– अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष 2023, ‘श्रीअन्न अनाज खाओ, बीमारी दूर भगाओ’
– हर थाली तक संतुलित और पोषक आहार पहुंचाने का लक्ष्य
– मोदी सरकार की श्रीअन्न को बढ़ावा देने की नीति बदलेगी खेती का परिदृश्य
मीरजापुर (हि.स.)। एक समय था जब हर घर में खाने की थाली में कोई न कोई श्रीअन्न (मोटा अनाज) अवश्य मिल जाता था। कुल अनाज उत्पादन में 40 प्रतिशत तक श्रीअन्न की हिस्सेदारी रहती थी। धीरे-धीरे स्थिति बदली और थाली से ये अनाज दूर हो गए। कुल अनाज में इनकी हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी कम रह गई है, लेकिन अब श्रीअन्न की खेती किसानों के लिए नजीर बनेगी। श्रीअन्न की पहुंच गरीबों तक होने से ये सभी आय श्रेणी के लोगों को पोषण प्रदान करने के साथ वर्षा आधारित कृषि प्रणालियों का जलवायु अनुकूलन के साथ समर्थन करने में एक आवश्यक भूमिका निभाएगी।
किसानों ने ढूंढी श्रीअन्न की खेती में खुशहाली
मानसूनी बारिश श्रीअन्न की खेती के लिए वरदान साबित हो रही है। किसान मक्का, ज्वार, बाजरा, कोदो, उड़द आदि की बोआई में जुटे हुए हैं। हलिया क्षेत्र के मतवार और कुशियरा गांव में आज भी कोदों की खेती की जाती है। सही समय पर मानसून की दस्तक से जिले भर के किसान खरीफ की खेती में जुट गए हैं।
परंपरागत फसलों की ओर बढ़ा रुझान, स्वास्थ्य के प्रति सजग
हलिया के हथेड़ा गांव निवासी किसान गुलाब चंद दुबे ने कहा कि श्रीअन्न (मोटे अनाज) से कुपोषण दूर होता है। क्षेत्रीय किसान श्रीअन्न की खेती पर जोर दे रहे हैं। अच्छे उत्पादन से आय में इजाफा होगा। कोटार निवासी शीतला प्रसाद मिश्र ने बताया कि बारिश होने के बाद मक्के की बुआई कर दी गई है। अहुगी खुर्द निवासी मुरारीधर दुबे का कहना है कि श्रीअन्न स्वास्थ के लिए जितना लाभदायक है, इसकी खेती भी उतनी सहज है। कम लागत में श्रीअन्न की खेती कर अच्छा मुनाफा कमाएंगे। अहुगी कला निवासी सूर्यप्रताप सिंह कहते हैं कि बारिश होने के बाद मक्का, ज्वार, बाजरा आदि की खेती में जुट गए हैं। बारिश का क्रम इसी तरह से जारी रहा तो खरीफ की खेती में फायदा होगा।
गुणों की खान है श्रीअन्न, जगाएगी उम्मीद की किरण
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय श्रीअन्न वर्ष भी घोषित किया है। इससे उत्पादन और खपत को लेकर जागरूकता बढ़ी है। साउथ कैंपस बीएचयू बरकछां के कृषि वैज्ञानिक श्रीराम सिंह ने बताया कि श्रीअन्न कम पानी में उपजने में सक्षम है। छोटी जोत वाले किसानों के लिए ये फसलें वरदान से कम नहीं हैं। जटिल मौसमी परिस्थितियों में भी इनकी खेती आसानी से हो जाती है। सिंचाई और खाद पर होने वाला खर्च भी कम हो जाता है। बड़ी खूबी यह भी है कि 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर भी ये फसलें उपज जाती हैं। सूखे के मौसम में जब सभी फसलें खराब हो जाती हैं, उस समय भी खेत में मोटे अनाज की फसलें खड़ी रह जाती हैं। संकट के दौर में भी श्रीअन्न उम्मीद की किरण जगाते हैं। खाद्य व पोषण सुरक्षा देने के साथ पशुचारा भी मुहैया कराते हैं। पोषक तत्वों की दृष्टि से इन्हें गुणों की खान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यदि पोषक खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग से निपटना है तो वर्षाधीन इलाकों में दूसरी हरित क्रांति जरूरी है।
श्रीअन्न को बढ़ावा देने में जुटी है मोदी सरकार
श्रीअन्न में मुख्य रूप से बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, सांवा, कोदो, कंगनी, कुटकी और जौ शामिल हैं, जो हर दृष्टि से सेहत के लिए लाभदायक हैं। 1960 के दशक में हरित क्रांति के नाम पर गेहूं व धान को प्राथमिकता देने से श्रीअन्न उपेक्षित हो गए, लेकिन मोदी सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद जैसे कदमों से अब श्रीअन्न को बढ़ावा मिलेगा। प्रधानमंत्री खुद पिछले कई वर्षों से विदेशी मेहमानों के भोजन में श्रीअन्न से बने पकवान के कुछ आइटम रखते रहे हैं। स्पष्ट है कि मोदी सरकार की श्रीअन्न को बढ़ावा देने की नीति खेती के पूरे परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखती है।
बढ़ी जागरूकता, गरीबी के प्रतीक श्रीअन्न बने अमीरों की पसंद
श्रीअन्न भले ही उपेक्षित हुए हों, लेकिन पशुओं के भोजन व औद्योगिक इस्तेमाल बढ़ने के कारण इनका महत्व बना रहा। कोरोना के बाद श्रीअन्न इम्युनिटी बूस्टर के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं। इन्हें सुपर फूड कहा जाने लगा है। सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता का ही नतीजा है कि जो श्रीअन्न कभी गरीबी के प्रतीक माने जाते थे। वे अब अमीरों की पसंद बन गए हैं। यही कारण है कि बड़े-बड़े शापिंग मॉल में अब मोटे अनाज से बने प्रोडक्ट बिकने लगे हैं।
कमलेश्वर शरण/मोहित
