Friday, January 16, 2026
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चुनाव हार गए किन्तु जातिवाद को नहीं स्वीकारा

पं. दीन दयाल उपाध्याय जन्म दिन (25 सितम्बर) पर विशेष

राज खन्ना

जनसंघ (भाजपा) के वैचारिक विरोधियों की जयप्रकाश नारायण से शिकायत रही है कि पहले बिहार आंदोलन और फिर जनता पार्टी में जनसंघ को तरजीह देकर उन्होंने इस पार्टी और उसकी विचारधारा को विस्तार का बड़ा मौका दे दिया। लेकिन तथ्य बताते हैं कि ’अन्य दलों के लिए जनसंघ की अस्पर्श्यता’ तोड़ने का कार्य उनसे वर्षों पहले समाजवादी आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के जरिये शुरू किया जा चुका था। 1967 की गैरकांग्रेसी संविद सरकारों में समाजवादियों, कम्युनिस्टों और जनसंघ सहित अन्य दलों की सत्ता में साझेदारी की जब-तब चर्चा होती रहती है। लेकिन इस दिशा में उनके कदम 1963 में ही बढ़ चुके थे। तब जौनपुर के लोकसभा उपचुनाव में उन्होंने कोई समाजवादी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। जनसंघ के उम्मीदवार पंडित दीनदयाल उपाध्याय को समर्थन दिया और उनके पक्ष में सभाएं भी कीं। यह उपचुनाव अलग कारणों से भी याद किया जाता है। उत्तर प्रदेश की दो अन्य सीटों फर्रुखाबाद और अमरोहा लोकसभा सीट के लिए भी साथ ही उपचुनाव हुए थे। फर्रुखाबाद से डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, अमरोहा से आचार्य कृपलानी चुने गए थे। कांग्रेस के खिलाफ गैर कांग्रेसी चुनावी गठबंधन का यह पहला प्रयोग था। लोहिया जी ने इस चुनाव में जौनपुर में चार सभाएं की थीं। जनसंघ ने फर्रुखाबाद, अमरोहा में लोहिया-कृपलानी का खुलकर साथ दिया था। दीनदयाल उपाध्याय छोटे रास्तों से चुनाव जीतने के लिए अवसरवादी गठबंधनों के खिलाफ थे लेकिन राजनीतिक छुआछूत को अवांछनीय मानते थे। पार्टी के भोपाल अधिवेशन (29-31दिसम्बर 1962) में महामंत्री के तौर पर अपने वार्षिक प्रतिवेदन में उन्होंने कहा, ‘कम्युनिस्ट चीन के भारी आक्रमण तथा राष्ट्रपति द्वारा संकटकालीन स्थिति की घोषणा के कारण देश की राजनीतिक स्थिति सामान्य नहीं है। जनता की सुप्त राष्ट्रीय चेतना जाग उठी है। एकता का वातावरण बना है। विभिन्न दलों के एक मंच पर आने के कारण एक-दूसरे को समझने तथा पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का अवसर मिला है। यदि यह सहयोग और सदभावना का वातावरण बना रहा तो निश्चय ही राजनीतिक विकास के लिए स्वास्थ्यकर होगा।’ चीनी आक्रमण का विरोध और हिन्दी समर्थक आंदोलन ने जनसंघ और लोहिया के बीच निकटता पैदा की। 1963 के उप चुनाव इस दिशा में और मददगार बने। कुछ ओर से मांग उठी कि सोशलिस्टों और जनसंघ का स्थायी गठबंधन बनना चाहिए। पर दीनदयाल जी ऐसे किसी प्रयास की सफलता की उम्मीद नही करते थे। 28 दिसम्बर 1963 को अहमदाबाद अधिवेशन में उन्होंने कहा, ‘भिन्न-भिन्न दल अपने-अपने अलग दृष्टिकोण रखते हैं। लोग उन आदर्शों के सम्बन्ध में विचार नहीं करते। वे कई बार सदभावना के आधार पर यह सोचते हैं कि सभी दल एक साथ हो जाएं तो बहुत अच्छा होगा। यह तो बहुत अच्छा चिंतन होगा, किन्तु वे भूल जाते हैं कि जो भिन्न-भिन्न दल बने, उनकी कुछ ऐसी मूलभूत बातें होती हैं, जिसके आधार पर वे अस्तित्व में हैं। इसके लिए केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं होती। इसलिए हमने तय किया है कि हम कोरी कल्पना तक सीमित नही रहेंगे और ऐसा काम नही करेंगे, जिसमे सफलता की कोई संभावना नही है। इससे तो यह अच्छा होगा कि जहां हम एकमत हों वहाँ मिलकर काम करें, जहाँ नही, वहाँ अपने-अपने मंच पर ही चलें।“

