जन्म दिन (17 अप्रैल) पर विशेष
राज खन्ना
चन्द्रशेखर की पहचान उनके बेबाक-बेलौस लहजे से जुड़ी हुई थी। एक निर्भीक-निडर नेता जिसकी अपनी शैली थी और अपना अंदाज। पहले प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और फिर कांग्रेस में रहते हुए राजनीतिक लाभ-हानि का जोड़-घटाव उन्हें इस अंदाज़ से अलग नही कर पाया। जो सही समझा वह बोले। इंदिराजी की लोकप्रियता और वर्चस्व के दिनों में भी उनकी नाराजगी से बेपरवाह रहे। एवज में उन्नीस महीने की जेल भुगती। जनता पार्टी की अगुवाई की। अपनी सरकार थी। पर इंदिरा जी से कोई खुन्नस नही रखी। जनता पार्टी की टूट-पराभव के बाद उनका अगला ठिकाना जनता दल था। उस जनता दल की टूट के बाद उसके एक छोटे धड़े की अगुवाई करके वह देश के प्रधानमंत्री बन गए। कांग्रेस के समर्थन से। सिर्फ चार महीने के लिए। अगले तीन महीने कामचलाऊ प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें काम करने का मौका मिला। उनकी छवि ऐसे नेता की थी, जो किसी के आगे झुकता नही। विचारों-वसूलों की कीमत पर किसी से समझौता नही करता। विवादों की फिक्र नही और विवादास्पद लोगों से अपने रिश्तों की सार्वजनिक स्वीकृति में संकोच नही। विपरीत धारा में बहने से परहेज नही और ऐसे में जनभावनाओं की भी चिंता नही। आखिरी दौर में उनका दल निस्तेज था। खुद भी लगभग अकेले। लेकिन इसने उन्हें तनिक भी नही बदला। कोई हताशा-निराशा नही। अकेले ही सड़क से संसद तक चन्द्रशेखर जहां भी खड़े हुए, वहाँ वह अलग दिखे।
जीवन के आखिरी दौर में उन्हें संसद का घटता महत्व चिंतित किये हुए था। न्यायपालिका से विधायिका के टकराव को लेकर भी उनका नजरिया बहुत साफ़ था। अपने साक्षात्कारों की किताब ’रहबरी के सवाल’ में वह याद दिलाते हैं, ’देखिए संसद सबसे बड़ी है। इस देश में संसद को मछली बाजार और नेताओं को भ्रष्टाचार का मसीहा कहने का किसी को अधिकार नहीं है। न्यायपालिका का अस्तित्व तभी तक है जब तक संसद मजबूत है। हमारे पड़ोसी देश का उदाहरण हमारे सामने है। जहाँ पर भी संसद कमजोर हुई, वहाँ न्यायपालिका मजबूत नही रह सकी है। हमारा विरोध सिर्फ इस बात का है कि राजनीतिक लोग भ्रष्ट हैं। लेकिन संसद भ्रष्टाचार का अड्डा है कहना लोकतंत्र की जड़ पर कुठाराघात है। अगर जड़ ही नहीं रहेगी तो शेष क्या बचेगा? लोकतंत्र में अगर संसद को निकाल दें तो फिर क्या बचता है? 2004 में गैर राजनीतिक डॉक्टर मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर चन्द्रशेखर की प्रतिक्रिया थी, ’यह देश के लिए शुभ होगा अथवा अशुभ, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन इसका एक असर यह होगा कि राष्ट्रीय जीवन में राजनीतिक लोगों का महत्व धीरे-धीरे कम होता जाएगा। बीते साल की यह सबसे अधिक गौर करने लायक और चिन्ताजनक देन है। इसके लिए वे लोग कम जिम्मेदार नहीं हैं जो राजनीति में हैं। राजनीति वास्तव में हो ही नहीं रही है। मैं राजनीति का विद्यार्थी हूँ। हमनें जिस राजनीति को समझा, उसका वास्ता देश के आम लोगों के दुख-दर्द से है। इस मायने में राजनीति अत्यन्त गंभीर और दायित्वपूर्ण क्षेत्र है।’ चन्द्रशेखर ने इस संभावना को खारिज किया था कि अधिक दबाव पड़ने पर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़कर अलग हो जायेंगे। इस सवाल पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए चन्द्रशेखर ने कहा था, ’मैं नहीं समझ पाता कि ऐसा क्यों कहा जाता है? उन्हें पद छोड़ना होता तो स्वीकार ही क्यों करते?
