घर से बाहर निकलने पर मॉस्क का इस्तेमाल करें, पानी खूब पिएं
गाज़ियाबाद (हि.स.)। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) ने 450-500 का निशान पार कर लिया है जो मान्य स्तरों से बहुत अधिक खतरनाक स्तर है। एनसीआर में प्रदूषण सीवियर श्रेणी में चल रहा है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डा. भवतोष शंखधर की सलाह है कि गाजियाबाद में स्मॉग की स्थिति में अनावश्यक रूप से घर से बाहर निकलने से बचें और यदि निकलना ही पड़े तो मॉस्क का इस्तेमाल करें।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी का कहना है कि हवा में मौजूद बारीक कण (10 से कम पीएम के मैटर), ओजोन, सल्फरडाय ऑक्साइड, नाइट्रिक डायऑक्साइड, कार्बन मोनो और डायआक्साइड सभी सांस की नली में सूजन, एलर्जी का कारक हैं और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। आंखों में जलन, पानी आना और लाल होना, नाक बंद रहना, नाक बहना, बार-बार छींक, सिरदर्द, सांस फूलना, खांसी, छाती में भारीपन जैसे लक्षणों से आप समझ सकते हैं कि हवा की गुणवत्ता में गिरावट आई है और इससे बचने की जरूरत है। यह लक्षण कितने गंभीर होंगे यह प्रदूषण के स्तर, एक्सपोजर (प्रत्यक्ष सामना) और निजी स्वास्थ्य की स्थिति पर निर्भर करेगा। परिवेश में प्रदूषण की अधिकता से दिल का दौरा, स्ट्रोक और सीओपीडी का खतरा भी बढ़ता है।
मैक्स अस्पताल वैशाली में पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. शरद जोशी ने बताया कि हमारे फेफड़ों पर वायु प्रदूषण का असर इस पर निर्भर करता है कि हवा में किस प्रकार के प्रदूषक हैं। उनका क्या मिश्रण है। प्रदूषक कितने सघन हैं और आपके फेफड़ों में कितनी मात्रा में प्रदूषक पहुंच रहे हैं। विशेष कर इन दिनों भयानक स्मॉग और प्रदूषण की वजह से धूम्रपान नहीं करने वालों को भी सीओपीडी और फेफड़ों की अन्य जानलेवा बीमारियों का बहुत खतरा है।
स्वास्थ्य के इन दुष्परिणामों से बचने का सबसे सही समाधान इन प्रदूषकों के प्रत्यक्ष प्रकोप से बचना, अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाना (हवा शुद्ध करने का प्राकृतिक उपाय), दहन (जैसे पराली जलाना और वाहन प्रदूषण) रोकना है।