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डॉक्टर लोहिया ने दीनदयाल जी से कहा था कि अखण्ड भारत की अवधारणा में जनसंघ-संघ का विश्वास पाकिस्तान को असहज कर देता है और भारत-पाक सम्बन्धों के सुधार में बाधक है। लोहिया ने कहा, ‘कई पाकिस्तानी सोचते हैं कि यदि जनसंघ सत्ता में आ जाये तो बलपूर्वक पाकिस्तान को भारत में मिला लेगा।“ दीनदयाल जी का उत्तर था, ‘हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं है और हम पाकिस्तानियों को इस चिंता से मुक्त करने को तैयार है।’ लोहिया-दीनदयाल ने ‘भारत-पाक महासंघ को लेकर 12 अप्रैल 1964 साझा वक्तव्य जारी किया। वैचारिक रूप से भिन्न विचारधारा के दो बड़े नेताओं की राष्ट्रीय मसलों पर एक सोच की यह शानदार मिसाल है,“ हमारा यह मानना है कि दो भिन्न देशों के रूप में भारत और पाकिस्तान का अस्तित्व एक कृत्रिम स्थिति है। दोनो सरकारों के सम्बन्धों में मनमुटाव असंतुलित दृष्टिकोण और टुकड़ों में बात करने की प्रवृत्ति का परिणाम है। दोनो सरकारों के बीच चलने वाला संवाद टुकड़ों में न होकर निष्पक्षता से होना चाहिए। ऐसे खुले दिल से होने वाली बातचीत से ही विभिन्न समस्याओं का समाधान निकल सकता है। सदभावना पैदा की जा सकती है और किसी प्रकार के भारत-पाक महासंघ बनने की दिशा में शुरुआत की जा सकती है।“ इस बयान में पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर हुए दंगों के परिणामस्वरूप दो लाख हिंदुओं के भारत पलायन पर चिंता व्यक्त करते हुए पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा की भारत सरकार से गारण्टी मांगी गई। सचेत किया गया कि सिर्फ कानूनी दृष्टिकोण से पाकिस्तानी नागरिक बताकर जिम्मेदारी से बचना खतरनाक होगा। इससे दोनो देशों में कम या ज्यादा मात्रा में हिंसा और मारकाट फैलेगी। दोनों नेताओं ने जनता से अपील की, कि सरकार के प्रति अपना रोष प्रकट करें लेकिन किसी भी हालत में भारतीय मुसलमानों को इसका शिकार न बनायें। यदि जनता आपस में लड़ती है तो इससे सरकार को अपनी काहिली और असफलता छिपाने और उस पर जुल्म ढाने का मौका मिलता है। दीनदयाल जी जौनपुर का यह उपचुनाव हार गए थे। लेकिन हारकर भी उनका कद और बड़ा हो गया था। समर्थकों को सचेत करते हुए उन्होंने कहा था, ‘आपने ऐसा किया तो मैं चुनाव मैदान से हट जाऊंगा।’ उनके राजनीतिक जीवन का यह इकलौता चुनाव था। दीनदयाल जी चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे। संगठन के आदेश पर चुनाव लड़ने को मजबूर हुए थे। 1962 में जनसंघ के ब्रह्मजीत सिंह इस सीट पर जीते थे। दुर्भाग्य से उनका जल्दी ही निधन हो गया। कांग्रेस ने राजदेव सिंह को उम्मीदवार बनाया था। पूर्वांचल का चिर-परिचित जातिवादी चुनावी हथकंडा प्रचार में असर दिखा रहा था। संभावनाएं उजली करने के लिए ठाकुरवाद के जबाब में ब्राह्मणों को उकसाने की जरूरत थी। दीनदयाल जी को ऐसी कोशिशों की जैसे ही जानकारी मिली, उन्होंने तीव्र प्रतिवाद किया। प्रचार में वह राष्ट्रीय मुद्दों को उठाते रहे। चुनाव हार गए। हार की खबर मिलते ही सबसे पहले विजयी राजदेव सिंह को बधाई दी। उसी शाम मतदाताओं के प्रति आभार प्रदर्शित करने के लिए सभा की। चुनावी वास्तविकताओं को किनारे करते हुए दीनदयाल जी का प्रचार अभियान नीतियों-नैतिकता पर आधारित रहा। नतीजा उनके खिलाफ था। पर एक नजीर के तौर पर वह चुनाव आज भी याद किया जाता है।

