मेरठ (हि.स.)। मुजफ्फरनगर में हो रही किसान महापंचायत के जरिए 2022 के उप्र विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ 2019 जैसे महागठबंधन की कवायद शुरू हो गई है। किसान महापंचायत के मंच से उप्र और उत्तराखंड में भाजपा को हराने के नारे लगाए गए। इससे 2022 के चुनावों में उप्र में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने की मंशा साफ हो गई है।
किसान महापंचायत को रालोद नेतृत्व ने अपना खुला समर्थन दिया और लोगों को महापंचायत में लाने के लिए खुलकर प्रचार किया। इसी तरह से समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी अपने कार्यकर्ताओं को महापंचायत के पक्ष में प्रचार करने और जाने की खुली छूट दी। महापंचायत में योगेंद्र यादव, मेधा पाटकर, गुरनाम सिंह चढूनी जैसे नेताओं ने खुलकर भाजपा सरकार पर हमला बोला। उन्होंने साफ कहा कि केंद्र और उप्र की भाजपा सरकार का तख्ता पलटना जरूरी है। मंच से भाकियू नेताओं ने भाजपा के खिलाफ खुलकर काम करने का ऐलान किया।
2013 के दंगों के पहले समीकरणों पर रहा जोर
मेधा पाटकर, योगेंद्र यादव ने 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों पर जमकर अपनी भड़ास निकाली। मंच से भाषण में उन्होंने 2013 के दंगों के पहले के समीकरण बनाने पर जोर दिया और भाजपा को सांप्रदायिक दंगे कराने वाली पार्टी करार दिया।
मुस्लिम-जाट समीकरण फिर से जीवित करने की कवायद
इस महापंचायत को भले ही कृषि कानूनों के विरोध में बुलाने की बात कही गई हो, लेकिन मंच से हुए भाषणों से स्पष्ट है कि वेस्ट यूपी के मुस्लिम-जाट समीकरणों को फिर से स्थापित करने की कवायद तेज की जाए। महापंचायत में बड़ी संख्या में मुस्लिमों की भागीदारी इस बात को पुष्ट करती है। इसके साथ ही भाकियू नेता राकेश टिकैत ने मंच से अल्लाह-हू-अकबर और हर-हर महादेव के नारे लगवा कर अपनी सियासी मंशा स्पष्ट कर दी।
पश्चिम उप्र में फिर सियासी जोर आजमाने की मंशा
किसान महापंचायत के जरिए भाजपा के सामने भाकियू और रालोद नेतृत्व ने अपना शक्ति प्रदर्शन करके सियासी हालात माहौल गर्मा दिया है। राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र कुमार का कहना है कि किसान महापंचायत के जरिए भाकियू जहां राजनीतिक पारी खेलने के मूड में है, वहीं रालोद अपनी खोई सियासी जमीन पाने की जुगत में लगी है। इसलिए महापंचायत का माहौल बनाया गया है। इस महापंचायत का ज्यादा सियासी प्रभाव नहीं पड़ेगा। उप्र के आगामी चुनावों में भाजपा को ही इसका फायदा पहुंचेगा।
सपा, बसपा, कांग्रेस, आप के गठबंधन पर जोर
सियासी पंडितों का कहना है कि भाकियू और रालोद का मकसद महापंचायत के जरिए अपनी राजनीतिक ताकत दिखाना है। इसके जरिए विधानसभा चुनावों में वे सपा जैसे दलों के साथ सीटों का अच्छा तालमेल कर सकेंगे। इस गठबंधन में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को भी जोडने के प्रयास किए जाएंगे।
