नई दिल्ली (हि.स.)। दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऑनलाइन गेमिंग की लत से बच्चों को बचाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग करनेवाली याचिका पर प्रतिवेदन की तरह विचार करने का निर्देश दिया। चीफ जस्टिस डीएन पटेल की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस याचिका पर कानून के मुताबिक फैसला करने का निर्देश दिया।
यह याचिका एनजीओ डिस्ट्रेस मैनेजमेंट कलेक्टिव ने दायर की थी। वकील रॉबिन राजू और दीपा जोसेफ ने कहा कि ऑनलाइन गेमिंग से बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। ये गेम इतने खतरनाक हैं कि बच्चे खुदकुशी तक के लिए प्रेरित हो रहे हैं और अपराध की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इसे काफी गंभीरता से लेने की जरूरत है। इसे रोकने के लिए सरकार के पास कोई नीति नहीं है। उन्होंने ऑनलाइन गेमिंग को रेगुलेट करने के लिए एक निकाय बनाने की मांग की।
याचिका में कहा गया था कि ऑनलाइन गेमिंग साइबर अपराधों का भी एक जरिया है। इसके जरिये यौन प्रताड़ना और वित्तीय फर्जीवाड़ों को भी अंजाम दिया जा रहा है। याचिका में मद्रास हाई कोर्ट के हालिया आदेश का जिक्र किया गया था जिसमें ऑनलाइन गेम्स को लेकर चिंता जताई गई थी। याचिका में कहा गया था कि चीन में सबसे ज्यादा गेम डेवलप किए जाते हैं, इसके बावजूद उसने इसे रेगुलेट करने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं।
याचिका में कहा गया है कि कई गेम हिंसक होते हैं जो बच्चों के मनोविज्ञान पर बुरा असर डालते हैं। बच्चों के माता-पिता का भी उन पर नियंत्रण नहीं रह जाता है क्योंकि ऑनलाइन क्लासेज के लिए वे फोन या दूसरे गैजेट्स बच्चों को देते हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि उसने ऑनलाइन गेम को रेगुलेट करने के लिए पिछले 10 जुलाई को प्रतिवेदन दिया था। तब कोर्ट ने कहा कि आपने प्रतिवेदन देने के बाद एक महीने का भी इंतजार नहीं किया और कोर्ट चले आए। उसके बाद कोर्ट ने इस याचिका पर कानून के मुताबिक फैसला करने का निर्देश दिया।
