संजय स्वतंत्र
ऋषि और डिंपल की फिल्म युवाओं में धूम मचा कर पर्दे से उतर चुकी थी। मगर हम जैसे बच्चे जो किशोरावस्था की ओर बढ़ रहे थे, उनके दिलों में बॉबी के गीत छाए हुए थे। स्कूल से लौटते हुए अकसर अब्दुल मियां की दुकान के आगे स्टूल पर बैठ जाता। दर्जी की दुकान थी अब्दुल की। और बैटरी से चलने वाले उनके रेडियो पर देवानंद, राजेश खन्ना और शशि कपूर की फिल्मों के गीत तो बजते ही, उन्हीं दिनों बॉबी और जूली के गीतों को सुनते हुए कदम ठिठक जाते। तब आज की तरह टेलिविजन और मोबाइल जैसी सुविधा भी तो नहीं थी। और न ही सिनेमाघर जाने के लिए हर कोई पैसे का जुगाड़ कर पाता था। उस वक्त छोटा बच्चा ही तो था मैं। एक काल्पनिक दुनिया थी मेरी।
…. तो एक दिन सुना कि अब्दुल मियां पर कोई परी आती है। वे इत्र भी खूब लगाते थे। रोमानी गीत सुनते हुए वे सुध-बुध खो बैठते। काफी देर बाद पानी के छींटे मारने पर होश आता था उन्हें। कौन थी वो परी, जो उन पर सवार हो जाती थी या कोई हसीना थी जिसके प्यार में पागल थे अब्दुल मियां। जो भी हो यह सब मेरी समझ से बाहर था। उनकी दुकान पर इत्र की खुशबू और नए और कटे कपड़ों के किनारे रखे जंगली फूल मन को मोह लेते। कभी-कभी डर भी लगता कि कहीं मुझे भी कोई परी पकड़ न ले। फिर वो मुझे हमेशा के लिए ले जाएगी। जब अब्दुल मियां को होश आता तो मैं भाग जाता। फिर शाम को उनकी दुकान के आगे खड़ा हो जाता, कोई प्यारा सा गीत सुनने के लिए। ऋषि को गए एक साल हो गया। पिछले साल 30 अप्रैल को उन्होंने कोरोना से कांपती दुनिया को अलविदा कह दिया था। किशोर प्रेम को चरम पर पहुंचाने वाला यह करिशमाई नायक मेरे लिए और मेरे जैसे करोड़ों सिनेप्रेमियों के दिलों में आज भी है और हमेश रहेगा। जब भी उनकी फिल्मों के गीत हम सुनेंगे। वे जीवित रहेंगे। आज अब्दुल मियां की याद आ रही थीं तो सोच रहा था कि जब वे ऋषि की फिल्मों के गीत सुनते हुए जब होश खो बैठते थे तो ऋषि की नायिकाओं का क्या हाल होता होगा, जब वे उनकी सपनीली-कजरारी आंखों से संवाद करते हुए उनके दिलों में चाकलेट की तरह पिघल जाते होंगे।
डिंपल से लेकर पद्मिनी कोल्हापुरे, नीतू सिंह, टीना मुनीम, और मौसमी चटर्जी और जयाप्रदा से लेकर राखी जैसी परिपक्व अभिनेत्री … यानी कोई भी ऐसी नायिका नहीं जो उनके जादू से बच पाई हों। हिंदी फिल्मों का यह शर्मीला आशिक कभी छुप-छुप के प्यार करता है तो कभी वह गा उठता था-खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों, इस दुनिया से नहीं डरेंगे हम दोनों। नायिका उनकी किस्मत में नहीं भी है तो भी उनके लिए भावना है-मेरी किस्मत में तू नहीं शायद क्यों तेरा इंतजार करता हूं, मैं तुझे कल भी प्यार करता था, मैं तुझे अब भी प्यार करता हूं। या फिर-मेरी हंसिनी कहां उड़ चली मेरे अरमानों को पंख लगा कर कहां उड़ चली…। अपनी रूठी हुई नायिका को मनाता यह चाकलेटी नायक सचमुच दिल में उतर जाता है-अरे होगा तुमसे प्यारा कौन, हमको तो है तुमसे प्रेम.. हे कंचन..। कभी वह सागर जैसी आंखों वाली लड़की से प्रेम करता हुआ नजर आया तो कभी एक परिपक्व नायिका के संग गा उठता है- क्या मौसम है, ऐ दीवाने दिल, चल कहीं दूर निकल जाए…। और इस पर उनकी नायिका के मन में यही भाव उतरा-हां तू है वही, दिल ने जिसे अपना कहा, तू है जहां, मैं हूं वहां। तब वे कहते- सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं। फिर नायिका उन्हें कमरे में बंद कर चाबी खो देती है-हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाबी को जाए।
अपनी नायिका की आंखों में आंखें डाल कर मुस्कान बिखेर देने वाला यह नायक अपने गीतों में मस्ती उड़ेलता हमेशा हमेशा याद आएगा। सत्तर और अस्सी के दशक में अपनी कई फिल्मों के लिए चर्चित ऋषि उन गीतों के माध्यम से हमेशा उमंग भरते रहेंगे जो उनकी फिल्मों का अहम हिस्सा थे। उन गीतों को सुनते हुए सचमुच दूर, बहुत दूर हम अपनी कल्पना लोक में जाते रहेंगे…। चल कहीं दूर निकल जाएं गाते हुए ऋषि बहुत दूर निकल गए हैं, मगर अनगिनत गीतों में वे हमेशा हमें थिरकते हुए और बेशुमार प्यार लुटाते हुए दिखते रहेंगे। फिलहाल धरती पर उतरा चांद का वो टुकड़ा अपनी चांदनी की गोद में लेटा कोई गीत ही गुनगुना रहा होगा-रंग भरे बादल से, तेरे नैनों के काजल से, मैंने इस दिन पे लिख दिया तेरा नाम… ऋषि को गए एक साल हो गया। याद आते हैं या कि आप उन्हें भूल गए?
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