Wednesday, February 18, 2026
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कुशीनगर : त्रेतायुग जैसी स्वास्थ्य व पर्यावरणीय व्यवस्था दुरुस्त करने की कवायद

कुशीनगर (हि.स.)। कुशीनगर में त्रेतायुग में भी स्वस्थ पर्यावरणीय व सुंदर नगरीय व्यवस्था थी। अयोध्या के राजा श्रीराम के पुत्र ‘कुश’ की राजधानी ‘कुशावती’ का उल्लेख भी इसी भू-भाग पर ही माना जाता है। इतना ही नहीं, बौद्ध धर्म के प्रणेता भगवान बुद्ध और जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने भी देह त्यागने को इसी स्थल को चुना था। गुप्तकालीन सूर्य मंदिर के भी यहां प्रमाण हैं। पौराणिक काल की तरह ही अब इस भूमि के स्वास्थ्य, जल और पर्यावरण को शुद्ध करने के साथ नगरीय व्यवस्था को दुरुस्त करने की कवायद जारी है।
कुशीनगर पर अब सरकार की नजर है। द्रुत गति से विकास हो रहा है। त्रेतायुग में शुरू हुई पुरानी पर्यावरणीय, नगरीय व स्वास्थ्य व्यवस्था देने का प्रयास है। स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार, जन सुविधा विस्तार के साथ अंतर-राष्ट्रीय हवाई अड्डा की स्थापना कुछ महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं। कुशीनगर विशेष विकास क्षेत्र प्राधिकरण (कसाडा) के एरिया में बनने वाली प्रमुख सड़कों के 200 मीटर दायरे में ग्रीन बेल्ट घोषित किया गया है। ऑक्सीजन प्लांट-मेडिकल कालेज की स्थापना जैसी मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त किया जा रहा है। चौड़ी सड़कें और जगह-जगह बन रहे गोदाम, प्राचीन कुशीनगर के अन्नागार जैसे निर्माणों की याद दिला रहा है।
पौराणिक काल में ‘कुशावती’ के नाम से विख्यात था ‘कुशीनगर’उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण सम्मान से नवाजे गए साहित्यकार प्रमोद कांत मिश्र की मानें तो कुशीनगर की चर्चा पौराणिक ग्रंथों में श्रीराम के पुत्र कुश की राजधानी के रूप में की गई है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह त्रेता युग में भी आबाद था। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पुत्र कुश की राजधानी ‘कुशावती’ के नाम से जाना गया। सुंदर स्थापत्य कला और अधिक वन क्षेत्र की वजह से यहां पर्यावरणीय व्यवस्था बहुत दुरुस्त थी। नदियों की कलकलाहट जीवन रेखा थी। उस समय यह इलाका ‘देवारण्य’ (देवताओं का बगीचा) क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध था। तुर्कपट्टी में गुप्तकालीन सूर्य मंदिर भी है।

16 महाजनपदों में से एक रहाडॉ इंद्रजीत मिश्र बताते हैं कि पालि साहित्य के ग्रंथ त्रिपिटक में कुशीनगर की गणना बौद्ध काल के 16 महाजनपदों में की गई है। मल्ल राजाओं की यह राजधानी तब ‘कुशीनारा’ के नाम से जानी जाती थी। एक बार फिर अब इसे पुरानी व्यवस्थाओं से सुविधा सम्पन्न कराने का प्रयास कुशीनगर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (कसाडा) कर रहा है।

‘चीनियों’ के यात्रा वृत्तान्तों में है बखान शोधार्थी राजरंजन द्विवेदी के मुताबिक चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाह्यान के यात्रा वृत्तातों में भी कुशीनगर का उल्लेख है। ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी के अन्त तक या छठी शताब्दी की शुरू में यहां भगवान बुद्ध का आगमन हुआ। कुशीनगर में अंतिम उपदेश देने के बाद उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।

‘छठियांव’ में बुद्ध को खिलाया कच्चा मांस, कुशीनगर में निर्वाणकुशीनगर के करीब फाजिलनगर कस्बा है। यहां ‘छठियांव’ नामक गांव है। यहां किसी ने महात्मा बुद्ध को सूकर का कच्चा मांस खिला दिया। दस्त की बीमारी शुरू हुई। मल्लों की राजधानी कुशीनगर तक जाते-जाते वे निर्वाण को प्राप्त हो गए।

यहां ‘बुद्ध’ को ‘जोगीरा बाबा’ पुकारते हैं फाजिलनगर में आज भी कई टीले हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग की ओर से कुछ खुदाई का काम कराया गया है। फाजिलनगर के पास ग्राम जोगिया जनूबी पट्टी में एक अति प्राचीन मंदिर के अवशेष में बुद्ध की अति प्रचीन मूर्ति खंडित अवस्था में पड़ी मूर्ति को स्थानीय लोग ‘जोगीर बाबा’ कहते हैं। 

हिरण्यवती-बांसी नदियां देतीं हैं गवाही भगवान राम के विवाह के उपरान्त पत्नी सीता व अन्य सगे-सम्बंधियों के साथ इसी रास्ते जनकपुर से अयोध्या लौटे थे। उनके पैरों से रमित धरती पहले पदरामा और बाद में पडरौना के नाम से जानी गई। जनकपुर से अयोध्या लौटने के लिए भगवान राम और उनके साथियों ने बांसी नदी को पार किया था। आज भी बांसी नदी के इस स्थान को ‘रामघाट’ के नाम से जाना जाता है। मुगल काल में भी यह जनपद अपनी खास पहचान रखता था। कुशीनगर के सटकर प्रवाहित होने वाली पौराणिक नदी हिरण्यवती के किनारे बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया। इसको प्रवाहित करने और घाटों के सुंदरीकरण का कार्य शुरू है। प्राचीन काल के मुताबिक एक बार नदियों को स्वच्छ और निर्मल बनाने पर जोर है।
जैनियों के आस्था की है भूमिप्रो आनंदानन्द का कहना है कि कुशीनगर से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में मल्लों का एक गणराज्य पावा था। यहां बौद्ध धर्म के समानांतर ही जैन धर्म का प्रभाव था। माना जाता है कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी (बुद्ध के समकालीन) ने पावानगर (वर्तमान में फाजिलनगर) में ही परिनिर्वाण प्राप्त किया था। गुप्तकाल के तमाम भग्नावशेष आज भी जिले में बिखरे हैं। पुरातत्व विभाग ने इन्हें संरक्षित घोषित कर रखा है।

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