इंदिरा जी ने इमरजेंसी क्यों लगाई? ये उनका फैसला था या सलाहकारों की देन? यह सवाल चन्द्रशेखर से भी पूछा गया। उनका कहना था, ’जो रुख इंदिराजी ने अपनाया था, वैसे में उनके पास कोई रास्ता ही नहीं बचा था। ऐसा भी नहीं था कि सारी परिस्थितियाँ अचानक प्रकट हो गईं। अगर इंदिराजी को प्रधानमंत्री बने रहना था, तो आपातकाल के अलावा दूसरा कोई रास्ता नही था। इंद्र कुमार गुजराल हमारे पुराने मित्रों में हैं। वह इंदिरा जी के सलाहकारों में एक थे। एक दिन हमारे पास आये। उन्होंने कहा कि आपका और इंदिराजी का समझौता हो जाना चाहिए। हमने कहा कि समझौते की कोई बात ही नही है। हम लोग दो रास्तों पर चल रहे हैं। इंदिराजी के लिए ऐसा करना मजबूरी ही थी। हमने गुजराल से कहा कि थोड़े दिन बाद यह खबर पढ़ोगे कि मैं ट्रक से दबकर मर गया या जेल चला गया। गुजराल ने कहा आप ऐसा क्यों सोचते हैं ? इन्दिरा जी को जवाहर लाल नेहरू ने ट्रेनिंग दी है। मैंने कहा कि मैं जवाहरलाल जी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता। उनसे मेरा कोई व्यक्तिगत परिचय भी नहीं था। मैंने गुजराल से कह दिया था कि न तो मैं बदलने वाला हूँ और न ही इंदिराजी। इस मुलाकात के पंद्रह दिन के भीतर इमरजेंसी लग गई।’
पर उन्हीं चंद्रशेखर ने वीपी सिंह की सरकार के पतन के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। उनके इस फैसले ने उनकी राजनतिक छवि पर अनेक सवाल खड़े किए। विरोधियों को प्रहार का अवसर मिला। इस सरकार के पास सिर्फ 64 सांसद थे। उस कांग्रेस का समर्थन था, जिसने सिर्फ दशक भर पहले चौधरी चरण सिंह को समर्थन देने के बाद संसद का सामना करने का भी मौका नही दिया था। फिर चन्द्रशेखर ने क्यों बनायी सरकार? अपनी आत्मकथा में उन्होंने इसके कारण बताए… “मैंने सरकार बनाने की जिम्मेदारी इसलिए स्वीकार की, क्योंकि उस समय देश की हालत बहुत खराब थी। दो तरह के दंगे-फसाद चल रहे थे-साम्प्रदायिक और सामाजिक। मैंने 11 नवम्बर 1990 को शपथ ली। उस समय 70-75 जगहों पर कर्फ्यू लगा हुआ था। युवक आत्मदाह कर रहे थे। वे मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ़ भड़क गए थे। दूसरी तरफ साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। मुझे सरकार चलाने का अनुभव नही था लेकिन मेरा विश्वास था कि अगर देश के लोगों से सही बात की जाए तो जनता देश के भविष्य के लिए सब कुछ करने को तैयार रहेगी। कठिनाइयों के बावजूद मुझे विश्वास था कि कोई न कोई रास्ता निकल सकता है। भले ही अस्थायी ही हो। मुझे इसमें संदेह नही था कि मेरी सरकार अधिक दिनों चल सकेगी। मेरे जीवन की विडम्बना रही है। मैंने काफी आत्मविवेचन किया लेकिन आज तक उत्तर नही मिला। मैंने इस बात की कभी परवाह नही की, कि कौन किस पद पर है? कभी व्यक्तिगत कारणों से किसी पर आक्षेप भी नही किया। लेकिन लोगों को मुझसे घबराहट होती रहती है। न जाने क्यों? प्रधानमंत्री का पद मैंने कर्तव्य भावना से स्वीकार किया। उस समय वीपी की सरकार देश को जिस रास्ते पर ले जा रही थी, वह खतरनाक रास्ता था। देश विनाश की ओर जा रहा था। मैं उसको बदल सकता हूँ, इसका मुझे विश्वास था। तात्कालिक समस्याओं का हल असम्भव नही लगा। मैं चार महीने पूरी तौर पर और तीन महीने कामचलाऊ प्रधानमंत्री रहा। इन सात महीनों में मैंने महसूस किया कि प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी का काम इतना बड़ा नही है कि इस पद पर आसीन व्यक्ति के पास दूसरे कामों के लिए बिलकुल समय न रहे।“
