Tuesday, March 31, 2026
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कबीर व तुलसी के राम के बीच का भेद एक सुनियोजित ढंग से उत्पन्न किया गया भ्रम है : प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित

लखनऊ (हि.स.)। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में “कबीर के राम: तुलसी के राम” विषय पर चल रही दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन मंगलवार को हो गया। 
 कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित, पूर्व आचार्य, लखनऊ विश्वविद्यालय, ने बताया कि कबीर और तुलसी के राम के बीच का भेद एक सुनियोजित ढंग से उत्पन्न किया गया भ्रम है। जो तथाकथित प्रगतिशील समाज के लोगों द्वारा पैदा किया गया है। इसमें यह बताया गया कि कबीर लोकवादी हैं और वह समाज में समानता की बात करते हैं, जबकि तुलसी सामंतवादी है जो शासन की बात करता है। परंतु वास्तविकता में तुलसी और कबीर दोनों एक ही प्रकार के आदर्शों की बात करते हैं और दोनों के ही राम एक हैं। दोनों ही जनकल्याण की बात करते हैं, दोनों ही एक आदर्श समाज के लिए किन-किन गुणों का होना आवश्यक है, उसकी व्याख्या करते हैं। बस फर्क साकार और निराकार का है। कबीर निराकार राम की व्याख्या करते हैं और तुलसी दशरथ पुत्र राम की व्याख्या करते हैं जो साकार हैं। 
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर सुधीर प्रताप सिंह,  भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू, दिल्ली, ने बताया कि कबीर ने राम के गुणों को बता दिया और जो भी इन गुणों को आत्मसात करता है वह सभी राम है। उन्होंने समाज के सामने एक आदर्श मनुष्य के सभी गुणों को राम के रूप में वर्णित किया। वहीं तुलसी ने मनुष्य रूप में राम का वर्णन किया जिसमें दया, न्याय, कर्मनिष्ठा जैसे कई गुण है। जो समाज मे आदर्श पुरुष और पुरुषोत्तम है। 
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रोफ़ेसर योगेंद्र प्रताप सिंह, आचार्य इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, ने बताया कि चेतना  कई प्रकार की होती है, जिसमें व्यष्टि, समष्टि और विराट चेतना है। विराट चेतना के स्तर पर सबके राम एक हो जाते हैं । चाहे वह कबीर के निर्गुण राम हों या तुलसी के सगुण राम।  संगोष्ठी के संयोजक डॉक्टर बलजीत कुमार श्रीवास्तव ने संगोष्ठी प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और बताया कि संगोष्ठी में चार  सत्र आयोजित हुए, जिसमें लगभग 24 प्रख्यात वक्ताओं ने विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। 

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