दोनों ही लोकसभा के लिए चुने गए लेकिन सुचेता जी सत्ता पक्ष के साथ थीं तो आचार्य जी विपक्ष में। आचार्य जी सत्ता पक्ष पर तीखे हमलों के लिए पहचाने जाते थे। लोकसभा में एक मौक़े पर उन्हें निरुत्तर करने के लिए किसी मंत्री ने उन पर निजी हमला किया कि आपकी पत्नी भी हमारे साथ हैं। कृपलानी जी का उत्तर था कि एक पढ़ी-लिखी और योग्य महिला से उन्होंने इसलिए शादी नही की थी कि वह सिर्फ बच्चे पैदा करे और गृहस्थी संभाले। मंत्री ने तत्काल ही क्षमा मांग कर इस प्रसंग का पटाक्षेप किया।
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कृपलानी दम्पति की उम्र में बीस वर्ष का फासला था। 25 जून 1908 को अम्बाला में जन्मी सुचेताजी के पिता डॉक्टर एसएन मजूमदार सिविल सर्जन थे। दुर्भाग्य से उनका असमय निधन हो गया। सुचेताजी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। 1927 में वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के लिए आईं। तब तक आचार्य कृपलानी वहाँ की प्रोफेसरी छोड़कर पूरी तौर पर गांधी आश्रम के कार्य में लग चुके थे। आश्रम के कार्य में सुचेताजी के चाचा धीरेन मजूमदार उनके सहयोगी थे। उन्हीं के जरिये कृपलानी जी और सुचेताजी का परिचय हुआ। विश्वविद्यालय छोड़ने के बाद भी वहाँ के विद्यार्थी कृपलानी जी को व्याख्यान एवम् अन्य कार्यक्रमों में बुलाया करते थे। वहाँ सुचेता जी से परिचय अंतरंगता में बदला। दोनों को संबंधों को लेकर जब अधिक चर्चा होने लगी तो उन्होंने विवाह का निर्णय किया। लेकिन इस संबंध को लेकर कृपलानी जी के परिवार के साथ गाँधी जी को भी आपत्ति थी। उम्र के अंतर, कृपलानी जी के अव्यवस्थित जीवन के तर्क परिवार के थे तो गांधी जी की चिंता थी कि पारिवारिक जीवन के झमेले में उलझने के कारण वे अपना एक महत्वपूर्ण सहयोगी खो देंगे। कृपलानी जी का गांधी जी को उत्तर था कि जब हमारे संबंधों को लेकर हल्की बातें होनी लगीं हैं तो उसका उत्तर विवाह करके दिया जा सकता है। कृपलानी जी को जिद्दी मानकर इस प्रसंग में गांधी जी आगे सुचेता जी को ही समझाने की कोशिश करते रहे। सुचेता जी का उन्हें उत्तर था कि आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि हमारे विवाह से आप एक सहयोगी खो देंगे? इस विवाह से आपको दो सहयोगी मिलेंगे। सुचेता जी का दिया गया यह भरोसा आगे सच साबित हुआ। हालाँकि गांधी जी को सहमत होने में वक्त लगा। सुचेताजी को उन्होंने तीन बार वर्धा आश्रम बुलाया। कृपलानी जी से संबंध न रखने को कहा। एक अवसर पर वे तैयार भी हो गईं। गाँधी जी ने किसी अन्य से विवाह का उन्हें सुझाव दिया। सुचेताजी ने कहा कि यह अनैतिक होगा। अंत में गांधीजी सहमत हुए, यद्यपि विवाह में सम्मिलित होने में उन्होंने असमर्थता व्यक्त की। उन दिनों जवाहर लाल नेहरू जेल में थे। तब कृपलानी जी की उनसे काफी घनिष्ठता थी। वे नेहरूजी की अनुपस्थिति में विवाह नहीं करना चाहते थे। उन्होंने रिहाई की प्रतीक्षा की। 