Saturday, April 11, 2026
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चंबल के बीहड़ में बागियों का साथ और ख़ामोश हो गई बंदूकें!

– बीहड़ में दहशत के बीच गांधी​गीरी का सफल प्रयोग
– जेपी के साथी पर चली थी गोली-पकड़ छुड़ाने के लिए करना पड़ा सत्याग्रह
रजनीश पाण्डेय

रायबरेली (हि.स.)। चंबल के बीहड़ और बागियों का नाम सुनते ही मन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ पड़ती है, लेकिन इन्हीं बाग़ियों(डकैतों) के बीच आज से पांच दशक पहले एक इतिहास रचा गया था। बरसों से सरकार की नाक में दम करने वाले डकैतों ने विशुद्ध गांधीगीरी से प्रभावित होकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था।
मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के ज्योरा तहसील में हुई यह 16 अप्रैल 1972 की इस ऐतिहासिक घटना भले ही राजनीतिक कारणों से आज चर्चा में नहीं है लेकिन लोकनायक के इस महत्वपूर्ण प्रयास से चंबल के इलाके को डकैतों से आजाद करने में कामयाबी जरूर मिली। बागियों को राजी करने के लिये कई जतन जेपी के साथियों को करने पड़े, इनमें उनके साथ बीहड़ में रहकर उनका विश्वास जीतना भी था। इसी कवायद के लिये लोकनायक की टीम का हिस्सा रहे सर्वोदयी नेता रविन्द्र सिंह चौहान का कहना है कि ‘1972 की इस घटना में जिसमें माखन सिंह, मोहर सिंह और माधो सिंह जैसे खतरनाक डकैतों ने अपने हथियार रख दिये थे। यह गांधीवादी विचार का एक सफल प्रयोग था। इसको लेकर ज्यादा चर्चा इसलिये नहीं हुई कि तत्कालीन सत्ता नहीं चाहती थी कि जयप्रकाश नारायण जी को कोई श्रेय मिले। बावजूद इसके इस घटना ने एक इतिहास बनाया है जिसे सभी को जानने की आवश्यकता है।
आत्मसमर्पण को राजी करने के लिए रहना पड़ा बीहड़ में
जयप्रकाश नारायण के अनन्य सहयोगी और विनोबा भावे के शिष्य रवींद्र सिंह चौहान रायबरेली के टीकर आगचीपुर के रहने वाले हैं और इस अभियान का एक अहम हिस्सा रहे हैं। जयप्रकाश नारायण के निर्देश पर उन्हें खूंखार डकैत माखन सिंह को हथियार डालने के लिए राजी करने की जिम्मेदारी मिली थी। इसके लिए उन्हें मुरैना जिले में स्तिथ उसके अड्डे पर अपने साथियों रामानन्द दुबे व गोपाल भट्ट के साथ कई दिन बिताने पड़े।
चौहान बताते हैं कि पहले दिन जब वह लोग उसके अड्डे पर पहुंचे तो उसने सीधे कहा कि ‘वह उसे क्या समझाएंगे’। माखन सिंह के साथ वह कई दिन रहे, इस दौरान वह ज्यादा बात नहीं करता था और उसकी नजर हमारी गतिविधियों पर हमेशा रहती थी। बावजूद इसके वह उन सभी के खाने और रहने के लिये अपने साथियों को हिदायत देता रहता था। दहशत के बीच कई बार ऐसे वाकये भी आये जब माखन सिंह उनकी बात सुनने को भी राजी हुआ। बातचीत के दौरान कई बार वह नाराज भी हुआ। 
रवींद्र सिंह चौहान एक किस्सा बयां करते हुए कहते हैं कि जब माखन सिंह हम लोगों से घुलमिल गया तो एक बार काफी देर तक रात में बातचीत होती रही,इसी बीच किसी बात को लेकर उसका 18 वर्षीय बेटा हम लोगों से नाराज हो गया और उनलोगों को तुरंत वहां से जाना पड़ा। चौहान बताते हैं कि अगले दिन जब वह एक कुआं की जगत पर दातुन कर रहे थे तो माखन का वह बेटा वहां आ धमका और अचानक से गोली चला दी जो बगल में रखे लोटे में छेद करते निकल गई। जब इस बात की जानकारी माखन को हुई तो वह उस डकैत से बहुत नाराज़ हुआ और उससे माफ़ी भी मंगवाई। बाद में पता चला कि उस डकैत ने गोली केवल दहशत पैदा करने के लिए चलाई थी। रवींद्र सिंह चौहान का कहना है कि कई सारे किस्से उस दौरान के हैं।धीरे धीरे माखन सिंह को उनलोगों की बात समझ में आने लगी और वह उसका विश्वास जीतने में कामयाब हो सके।
पकड़ छुड़ाने के लिये करना पड़ा अनशन
बागियों को आत्मसमपर्ण के लिए राजी करने के बाबत जेपी के साथियों को कई तरीके अपनाने पड़े। बीहड़ में ही अनशन और सत्याग्रह भी करना पड़ा। चंबल में डकैतों का एक-एक प्रमुख व्यवसाय अपहरण था, इसको लेकर पुलिस की दबिश चलती रहती थी। रवींद्र सिंह के वहां रहने के दौरान भी माखन सिंह ने तीन लोंगो को पकड़ा हुआ है, इस विषय में उससे कहा गया तो वह नाराज हो गया और बदले में अपने 6 साथियों को छुड़वाने की बात करने लगा। रवींद्र सिंह चौहान और उनकी टीम के लिए डकैतों के विश्वास जीतने का यह एक अच्छा मौका था।
रवींद्र सिंह चौहान कहते हैं उनलोगों ने पुलिस से बात करके सबलगढ़ और रामपुर थानों में पकड़े गए उसके सभी साथियों को छुड़वा दिया लेकिन माखन सिंह ने बदले में दो लोगों को तो छोड़ दिया जबकि स्थानीय एक व्यवसायी के बेटे को छोड़ने से इंकार कर दिया। जिससे आहत होकर वह व अन्य साथियों ने बीहड़ में ही अनशन शुरू कर दिया।तीन दिन तक उन लोंगो ने पानी के अलावा कुछ भी नहीं लिया।
चौहान कहते हैं कि इसका असर भी हुआ और माखन सिंह जो कि बात बात में नाराज़ हो जाता था।उनलोगों के पास ख़ुद आया और भोजन करने को कहने लगा।उसने उनलोगों की बात मानते हुए तुरन्त व्यवसायी के बेटे को भी छोड़ दिया। इस घटना के बाद माखन सिंह के मनाने में और मदद मिली।

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