सरकार को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा? चन्द्रशेखर जी ने लिखा, “मेरी सरकार गिराने के लिए ख़ुफ़िया पुलिस का बहाना बनाया गया। वह अकेला कारण नही था। आखिरी और निर्णायक कारण कई हो सकते हैं। ब्रिटेन के एक अखबार ने लिखा कि ये जो सरकार है, उसके बारे में शुरू से धारणा थी कि यह कांग्रेस की बैसाखी पर है, इसलिए कुछ फैसले नही लेगी, लेकिन सरकार जिस तरह से फैसले ले रही है, ऐसा लगता है कि जवाहरलाल नेहरु के बाद यह सबसे प्रभावी सरकार है। सरकार बनने के तुरन्त बाद मैं कलकत्ता गया। एक उद्योगपति के पिता की मूर्ति का अनावरण था। वहां इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि मैं उस पूंजीपति के यहां खाना खाने क्यों गया?, मैंने कहा कि उनके पिता को जानता था, वे अशोक मेहता के दोस्त थे। उनके घर पहले भी गया हूँ और अब भी जाऊंगा। जब मैं जा रहा था तो उन सज्जन ने कहा चन्द्रशेखर जी आपकी सरकार में रिश्वत चल रही है। उस समय मैं और देवीलाल दोनो ही केवल सरकार के थे। मैंने उनसे कहा कि निजी बातचीत अलग है लेकिन जब प्रधानमंत्री को जानकारी दे रहे हैं तो पूरी जानकारी दें। पता लगाया गया। एक सज्जन ने रिश्वत ली है। उनका कहना था कि हमारी सरकार का काम वही चला रहे हैं। मैंने वहीं सभा में कहा कुछ लोग सरकार के नाम पर रिश्वत ले और दे रहे हैं। वे अपनी जिम्मेदारी पर काम करें। इसका परिणाम उन्हें भुगतना होगा। इसके बाद वह विशिष्ट व्यक्ति आये। वे चाहते थे, इस अध्याय को भुला दिया जाए। राज्यपालों की नियुक्ति के सवाल पर मतभेद उभरे। मैं हितेंद्र देसाई को राज्यपाल बनाना चाहता था। कांग्रेस ने कहा कि इससे उनका गुजरात का गणित गड़बड़ा जाएगा। अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष पद से रामधन को हटाने के लिए कहा गया। उसके लिए महावीर प्रसाद और सुखदेव प्रसाद के नाम दिए गए। मैंने कहा कांग्रेस में और योग्य व्यक्ति हैं, उनके नाम दीजिए अन्यथा रामधन ही अध्यक्ष रहेंगे। ब्रिटेन में उच्चायुक्त की नियक्ति जरूरी थी। विद्याचरण शुक्ल ने एक लिस्ट बनायी थी। उसमें राम निवास मिर्धा का नाम था। राजीव गांधी भी उनके नाम पर सहमत थे। बाद में वहाँ राजस्थान के गणित का सवाल उठा। मैंने बिना सलाह किये राष्ट्रपति की सहमति से लक्ष्मीमल सिंघवी को भेजा। कैबिनेट सेक्रेटरी के सवाल पर भी मतभेद हुआ। जिस पहले का नाम सुझाया गया, मेरी राय में वह लोगों को साथ लेकर काम नही कर सकते थे। जो दूसरा नाम आया, वह एक नामी-गिरामी औद्योगिक घराने के सम्पर्क में थे। मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी