ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम की क्या बात करूं।
मैं उससे खुदसे या जमाने से सवालात करूं।।
उजाले दिन को उम्मीदों में गुजार लेता हूं।
अंधेरी रातों का कैसे मैं बयानात करूं।।
हमें साहिल से समंदर का मजा मिलता है।
मैं अपने दिल-ए-नाकाम की क्या बात करूं।।
खुशी की चाहतें थीं लेकिन बस दर्द बचा।
तेरी अमानत है कैसे खयानात करूं।।
आखिर किससे करूं जिक्र मैं मोहब्बत का।
और किसके हवाले ये जज़्बात करूं।।
क्या गिला है ‘ऋषिकेश’ से ज़मानें को।
मंजिलें इश्क के उस गांम की क्या बात करूं।।
गजल
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