वाराणसी (हि.स.)। कोरोना संक्रमण के चलते मोहर्रम से जुड़ी परम्पराओं का पालन पाबंदियों के बीच होगा। कोविड प्रोटोकाल का पालन कर मोहर्रम मनाया जायेगा। इस साल ताजियादारी भी कोविड-19 नियमों का पालन करते हुए की जाएगी। जिसमें ताजिए इमाम चौकों पर स्थापित किए जाएंगे। परंतु इनको कर्बला तक ले जाने के लिए जुलूस नहीं उठाया जाएगा। ताजियों पर चढ़ाया गया फूल ही कर्बला ले जाया जाएगा और दफन किया जाएगा।
रविवार को मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी , अली समिति के सचिव एवं मीडिया प्रभारी हाजी फरमान हैदर, मौलाना हारून नक्शबंदी ने मीडिया कर्मियों को बताया कि इस साल भी मोहर्रम से जुड़ी रवायत कोविड नियमों का पालन करते हुए आयोजित की जाएंगी ।
हाजी फरमान हैदर ने बताया कि मोहर्रम तो 2 महीना 8 दिन मनाया जाता है। लेकिन एक मोहर्रम से 12 मोहर्रम तक बहुत शिद्दत के साथ ग़म मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि मोहर्रम को धर्म विशेष से जोड़ना सही नहीं है। क्योंकि हिंदुस्तान में मुहर्रम किसी धर्म विशेष या वर्ग विशेष द्वारा ही नहीं मनाया जाता। बल्कि सभी धर्म इसमें अपने-अपने तरीके से शामिल होते हैं।
वार्ता के दौरान पुलिस द्वारा जारी गाइडलाइन पर भी कड़ी आपत्ति जताई गयी। मौलाना बशीर ने कहा के हमें प्रशासन की शब्दावली से बड़ी ठेस पहुंची है। वार्ता में अली समिति के ज़हीर अब्बास भी मौजूद रहे।
बताते चले, मोहर्रम का महीना इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है। यह महीना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस माह के 10वें दिन आशुरा मनाया जाता है। यह इस्लाम मजहब का प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार इस बार 19 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन इमाम हुसैन का कर्बला की लड़ाई में सिर कलम कर दिया गया था। उनकी याद में इस दिन जुलूस और ताजिया निकालने की रवायत है। मुसलमान भाई रोजा-नमाज के साथ इस दिन ताजियों-अखाड़ों को दफन या ठंडा कर शोक मनाते हैं। इससे पहले मोहर्रम की नौ तारीख को रात भर जुुलूस निकलने तथा मातम करने का सिलसिला चलता रहता है।
