Tuesday, February 17, 2026
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कटड़ा में भूमिका मंदिर पर गोंडा के भक्तों ने किया जागरण

चार बसों में भरकर 10 दिवसीय यात्रा पर दो सितंबर को निकला था जत्था

जानकी शरण द्विवेदी

कटड़ा (रियासी)। जम्मू कश्मीर राज्य के कटड़ा में स्थित भूमिका मंदिर पर बीती रात गोंडा से वैष्णव माता के दर्शन के लिए पहुंचे करीब 300 भक्तों ने मां के चरणों में बैठकर रात्रि जागरण किया। कौशल उपाध्याय संकीर्तन मंडली ने पंडित श्रीधर की कुटिया में बैठकर मां का गुणानुवाद किया। बताते चलें कि बीते दो सितंबर को गोंडा और आसपास के जिलों से करीब 300 श्रद्धालुओं का जत्था नौ देवियों के दर्शन के लिए श्रवण श्रीवास्तव के नेतृत्व में ट्रेन से रवाना हुआ था। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले तक ट्रेन से यात्रा करने के बाद भक्तों का जत्था चार आरक्षित बसों में सवार होकर मां शाकंभरी के दरबार में पहुंचा और पहला दर्शन किया। योगी सरकार में भी एक प्रसिद्ध मंदिर की उपेक्षा देखकर काफी तकलीफ हुई। यहां दूर दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शौचालय और स्नानागार तक की ठीक से व्यवस्था नहीं है। इसके बाद मां के भक्त हरियाणा के पंचकुला जिले में मंशा देवी मंदिर पहुंचे और यहां मां का दर्शन किया। मुख्य मंदिर के पीछे भैरोंनाथ का मंदिर है। मंशा देवी मां के दर्शन के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालु इसके थोड़ी ही दूर पर पटियाला मंदिर देखने अवश्य जाते हैं। इसके बाद भक्तों का जत्था पंचकुला के ही पिंजौर स्थित कालका मंदिर पहुंचा, जहां दर्शन किया। यह मंदिर हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर है। मंदिर से चंद कदमों की दूरी पर स्थित घग्गर नदी दोनों राज्यों की सीमा रेखा तय करती है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यहां मां काली का विशाल मंदिर है। इन मंदिरों का दर्शन करके श्रद्धालुओं का जत्था आगे बढ़ गया। रात्रि करीब 12 बजे जत्था आनंद पुर साहिब गुरुद्वारा पहुंचा। पांच नदियों (झेलम, चेनाब, राबी, व्यास और सतलज) के नाम से अपनी पहचान बनाए कृषि प्रधान राज्य पंजाब के रूपनगर ज़िले में स्थित आनन्दपुर साहिब गुरुद्वारे में रविवार को मत्था टेक कर सभी को श्री गुरु के चरणों में अरदास करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। शिवालिक पर्वतमाला के चरणों में सतलज नदी के समीप स्थित तथा गुरु तेग बहादुर द्वारा स्थापित आनन्दपुर साहिब गुरुद्वारा सिख धर्म में सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। इस गुरुद्वारे में पहुंचे लोग ठहरने के ठिकानों पर अपना सामान रखकर एक बजे के आसपास लंगर में पहुंचे। यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि रात एक बजे भी लंगर चल रहा था। साथियों ने लंगर चखकर खुद को तृप्त किया। गुरु गोविंद सिंह जी की बहादुरी के साथ ही उनका त्याग एवं बलिदान उनके वंशजों में आज भी स्पष्ट दिखाई देता है।

