कानपुर (हि.स.)। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति डॉ डी. आर. सिंह के निर्देश के क्रम में आज चारा वैज्ञानिक डॉ हरीश चंद्र सिंह ने गर्मियों में बहु कटान वाली ज्वार (चारा) की खेती के लिए किसानों के लिए एडवाइजरी जारी की है।
उन्होंने बताया कि गर्मियों के मौसम में हरे चारे की कमी हो जाती है। ऐसे में दुधारू पशुओं के लिए इस मौसम में बहु कटान वाली ज्वार बहुत ही लाभप्रद होती है। बताया कि भारत में 4 प्रतिशत भूमि पर चारे की खेती की जाती है। डॉ सिंह ने कहा कि ज्वार का चारा स्वाद व गुणवत्ता में बहुत अच्छा होता है जिसे पशु बहुत ही चाव के साथ खाते हैं।
डॉ सिंह ने बताया कि शुष्क भार के आधार पर ज्वार (चारे) में औसत 9 से 10 प्रतिशत प्रोटीन, 8 से 17 प्रतिशत शर्करा, 30 से 32 प्रतिशत फाइबर, 36 प्रतिशत सैलूलोज एवं 21 से 26 प्रतिशत हेमीसैलूलोज पाया जाता है। बताया कि ज्वार (चारा) के बोने का उत्तम समय मध्य अप्रैल से मध्य मई तक रहता है। तथा इसका बीज 40 से 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पड़ता है। बहु कटान वाली चरी की किस्में जैसे- एस एस जी 59-3, एम पी चरी, पूसा चरी 23, सी एस एच 20- एमएफ, सी एस एच -24 एमएफ है। उन्होंने बताया की बहू कटान चारे का उत्पादन 650 से 700 कुंतल प्रति हेक्टेयर हरा चारा तथा 150 से 200 कुंतल सूखा चारा प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।
उन्होंने पशुपालकों को सावधान करते हुए बताया कि ज्वार में हाइड्रोसाइएनिक असुरक्षित मात्रा में विद्यमान रहता है तथा इसकी अधिक सांद्रता पशुओं के लिए हानिकारक होती है। उन्होंने बताया कि हाइड्रोसाइएनिक अम्ल की सांद्रता यदि चारे में 200 पीपीएम से अधिक है। तो यह हानिकारक होती है।
डॉ सिंह ने बताया कि प्राय: बहु कटान चारा ज्वार के गुण तथा सिंचाई की दशाओं में खेती करने के कारण बुवाई के 50 से 60 दिन में पशुओं के खिलाने योग हो जाती है। लेकिन यदि जमीन में नमी की कमी रहती है तो फसल में विषैला तत्व जमा हो जाता है तथा सूखे की दशा में कटाई के बाद आने वाले कल्लों में हाइड्रोसाइएनिक अम्ल की सांद्रता अधिक होती है। अतः किसान भाई कटाई से पहले सिंचाई करें तथा कटाई के बाद हरे चारे को 4 से 5 घंटे धूप में रखें तत्पश्चात अन्य चारे के साथ उचित मात्रा में मिलाकर पशुओं को खिलाना चाहिए।
महमूद
