प्रयागराज(हि.स.)। नगर के झूंसी स्थित क्रियायोग आश्रम एवं अनुसंधान संस्थान के निदेशक सत्यम् योगी महाराज का लक्ष्य है कि चिकित्सा की अन्य पद्धतियों से निराश मानव को रोगमुक्त कर उनके जीवन में नवीन चेतना का प्रवाह किया जाए। क्रियायोग के माध्यम से उनमें शक्ति, ज्ञान, जीवन, साहस, धैर्य, क्षमा, प्रेम एवं सहनशीलता जैसे अपरिहार्य गुण विकसित कर मनुष्य को जीवन लक्ष्य से अभिभूत करना है।
संस्थान के बारे में सत्यम् योगी महाराज ने बताया कि महावतार बाबाजी ने 1894 में इलाहाबाद में आयोजित कुम्भ के समय झूंसी स्थित क्रियायोग परिसर में वटवृक्ष की छाया में युक्तेश्वर गिरी जी को प्रथम दर्शन देकर ‘स्वामी’ की उपाधि से विभूषित किया था तथा एक आध्यात्मिक ग्रंथ लिखने का निर्देश दिया जो ‘कैवल्य दर्शनम्’ के नाम से प्रसिद्ध है। आज योगी सत्यम् उसी क्रियायोग द्वारा राष्ट्र निर्माण तथा मानव कल्याण के मूलभूत सिद्धान्तों का वैज्ञानिक तरीके से उच्चतम सेवा प्रदान कर रहे हैं।
उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि क्रियायोग को जनमानस में प्रसारित करने के लिए उन्होंने 1983 में झूंसी गंगा किनारे क्रियायोग संस्थान की स्थापना की। उक्त जमीन लगभग 14-15 लोगों से खरीदी, जिसकी बाकायदा रजिस्ट्री है। तत्पश्चात् इसका शिलान्यास 20 सितम्बर, 1987 को जिलाधिकारी प्रभात चन्द्र चतुर्वेदी ने किया था। बताया कि उस समय वटवृक्ष को लोग बहुत नुकसान करते थे। जिसके कारण यह केवल ठूंठ बनकर रह गया। आश्रम बनने के बाद फालतू लोगों का वहां आना बंद हो गया और उस वटवृक्ष की निरंतर सेवा में वे लगे रहे। जिससे आज वह वटवृक्ष विशालकाय हो गया और वहीं लोग ध्यान केन्द्रित कर साधना करते हैं।
सत्यम् योगी ने बताया कि उक्त जमीन हथियाने के लिए कई लोगों ने मुकदमे दायर किए, कई विपत्तियां आयी, लेकिन अंततः विजय हमारी हुई। उन्होंने कहा कि सत्य परेशान होता है, पराजित नहीं। उन्होंने जमीन के सारे कागजात दिखाते हुए कहा कि हमने जमीन खरीदी और लोगों के कल्याणार्थ काम कर रहे हैं, किसी से कोई पैसा भी नहीं लेते, इसके बावजूद कुछ लोगों को परेशानी होती है। इसके लिए हम क्या कर सकते हैं।
-लाहिड़ी महाशय क्रियायोग के प्रथम गुरु रहे
स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी भारत की प्राचीन ऋषि परम्परा के जीवंत उदाहरण हैं। सत्य की खोज में युक्तेश्वर गिरि जी बनारस के महान गुरु श्री श्री लाहिड़ी महाशय के पास पहुंचे। लाहिड़ी ने उन्हें क्रियायोग की शिक्षा देते हुए उस पवित्र विज्ञान को ईश्वर साक्षात्कार के लिए सबसे प्रभावी साधन बताया। आधुनिक युग में उस प्राचीन विज्ञान की प्रकट रूप से शिक्षा देने वाले वे पहले गुरु थे। लाहिड़ी महाशय के मार्गदर्शन से एवं अपनी क्रियायोग साधना से युक्तेश्वर गिरी ने आत्मिक उन्नति की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त कर ली।
-1894 में इसी वटवृक्ष के नीचे ‘स्वामी’ की उपाधि मिली
झूंसी आश्रम स्थित वटवृक्ष के बारे में सत्यम् योगी ने बताया कि मृत्युंजय श्री श्री महावतार बाबा ने सन् 1894 में आयोजित कुम्भ के समय क्रियायोग आश्रम में स्थित विशालकाय वटवृक्ष तले ज्ञानावतार स्वामी युक्तेश्वर गिरी को प्रथम दर्शन देकर ‘स्वामी’ की उपाधि से विभूषित किया था। आज उसी वटवृक्ष की छाया में लोग ध्यान केंद्रित कर साधना करते हैं और स्वस्थ रहते हैं।
विद्या कान्त