भी उनके पक्ष में थे। पर मैं उन्हें कैबिनेट सेक्रेटरी नियुक्त नही कर सकता था। मैंने वरिष्ठता के आधार पर ही हर नियुक्ति की। चन्द्रशेखर के अनुसार पुलिस की जासूसी का बहाना उन्हें दबाव में लेने के लिए बनाया गया। यह बहाना बनाने वालों ने यह नही सोचा था कि मैं इस्तीफा दे दूंगा! लोकसभा में जबाब देने के लिए मैं खड़ा हुआ, उस समय देवीलाल जी ने मुझसे कहा कि राजीव गांधी जी बात करना चाहते हैं। मैं जाऊं? मैंने कहा जरुर जाइये और अपनी प्राइममिनिस्टरी की बात करके आइएगा। मेरे दिन इस पद पर पूरे हो गए। लोकसभा में भाषण करने के बाद मैंने अपनी सरकार का इस्तीफ़ा सौंप दिया। उसी रात मेरे पास प्रस्ताव आया कि आप दोबारा शपथ लीजिए। आपकी सरकार में कांग्रेस भी शामिल हो जाएगी। मैंने कहा कि मेरा काम हो गया। यह प्रस्ताव शायद इसलिए आया क्योंकि लोग तुरंत चुनाव नही चाहते थे।
चन्द्रशेखर की दाढ़ी उनकी शख्सियत का हिस्सा थी। साथ के ही नहीं राजनीति में सक्रिय बाद की पीढ़ियों के तमाम नौजवानों ने इस मामले में उनका अनुकरण किया। लेकिन उन्होंने दाढ़ी कब-कैसे रखी इसका रोचक किस्सा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान चन्द्रशेखर अपने एक मित्र के साथ जयपुर गए हुए थे। हिन्दू हॉस्टल में रहते नाई से दाढ़ी बनवाने की आदत थी। डेढ़ रुपये महीने पर नाई रोज दाढ़ी बना देता था। जयपुर में होटल के आसपास कोई सैलून नही मिला। रास्ते में कई नाई मिले। पर सब किनारे ईंटे पर बैठाकर हजामत बनाने वाले। “ लगा कि इनसे दाढ़ी बनवाऊंगा तो परेशानी हो सकती है। दूसरे दिन भी दाढ़ी नही बनी। दो दिन बाद मैंने सोचा कि इरादा तो समाजवाद लाने का है। दाढ़ी से परेशान हो जाएंगे तो क्या कर पाएंगे। मैंने दाढ़ी बनाना छोड़ दिया।“ बाद में यह दाढ़ी चन्द्रशेखर की पहचान बन गई। 1964 में प्रजा समाजवादी पार्टी ने चन्द्रशेखर को दल से निष्कासित कर दिया। वज़ह अशोक मेहता बने थे। उन्होंने पार्टी में रहते हुए पंडित नेहरु की पेशकश पर योजना आयोग का उपाध्यक्ष पद स्वीकार किया था। सयुंक्त राष्ट्र संघ में एक संसदीय प्रतिनिधि मंडल का भी नेतृत्व किया था। राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने इस मुद्दे पर मेहता को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। चन्द्रशेखर ने मेहता की हिमायत की थी। पार्टी निर्णय के विरुद्ध खुद भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्यता छोड़ दी थी। जून 1964 में अशोक मेहता समर्थकों ने लखनऊ में सम्मेलन किया। चन्द्रशेखर उसमे नही गए। पर सहयोग किया। डेढ़ महीने बाद वह पार्टी से बाहर थे। तब वह राज्यसभा सदस्य थे। उन दिनों गुरुपद स्वामी, इन्द्र कुमार गुजराल और अशोक मेहता रोज शाम इंदिराजी के यहां बैठा करते थे। कांग्रेस से जुड़ने के बाद उन्ही लोगों ने चन्द्रशेखर की इंदिराजी से भेंट कराई। इंदिराजी से उनका संवाद रोचक था। चन्द्रशेखर की बेलाग शैली की बानगी भी। इंदिरा जी का सवाल था, क्या आप कांग्रेस को समाजवादी मानते हैं?