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राष्ट्रीय सवालों पर अन्य दलों से तालमेल के हिमायती दीनदयाल चुनाव पूर्व किसी गठबंधन के पक्ष में नही थे। जनसंघ के विस्तार के लिए अकेले और अधिकाधिक सीटों पर चुनाव लड़ना उन्हें हितकर लगता था। 1967 के चुनाव के पूर्व गठबंधन की पेशकश उन्होंने स्वीकार नही की। इस चुनाव में जनसंघ को 35 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी। 75 स्थानों पर पार्टी दूसरे स्थान पर थी। इनमें 15 ऐसे स्थान थे, जहाँ पार्टी दो सौ से पाँच हजार वोटों के मामूली अन्तर से हारी थी। इसी चुनाव में नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई थी। दो ही विकल्प थे। गठबंधन सरकारें या फिर उन राज्यों में मध्यावधि चुनाव। सयुंक्त विधायक दल की सरकारें बनीं। जनसंघ उनका घटक था। लेकिन इन सरकारों को लेकर दीनदयाल जी उत्साहित नही थे।उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा,“ चारों ओर संविद सरकारों की कल्पना राजनीतिज्ञों में जागी है। मैं चाहता हूँ कि कांग्रेस की सरकारें सभी जगह समाप्त हों, किन्तु हम अपनी इच्छा की पूर्ति में ऐसा कोई कदम न उठायें जो राजनीति की स्वस्थ परम्पराओं के विपरीत हो।“ असलियत में दीनदयालजी को ये साझा सरकारें जनसंघ के विस्तार में बाधक लगती थीं। कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा कि गैरकांग्रेसवाद के नाम पर जनसंघ की इन सरकारों में हिस्सेदारी पार्टी को दस साल पीछे ले जाएगी। साझा सरकार की बजाय कांग्रेस को अक्षम सिद्ध होने दो और चुनाव में कांग्रेस को परास्त करो। पर लोहिया के गैरकांग्रेसवाद के प्रचार और संगठन के आंतरिक दबाव के आगे वे संविद सरकारों में पार्टी के शामिल होने के लिए राजी हो गए। नानाजी देशमुख ने वर्षों बाद के एक साक्षात्कार में कहा था, ‘1968 में दीनदयाल जी चाहते थे कि जनसंघ के सभी मंत्री त्यागपत्र दे दें। उनकी बात नहीं मानी गई। दीनदयाल जी बच्चों की तरह रोये।’ 21 मई 1951 को डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में जनसंघ की स्थापना के समय संघ ने अपने जो समर्पित प्रचारक पार्टी को दिए थे, उसमें उत्तर प्रदेश से दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख शामिल थे। जनसंघ का पहला अखिल भारतीय अधिवेशन कानपुर में 29-31 दिसम्बर 1952 को सम्पन्न हुआ था। दीनदयाल जी पार्टी के महामंत्री बनाये गए थे। इस अधिवेशन के पूर्व मुखर्जी का दीनदयाल जी से परिचय नहीं था। इस अधिवेशन में दीनदयालजी की प्रतिभा और कर्मठता ने मुखर्जी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने कहा कि मुझे दो-तीन दीनदयाल मिल जायें तो मैं देश की राजनीति का नक्शा बदल दूँ। अगले पन्द्रह वर्ष वह जनसंघ के महामंत्री रहे। 1967 के कालीकट अधिवेशन में पार्टी के अध्यक्ष बने। बाद में श्रीगुरुजी (गुरु गोलवलकर) ने लिखा था, ‘वे वास्तव में यह पद नही चाहते थे। मैं भी उन पर यह भार नहीं डालना चाहता था। परन्तु परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि मुझे उनसे अध्यक्षता स्वीकार करने के लिए कहना पड़ा। एक सच्चे स्वयंसेवक की तरह उन्होंने आज्ञा पालन किया।’

