Saturday, April 11, 2026
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कासगंज: माटी के सृजनकारों को अब मोल नहीं मिल रही माटी

कासगंज (हि.स.)। माटी को अपने हाथों से ढालकर अलग-अलग तरह की कलाकृति बनाकर रोजगार पाने वाले कुम्हार इन दिनों काफी परेशान है। पहले तो उन्हें माटी बिना मोल के ही मिल जाती थी, लेकिन अब उनके सामने संकट खड़ा हो गया है। तालाबों के पट्टे हो चुके हैं। नदियों से खनन ठेकेदार उन्हें माटी नहीं लेने दे रहे हैं। सृजनकर्ता माटी के अभाव में इन दिनों भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं।

चाक की रफ्तार थम सी गई है अधिकांश कुम्हारों ने अपना पेशेवर कार्य छोड़ दिया है। वे दूसरे कार्यों से जुड़ गए हैं। कोई परचून की दुकानदारी कर रहा है तो किसी ने हलवाई के साथ सहालग का काम शुरू कर दिया है। यही नहीं पैसे के अभाव में तमाम कुम्हार मजदूरी करने को भी विवश हो गए हैं। सरकार ने इन्हें डिजिटल करने का तो प्रयास किया है इलेक्ट्रॉनिक चौक दिए हैं लेकिन इसके साथ इनके पेशे से जुड़ी मूल वस्तु माटी का कोई प्रबंध नहीं किया है जिससे इन्हें खासी दिक्कतें हो रही है तालाबों के पट्टे कर दिए गए हैं जहां से यह मिट्टी नहीं ले सकते हैं नदियों के खनन ठेकेदार इन्हें मिट्टी लेने से रोकते हैं ऐसे में इनके सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है मिट्टी के अभाव में इनका रोजगार पूरी तरह ठप हो गया है।

क्या कहते हैं कुम्हार

कस्बा सिढ़पुरा के निवासी कुम्हार राकेश कुमार कई दशकों से माटी की कलाकृति बनाने का काम करते थे। उनके परिवार के भरण पोषण का साधन भी यही था। पिछले दिनों से माटी सुलभ एवं सरल रूप से उपलब्ध नहीं हो पा रही है। जिसके चलते इन दिनों कस्बे में स्थित मेन चौराहे पर ठेल लगा कर कच्छे, बनियान बेचने का काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने मिट्टी पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके चलते उनका रोजगार ठप हो गया है।

कासगंज शहर के मोहल्ला जयजय राम गली अट्टा वाली के निवासी बुजुर्ग कुम्हार सालिगराम का कहना है कि एक तो मिट्टी का अभाव दूसरा उनकी तबीयत भी खराब रहती है। जिसके चलते उन्होंने यह कार्य बंद कर दिया है। उनके पुत्र एवं पौत्र दूसरे कामों से जुड़ गए हैं। उनका कहना है कि यदि मिट्टी सरलता से उपलब्ध होती रहती तो शायद उनका जीवन यापन अपने पेशेवर कार्य से ही जारी रहता। मजबूरीवश उन्हें अपना पेशे का कार्य छोड़ना पड़ा है।

पुष्पेंद्र

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