कटड़ा में भूमिका मंदिर पर गोंडा के भक्तों ने किया जागरण


इसके बाद मां के भक्त हिमाचल प्रदेश के विलासपुर जिले में नैना देवी के मंदिर गए और दर्शन पूजन किया। पुनः ऊना जिले में स्थित चित्तपूर्णी माता का दर्शन किया। वैसे तो पर्यटन के लिए मशहूर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में दर्शन भर से अधिक मंदिर हैं किंतु गोंडा के भक्तों ने ज्वाला माता का दर्शन किया गया। कहा जाता है कि मंदिर में खोखले चट्टान से वर्षों से लौ (ज्वाला) अनवरत निकल रही है। यहां मां सती की जीभ गिरी बताई जाती है। मंदिर के अंदर माता की नौ ज्योतियां है जिन्हें, महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका के नाम से जाना जाता है। यहां मां का दर्शन इसी लौ में होता है। यहीं पर गुरु गोरखनाथ का मंदिर भी है जिसे गोरख डिब्बी कहा जाता है। भक्त यहां का दर्शन करके कांगड़ा जिले में ही कोटला किले के द्वार पर स्थित बगलामुखी मंदिर पहुंचे। कहा जाता है कि बगलामुखी हिंदू धर्म में 10 महाविद्याओं में से एक है। बगलामुखी देवी अपने भक्तों की गलतफहमी और भ्रम (या भक्त के दुश्मन) को अपने खडग से दूर करती है। उत्तर भारत में इन्हें पीतांबरा माँ के नाम से भी जाना जाता है। बगलामुखी मंदिर में हवन करवाने का विशेष महत्व है, जिससे कष्टों का निवारण होने के साथ-साथ शत्रु भय से भी मुक्ति मिलती है। द्रोणाचार्य, रावण, मेघनाद इत्यादि सभी महायोद्धाओं द्वारा माता बगलामुखी की आराधना करके अनेक युद्ध लड़े गए। नगरकोट के महाराजा संसार चंद कटोच भी प्राय: इस मंदिर में आकर माता बगलामुखी की आराधना किया करते थे, जिनके आशीर्वाद से उन्होंने कई युद्धों में विजय पाई थी। भक्तों ने यहां पर बगलामुखी माता का दर्शन किया। बाद में यह जत्था नगर कोट में स्थित बज्रेश्वरी माता का दर्शन करके पालमपुर से करीब 10 किमी दूर बनेर नदी के तट पर स्थित चामुंडा माता के दर्शन के लिए प्रस्थान कर गया। यहां पर भगवान शिव की एक सुंदर मंदिर तथा बजरंग बली की विशाल प्रतिमा भी है। मंदिर को स्पर्श करते हुए कल कल करती बहने वाली बनेर नदी भक्तों को अपनी तरफ स्वत: आकर्षित करती है। मां चामुंडा का दर्शन करके मां के भक्त पठानकोट होते हुए जम्मू कश्मीर राज्य में प्रवेश कर गए। यहां जम्मू जिले में चिंची माता को प्रणाम करते हुए कौल कंडोली माता का दर्शन किया। बताया जाता है कि माता ने कुछ क्षण के लिए यहां पर झूले पर विश्राम किया था। जत्था 06 सितंबर की रात में कटड़ा पहुंच गए। अगले दिन लोग अपनी सुविधानुसार यात्रा पर्ची लेकर भवन की तरफ प्रस्थान कर गए। जत्थे के लोगों ने दो दिन में मां वैष्णव देवी का दर्शन करके कटड़ा लौट गए। अगले दिन कुछ लोग शिव खोड़ी और पत्नी टॉप आदि स्थानों पर भी गए। शुक्रवार की रात में भूमिका मंदिर पर जागरण का आयोजन किया गया था। यात्रा में मधु श्रीवास्तव, डा आकाश एवं रूपम श्रीवास्तव, महंत हरि प्रकाश त्रिपाठी, केके शुक्ला, कृष्ण मुरारी श्रीवास्तव, विजय शंकर गुप्ता, मधुबाला, पूनम, शांति दुर्गापाल, मोहन चंद, संजय श्रीवास्तव, दिनेश गुप्ता, राजीव श्रीवास्तव, अनूप श्रीवास्तव, अलका श्रीवास्तव, पवन श्रीवास्तव, दिनेश श्रीवास्तव, ध्रुव नारायण सोनी, संतोष त्रिपाठी, रमेश श्रीवास्तव, मनोज त्रिपाठी, अवधेश सिंह, अशोक मिश्र, आनंद श्रीवास्तव, विनय सिंह, रितेश द्विवेदी, मनीष मौर्य, मनोज मिश्र, पंकज सिन्हा, आदर्श कश्यप, रंजना एवं मनोज त्रिपाठी, रमेश एवं श्वेता दुबे, मोहित, शुभम एवं अंकिता, जानू मिश्र, केके मिश्रा, दिलीप शुक्ला, माधुरी यादव, घनश्याम सैनी, समय दीन, अर्जुन, राम प्रताप पांडेय आदि शामिल रहे। जागरण में आचार्य की भूमिका मनोज त्रिपाठी ने निभाई। कीर्तन मंडली के सदस्यों में अन्नू सुमन, चंद्र प्रकाश त्रिपाठी, विजय तिवारी, राजू तिवारी, शिव पूजन आदि शामिल रहे। बताते चलें कि करीब ढाई दशक से श्रवण श्रीवास्तव की अगुवाई में यह जत्था प्रति वर्ष (2020 में कोरोना काल को छोड़कर) साल में एक बार नौ देवियों का दर्शन करता है।

कटड़ा में भूमिका मंदिर पर गोंडा के भक्तों ने किया जागरण
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