Wednesday, March 4, 2026
Homeअन्यकद्दू वर्गीय फसलों का अच्छा उत्पादन के लिए बीमारियों व कीटों से...

कद्दू वर्गीय फसलों का अच्छा उत्पादन के लिए बीमारियों व कीटों से बचाओ करे किसान : डॉ अंकुर झा

– गर्मी के मौसम में बरसात होने पर पौधों में लगती है अधिक बीमारियां 

औरैया (हि.स.)। जिला के परवाहा गांव स्थित सरपंच समाज कृषी विज्ञान केंद्र के पौध सरक्षण वैज्ञानिक डॉक्टर अंकुर झा ने किसानों को कद्दू वर्गीय फसलों जैसे कद्दू, लौकी, तोरई, ककड़ी, खीरा, भिन्डी, टिण्डा, परवल आदि जैसी फसलों में लगने वाली बीमारियों, कीटों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए उनके प्रबन्धन, रोकथाम तथा कीटनाशको के उपयोग की जानकारी दी। जिससे किसान फसलों को बीमारियों और कीटो से बचाव कर अच्छी पैदावार प्राप्त कर मुनाफा कमा सके।
कद्दू वर्गीय फसलों में आने वाली प्रमुख बीमारियों एवं कीटों की रोकथाम के लिए डॉक्टर झा ने बताया कि किसान भाई अपनी कद्दू वर्गीय फसलों में बीमारियों एवं कीटों की रोकथाम निम्नलिखित उपाय करें, जिससे कद्दू वर्गीय फसलों में बीमारियों एवं कीटों का प्रकोप न होने पाए चूर्णिल आसिता कीट का आक्रमण होने पर बेलों, पत्तियों और तनों पर सफेद पर्ते चढ़ जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिये कैराथिन नामक दवा को एक ग्राम/ली. पानी में या बेविस्टीन 2 ग्राम/ली. पानी में घोलकर 10-12 दिनों के अन्तराल पर शायंकाल के समय छिड़काव करें। मृदुल आसिता बीमारी में पत्तियों की निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं यदि गर्मियों के मौसम में बरसात हो जाए तो यह बीमारी बहुत अधिक फैलती है। इसकी रोकथाम हेतु डायथेन एम.-45 अथवा रिडोमिल नामक दवा को 2.0 ग्राम/ली. पानी में घोलकर शायंकाल के समय छिड़काव करें।
मोजैक बीमारी विषाणु द्वारा होती है इस बीमारी से ग्रसित पौधे की पत्तियों पर पीले रंग की धारियां या धब्बे बन जाते हैं एवं पत्तियां छोटी रह जाती हैं और सिकुड़ने लगती हैं तथा इस रोग का फैलाव रस चूसने वाले कीटों द्वारा होता है। इस रोग की रोकथाम के लिए रोगग्रस्त पौधों की पहचान कर शीघ्रता से उखाड़कर गढ्ढे में दबा देना चाहिए। वायरस के संवाहक सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरप्रिड नामक दवा को 17.8 एस.एल. एक मिली./ली. का शायंकाल के समय छिड़काव करें एवं पीले व नीले रंग के स्टिकी ट्रैप (चिपकने वाला यंत्र) 10-12 ट्रैप/एकड़ की दर से प्रयोग करें। एन्थ्रेक्नोज नामक बीमारी में हल्के भूरे धब्बे पत्तियों में आते हैं जो कि बाद में हरे भूरे रंग में परिवर्तित होकर पूरे पौधों में फैल जाते हैं। 
इस बीमारी की रोकथाम के लिए डायथेन एम 45 नामक दवा अथवा बेबिस्टीन नामक दवा को 2.0 ग्राम/ली. पानी में घोल बनाकर शायंकाल के समय छिड़काव करें। लाल कद्दू भ्रंग- इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों ही फसल को हानि पहुंचाते हैं। वयस्क कीट पौधों के पत्तों में टेढ़े-मेढ़े छेद करते हैं जबकि शिशु पौधों की जड़ों, भूमिगत तने व भूमि से सटे फलों तथा पत्तों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके नियंत्रण हेतु एमामेक्टिन बैंजोएट नामक दवा को 5 एस.जी.-10 ग्राम/15 ली. पानी या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस.सी.-एक मि.ली./दो ली. पानी का शायंकाल के समय छिड़काव करें। फल मक्खी- इस कीट की मक्खी फलों में अंडे देती है तथा शिशु अंडे से निकलने के तुरंत बाद फल के गूदे को भीतर ही भीतर खाकर सुरंग बना लेते हैं। 
इसके नियंत्रण हेतु स्पाइनोसेड 45 एस. सी. नामक दवा की 2 मिली./10 ली. पानी की दर से शायंकाल के समय छिड़काव करें एवं फल मक्खी की रोगथाम हेतु प्रपंच यंत्र (फेरोमेन ट्रैप) 12-15 प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें। सफेद मक्खी एवं चेपा-इस कीट के शिशुओं व वयस्कों के रस चूसने से पत्ते पीले पड़ जाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड नामक दवा को 17.8 एस.एल.- एक मिली./ली. या डाइमेथोएट 30 ई.सी. दो मिली./ली. पानी की दर से शायंकाल के समय छिड़काव करें। 

RELATED ARTICLES

Most Popular