शिकारियों, पुलों पर आवागमन और नदी क्षेत्र में अधिक चहल-पहल इनके लिए घातक, इसी लिए नहीं ठहरते एक जगह संरक्षण की है आवश्यकता”
औरैया (हि. स.) । पांच नदियों यमुना, चंबल, सिंध, पहूज और क्वांरी के संगम पर स्थित पंचनद धाम पर चंबल वैली क्षेत्र में प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी विदेशी प्रवासी पक्षियों का आना लगातार जारी है। जो झुंड के रूप में समूह बनाकर अलग-अलग प्रजातियों के साथ हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर इस क्षेत्र में दिसंबर से फरवरी माह तक प्रवास में यहां रहते हैं। और इस क्षेत्र को बराबर अपने कलरव, कुंजन एवं विभिन्न प्रकार की भाव भंगिमाओं से लोगों को आकर्षित कर लुभाते हैं। जिससे यह क्षेत्र बराबर तीन माह तक लोगों को आकर्षित कर अलौकिक छटा से बिखेरता है।
साइबेरिया कजाकिस्तान जैसे देशों में इस समय भीषण शीतलहर होने के कारण वहां पर बर्फ जम जाती है। जिससे वहां इन पक्षियों को भोजन और रहने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जिससे यह प्रवासी पक्षी जैसे साइबेरियन क्रेन, ग्रेट फ्लैनिंगो, ब्लैक विंग, कामन कील, नार्दन पिनटेल, टृफटेड डक, यूरेशियन करल्युन, ग्रे हैड,गूज,हैडेड गूज, यूरेशियन सभी,सुरकाव, मार्श हैरियर, पिनटेल डक, नार्दन शवलर, पोचार्ड,सारस और चकई- चकवा शामिल हैं। जो साईवेरिया और कजाकिस्तान सहित अन्य स्थानों से आते हैं,और इन तीनों माह मैं यह पक्षी भारत में अनेकों स्थान पर डेरा डालते हैं,जिनमें प्रमुख चंबल वैली पंचनद धाम भी है।
हजारों वर्षों से प्रवास में आने वाले प्रवासी पक्षियों का विगत कुछ वर्षों से नदी तटों और पक्षी विहारों एवं उनके रुकने के स्थानों पर अवैध रूप से शिकारियों द्वारा चोरी छुपे शिकार किए जाने से यह भयभीत रहते हैं ।जिससे इनका कहीं-कहीं आना नगण्य हो गया है।और यही सूरते हाल आज चंबल वैली पंचनद धाम का भी है ।जहां सदियों से इन पक्षियों का जमावड़ा रहता था लेकिन समय के साथ साथ अब इनको इस क्षेत्र में कम ही देखा जाता है।क्योंकि शिकारी इनके शिकार करने के लिए बंदूकों का बंद हो जाने के बाद नई नई तरीके जैसे उनके चुगने के लिए डाले गए अनाज के दानों में को उनके रुकने के स्थानों पर बिखेर देते हैं। जिससे यह पक्षी अन्य बिग यता के कारण इनको पेट भरने के लिए जब चुभते हैं तो चुगने के मात्र आधा घंटे बाद ही इनकी बुरी तरह छटपटाकर इनकी मृत्यु हो जाती है,बाद में शिकारी इनको उठा ले जाते हैं और इनका सेवन करते हैं, तथा वहीं कुछ शिकारी शिकार करने में माहिर होते हैं जो गुर्दा (लंबी डोर में बंधा हुआ लोहे का टुकड़ा) इन पंछियों के आने पर उड़ते समय इनके ऊपर फेंकते हैं। जिस में फंसकर पक्षी नीचे आ जाते हैं और शिकारियों के शिकार बन जाते हैं, जिससे अन्य पक्षी इनको देख कर घबरा जाते हैं और ठहरने के लिए घबराते हैं।
अतः उक्त विषय पर सरकारों एवं प्रशासन को संवेदनशील होना चाहिए जिससे इनके प्रवास के दिनों के दौरान इन प्रवासी पक्षियों की देखरेख और हिफाजत के साथ-साथ उनको संरक्षण देने का दायित्व निभाना अति आवश्यक है। जिससे कि हजारों वर्ष पुराने इन प्रवासी पक्षियों के भारत में आकर रुकने का सिलसिला बराबर जारी रह सके कथा सरकार के द्वारा बनाई गई तमाम पक्षी विहार और नदी तट बराबर गुंजायमान रह सकें।
सुनील