जबाब था, मैं नही मानता। पर लोग ऐसा कहते हैं।
फिर आप कांग्रेस में क्यों आये?
चन्द्रशेखर ने पूछा क्या आप सही उत्तर चाहती हैं ?
हाँ मैं यही चाहती हूं।
“मैंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में 13 साल तक पूरी क्षमता और ईमानदारी से काम किया। दल को मैंने पूरी निष्ठा से समाजवाद के रास्ते पर ले जाने की कोशिश की। लेकिन काफी समय तक काम करने के बाद मुझे लगा कि वह संगठन ठिठक कर रह गया है। पार्टी कुंठित हो गई है। बढ़ती नही है। अब यहां कुछ नही होने वाला है। फिर मैंने सोचा कांग्रेस एक बड़ी पार्टी है।इसी में चलकर देखें। कुछ करें।“
लेकिन यहां आकर आप क्या करना चाहते हैं?
मैं कांग्रेस को सोशलिस्ट बनाने की कोशिश करूंगा।
और अगर न बनी तो?
तो इसे तोड़ने का प्रयास करूंगा। क्योंकि यह जब तक टूटेगी नही तब तक देश में कोई नही राजनीति नही आएगी। पहले तो मैं प्रयास यही करूंगा कि यह समाजवादी बने। पर यदि नही बनी तो इसे तोड़ने के अलावा कोई रास्ता नही बचेगा।
मैं आपसे सवाल पूछ रही हूं और आप मुझे इस तरह का उत्तर दे रहे हैं?
सवाल आप पूछ रही हैं तो उत्तर तो आपको ही दूंगा।
पार्टी तोड़ने से आपका क्या मतलब है? इससे क्या होगा?
देखिए कांग्रेस बरगद का पेड़ हो गई है। इसकी फैली छांव में कोई दूसरा पौधा विकसित नही होगा। इस बरगद के नीचे कोई पौधा पनप नही सकता। इसलिए जबतक यह पार्टी नही टूटेगी, कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नही होगा। वह विस्मित सी चन्द्रशेखर को देखती रहीं। .. और बाद में जब इंदिराजी लोकप्रियता के शिखर पर थी, तब भी चन्द्रशेखर उनसे ऐसे ही स्पष्ट बोलते रहे। वह राजनीति में व्यक्तिपूजा और अंधभक्ति के खिलाफ़ थे। उनका कहना था, ’ जिन कारणों से मैं कांग्रेस से हटाया गया, वे तो आज की पार्टियों में भी जस की तस हैं, बल्कि रोग बढ़ा ही है। एक अंध भक्ति की परम्परा। एक खास व्यक्ति या नेता जो कहे, उसे ही मानना है। उनकी बातों को ही सराहना है, चाहें वह गलत ही क्यों न हो ? ये बातें मुझे स्वीकार्य नहीं ।’
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