1936 में यह विवाह हुआ। सुचेता जी ने अपनी “अनफिनिश्ड आटोबायोग्राफी“ में जवाहर लाल जी की माँ स्वरूप रानी नेहरू द्वारा भेंट की गई कीमती साड़ी का स्मरण किया है। कृपलानी जी अपना खाना खुद बनाते थे। थोड़े से बरतन उनके पास थे। कुछ सुचेता जी लायीं। लेकिन उन्हें खाना बनाना नहीं आता था, जिसे पति की मदद से आगे सीखा। दम्पति का शेष जीवन सेवा, सादगी और संघर्ष के लिए याद किया जाता है। लोहिया जी के आनंद भवन छोड़ने के बाद सुचेताजी कांग्रेस के विदेश विभाग की जिम्मेदारी संभालती रहीं। 1942 के आंदोलन को गति देने में भूमिगत रहते हुए महिलाओं की उल्लेखनीय त्रिमूर्ति में अरुणा आसफ़ अली, उषा मेहता के साथ सुचेताजी का नाम शामिल है। बाद में वे गिरफ्तार भी हुईं। दंगों की आग में झुलसते नोआखाली में अमन-चैन के प्रयासों में वे बापू के साथ थीं। उनके साहस की बापू ने उन्मुक्त प्रशंसा की थी। देश की आजादी की घोषणा का पंडित नेहरू का मशहूर भाषण “नियति से साक्षात्कार“ प्रायः दोहराया जाता है। इस ऐतिहासिक अवसर का पल-पल अद्भुत था। पंडितजी के भाषण के ठीक पहले सुचेताजी के मधुर स्वर में वन्देमातरम का गायन गूंजा था, जिसने सबको रोमांचित किया था।

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विभाजन के बाद विस्थापितों के पुनर्वास की अनथक कोशिशों के लिए भी वे याद की जाती हैं। उत्तर प्रदेश से संविधान सभा की सदस्य और फिर पहली दो लोकसभा के कार्यकालों में सांसद के तौर पर वे काफ़ी मुखर थीं। आचार्य कृपलानी ने अपनी आत्मकथा “माइ टाइम्स“ में लिखा है कि संसद में भाषण के पूर्व सुचेताजी देर रात तक तैयारी करतीं थीं। सदस्य उनका भाषण अपूर्व शांति के बीच सुनते थे। उन दिनों सांसदों को वेतन नहीं मिलता था। सत्र के दिनों में पैंतालीस रुपये प्रतिदिन भत्ते की व्यवस्था थी। कृपलानी दम्पति इसमें से केवल पन्द्रह रुपया ही लेते थे। गजब की सादगी का जीवन व्यतीत करने वाली सुचेताजी जरूरतमंदों की सहायता के प्रति अतिशय उदार थीं। अपने इस स्वभाव के कारण प्रायः छली जाती थीं। कृपलानी जी हँसते और सचेत करते लेकिन सुचेताजी अपने स्वभाव से विवश थीं। कांग्रेस ने 1962 में उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति में भेजा, जहाँ आगे उन्हें एक बड़ा अवसर मिलने वाला था। वे मेंहदावल से राज्य विधानसभा की सदस्य चुनी गईं। सी.बी.गुप्त मन्त्रिमण्डल में श्रम और उद्योग मंत्री बनीं। 1963 में कामराज योजना में कई मुख्यमंत्रियों और केन्द्र के मंत्रियों के इस्तीफे हुए। अनिच्छुक सी.बी.गुप्त को भी इस्तीफा देना पड़ा था। उन दिनों कृपलानी जी बीमार थे। सुचेताजी दिल्ली में पति की देखभाल में व्यस्त थीं। सुचेताजी को केसी पंत के जरिये मुख्यमंत्री पद के लिए अपना नाम चलने की जानकारी मिली। सुचेताजी ने बीमार पति की देखभाल को प्राथमिकता दी। इधर लखनऊ में सीबी गुप्त और पंडित कमलापति त्रिपाठी खेमे में खींचतान चरम पर थी। गुप्ता खेमे ने सुचेताजी को अपना उम्मीदवार बनाने का फैसला किया और उन्हें लखनऊ बुलाया। वे बीमार पति को छोड़कर लखनऊ जाने को तैयार नहीं थीं। कृपलानीजी के आश्वस्त करने पर कि वे अब स्वस्थ है, वे मुश्किल से लखनऊ जाने को राजी हुईं। केंद्रीय प्रेक्षक की उपस्थिति में गुप्त मतदान हुआ। बहुमत सुचेताजी के पक्ष में था। नेतृत्व ने उनके सर्वसम्मति से चयन की घोषणा की। इस घोषणा ने इतिहास रचा। वे राज्य ही नहीं बल्कि देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