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1964 के ग्वालियर चिंतन शिविर में उन्होंने अपनी मशहूर ‘एकात्म-मानववाद’ की अवधारणा पेश की। उन्होंने व्यक्ति-समाज के भीतर शांति-सदभावना पैदा करने पर जोर दिया। इसलिए वर्ग संघर्ष को प्रेरित करने वाले साम्यवाद को खारिज किया। उन्होंने वर्गो की परस्पर निर्भरता पर बल दिया। इसी प्रकार पूंजीवाद की व्यक्ति और समाज में अंतर्विरोध की अवधारणा को उन्होंने अस्वीकार किया। वे इन दोनों के सहज सामंजस्य पर बल देते रहे। उनका कहना था कि एक फूल अपनी पंखुड़ियों के कारण ही फूल कहलाता है और इन पंखुड़ियों का महत्व भी फूल के साथ रहने और इनकी शोभा बढ़ाने में ही है। एकात्म मानववाद, एक राष्ट्र के जीवन में विराट की तुलना मानव शरीर के अन्तर्गत प्राण से करता है। जिस तरह प्राण शरीर के विभिन्न अंगों को शक्ति देता है, बुद्धि को तीक्ष्ण करता है और शरीर-आत्मा को सयुंक्त रखता है, वही ’विराट’ राष्ट्र के साथ करता है। विराट के शक्तिशाली होने से लोकतंत्र सफल एवम सरकार प्रभावी हो सकती है। उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की थी, जो अपने अतीत की यशोगाथाओं से भी अधिक गौरवशाली होगा।

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..और इसी गौरवशाली राष्ट्रनिर्माण के लिए सिर्फ 21 वर्ष की अवस्था में वह संघ के प्रचारक बने थे। 1942 में उन्होंने अपने चाचा को पत्र लिखा था,“ ईश्वर ने हमारे परिवार को सब कुछ दिया। क्या हम अपने परिवार का एक सदस्य भी राष्ट्र की सेवा के लिए अर्पण नहीं कर सकते? क्या हम अपने समाज की सुरक्षा के लिए अपनी कुछ तुच्छ महत्वाकांक्षाओं का त्याग नहीं कर सकते, जिसके लिए राम वन में चले गए, कृष्ण ने अनगिनत कठिनाइयाँ सहन कीं, राणा प्रताप जंगलों में भटके, शिवाजी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया और गुरु गोविंदसिंह ने अपने नन्हे पुत्रों को जीवित दफन हो जाने दिया।“ दीनदयाल जी ने यह सब सिर्फ पत्र में नही लिखा था। उसे जीवन में पूरी नम्रता लेकिन दृढ़ता से उतारा था। सारी निजी महत्वाकांक्षाओं को तिलांजलि देकर वह राष्ट्रयज्ञ में सम्मिलित हुए। जो बोला और कहा वह जिया।…और जिया बिना किसी राग-द्वेष के। वह कुछ लेने नहीं समाज-देश को कुछ देने में विश्वास करते थे। विश्वास की इस कसौटी पर वह हर पल खरे उतरे। राजनीति के इस तपस्वी को बहुत थोड़ा सा जीवन मिला। लखनऊ-पटना की 11 फरवरी 1968 की रेल यात्रा ने उनकी जीवन यात्रा पर पूर्ण विराम लगा दिया। उनका शव मुगलसराय की रेल लाइन पर मिला। उन जैसे संत का क्या कोई शत्रु हो सकता था? उनकी मृत्यु की गुत्थी कभी नही सुलझी। पर मर कर भी देश-समाज की स्मृतियों में आज भी वह जीवंत बने हुए हैं। विलक्षण प्रतिभा और सादगी-शुचिता-समर्पण का उनका यशस्वी जीवन विस्मित करता है। सिर्फ उनकी पार्टी के लोगों को नही। राजनीति-समाज की धड़कनों पर कान लगाए हर जागरूक नागरिक को।

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