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02 अक्टूबर 1963 से 13 मार्च 1967 तक का मुख्यमंत्री का उनका कार्यकाल दृढ़ता-कुशल प्रशासन और उनकी सादगी-ईमानदारी के लिए याद किया जाता है। उनके समय में राज्यकर्मियों की 62 दिन लम्बी हड़ताल चली। सुचेताजी ने दबाव में झुकने से इनकार कर दिया। वे दिन रात प्रदेश की भलाई के लिए प्रयत्नशील रहीं। बड़े बंगले के स्थान पर उसकी एनेक्सी को उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने रहने का ठिकाना बनाया। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उनका आवास देखकर आश्चर्य व्यक्त किया था कि यहाँ देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री निवास करती हैं? बापू की अनुयायी अपने पूरे कार्यकाल में सादगी-मितव्ययिता के निजी आचरण के जरिये सहयोगियों और नौकरशाही को रास्ते से न भटकने का संदेश देती रहीं। 1967 में वे गोण्डा से लोकसभा की सदस्य चुनी गईं। कांग्रेस विभाजन के समय उन्होंने कांग्रेस (ओ) का साथ किया। 1971 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद से वह पराजित हो गईं। यह उनका अंतिम चुनाव था। लेकिन विभिन्न स्तरों पर कमजोर वर्गों की सहायता के उनके प्रयत्न और सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता जारी रही। 1974 में जेपी आंदोलन को गति देने में वे पूरी क्षमता से जुटीं। देर रात तक दिल्ली में सभाओं में उनकी हिस्सेदारी रहती थी, यद्यपि उनका स्वास्थ्य इसकी अनुमति नहीं दे रहा था। कृपलानीजी उन दिनों बीमार थे। देर रात वे नर्स के लिए घण्टी बजाते लेकिन उससे पहले सुचेताजी पहुँच जातीं। 01 दिसम्बर 1974 को सुबह कृपलानी जी ने पूछा “माताजी कहाँ हैं?“ भतीजे गिरधारी ने उनके निधन की सूचना दी। कृपलानी जी ने लिखा है, “मैं गीता से प्राप्त उस ज्ञान को भूल चुका था कि आत्मा अजर-अमर है और मृत्यु तो केवल वस्त्र परिवर्तन के समान है। उसका दुःख नहीं किया जाना चाहिए। मैं टूट चुका था और उसके माथे को सहलाते बार-बार दोहरा रहा था, “..तुम चली गईं.। कृपलानी जी ने आगे लिखा, ‘हर हिन्दू की इच्छा होती है कि वह अपने अंत समय में परमात्मा को याद करे। मेरी भी यही अभिलाषा है लेकिन मुझे आशंका है कि उस अंतिम क्षण भी सुचेता की छवि बीच में आ जायेगी।’ उत्तर प्रदेश की 18वीं विधानसभा चुनाव की सरगर्मी, मौसम की कँपा देने वाली ठंड पर भारी पड़ रही है। जीत के लिए सभी को हर रास्ता कुबूल। ऐसे मौके पर सादगी-ईमानदारी की मिसाल पेश करने वाली सिद्धान्तवादी सुचेताजी को याद करना अजीब लग सकता है। पर शायद ये जरूरी है।
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कलमकार हैं।)

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