ज्ञान सिंह
दो दिन पहले गुरु पूर्णिमा थी और हम बड़े असमंजस में रहे कि हम कौन से गुरु को प्रणाम करें। बहुत कोशिश करने पर भी हमारे ज़ेहन में कोई चेहरा नहीं उभरा जिसको हम कृतार्थ भाव से याद कर सकें। इस दौरान सभी अख़बार और सोशल मीडिया तरह-तरह से गुरु वंदना में लीन दिखाई दिये। हमें लगा कि अकेले हम ही अभागे इस दुनिया में बचे हुए हैं, जिसे कोई प्रापर गुरू अभी तक नसीब नहीं हुआ है। अब तो हम जीवन के उत्तरार्ध में पहुँच चुके हैं और अब किसी ठीक-ठाक गुरु के मिलने की संभावना लगभग क्षीण हो गई है। लग रहा है कि ’बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ‘ का भजन करते रहने के सिवाय अब हमारे पास कोई चारा नहीं बचा है। एकलव्य की तरह हम किसी को बिना परमीशन गुरु बना कर उसकी आराधना नहीं कर सकते हैं और अपना अँगूठा कटा लेने का रिस्क नहीं उठा सकते हैं।
गाँव का प्राइमरी स्कूल वह पहला स्थल था, जहाँ औरों की तरह हमें भी गुरुओं का सामना हुआ। वह हमें गुरु कम साक्षात शनिदेव या यूँ कहें पुराने जमाने के जेलर ज़्यादा नजर आते थे। पता नहीं यहाँ पाये जाने वाले गुरुजन लगातार क्रोध में क्यों बने रहते थे? क्या मजाल कि कोई उनके मुखमंडल पर कभी हास की रेखा या किंचित दया का भाव देख पाया हों। स्कूल पहुँचने पर उनका प्रथम कार्य किसी लड़के को भेजकर सदाबहार का डंडा मँगाना होता था जिसे शस्त्र की भाँति धारण कर वह कुर्सी पर विराजमान हो जाते थे। तदुपरांत उनकी दृष्टि यह खोजने में लीन हो जाती थी कि किस लड़के पर वह इस शस्त्र का प्रथम प्रयोग करें ताकि बाक़ी बच्चे पर्याप्त मात्रा में भयाक्रान्त बने रहें। उस जमाने के इन गुरुओं का यह स्थिर मत होता था कि समुचित पिटाई से ही छात्रों को सीधी लाइन पर लाया जा सकता था तथा शिक्षित एवं विद्वान बनाया जा सकता था। यह बात अलग है कि लौह भट्टी में लोहे की तरह पीटे गये अधिकांश ऐसे छात्र कालांतर में इन्टरमीडिएट को पार नहीं कर पाते थे और नेतागीरी और अन्य छुटपुट धंधों और चोरी चपाटी में निष्णात होकर सम्मानजनक ज़िन्दगी बिताने के काबिल बन जाते थे। कदाचित यह गुरु कृपा से ही संभव होता होगा।
स्कूलों में इन गुरुओं का एक पसंदीदा शग़ल बच्चों को मुर्ग़ा बनाना होता था। मुर्ग़ा बने हुए छात्र को यद्दपि शारीरिक कष्ट तो कम होता था पर सार्वजनिक अपमान बोध के कारण वह हीन भावना से ग्रस्त होकर पठन पाठन क्रिया से कोसों दूर चला जाता था। यद्यपि मुर्ग़ा बनने की वजह से इनका समुचित शारीरिक व्यायाम हो जाता था। आज तमामों के अच्छे और मज़बूत स्वास्थ्य का कारण ही उस समय उनके मुर्ग़ा बने रहने के दीर्घकालिक अभ्यास को माना जा सकता है। मुर्ग़ा बनाना दंड का एक प्रकार होता था जो केवल स्कूलों में ही प्रचलित था। अवश्य ही दंड का यह तरीक़ा किसी उद्भट गुरु के मस्तिष्क की खोज रही होगी जिसका कॉपीराइट केवल स्कूलों को उपलब्ध कराया गया होगा। अंग्रेज इस अद्भुत दंड विधान से अनभिज्ञ रहे होंगे अन्यथा वह भारतीय दंड संहिता में इसको अवश्य शामिल कर लेते। कमोबेश ऊपर बताई गई प्रणाली सभी प्राइमरी स्कूलों में तत्समय लागू थी। चूँकि हम शुरू से ही पढ़ने में ठीकठाक थे, अतः इन गुरु प्रकोपों का हमें न्यूनतम सामना करना पड़ा था। पढ़ने में हमसे अच्छा केवल एक छात्र छेदीलाल था जिसको पछाड़ने का हम भरसक प्रयास करते रहते थे। किन्तु आगे की पढ़ाई वह कदाचित पारिवारिक कारणों से नहीं कर पाया और इसी कारण हम स्वयमेव उससे आगे निकल गए।
कुछ ऐसा ही मिलता जुलता अनुभव हमें कालेज और यूनिवर्सिटी के दिनों का भी रहा, जहाँ भी कोई गुरु हमारे हृदय को ठीक से स्पर्श नहीं कर पाया। हमें तो यही आभास होता रहा कि जो कुछ भी पढ़ाई करनी है वह अपने भरोसे करनी है। गुरुजनों का काम तो गड़रिये की तरह छात्रों को एक दिशा में हाँकने भर का है। इन्टर कॉलेज में हमारे एक शिक्षक छैल बिहारी श्रीवास्तव हुआ करते थे। वह बेहद सख्त मिज़ाज और अनुशासन प्रिय थे। हमें स्मरण है कि कालेज में किसी परीक्षा के दौरान वह कक्ष निरीक्षक थे। हमारे पीछे बैठे किसी छात्र ने हमसे किसी सवाल का जवाब जानना चाहा और हमने पीछे मुड़कर उसे जवाब देने से जैसे ही मना किया कि छैल बिहारी जी की नजर हम पर पड़ गई और उन्होंने हमें ही नकल के प्रयास का दोषी मानकर एक ज़ोरदार चाँटा रसीद कर दिया। उनके इस कृत्य ने गुरुओं के प्रति हमारे मन में बची खुची श्रद्धा का अंतिम संस्कार कर दिया। बाद में छैल बिहारी जी की सख्त आदतों से आजिज़ कुछ उदंड छात्रों ने एक दिन शाम के धुधलके में पीछे से बोरा उढ़ा कर उनकी ज़ोरदार पिटाई भी की थी जिसका मुझे हृदय से अफ़सोस रहा। मैं समझता हूँ कि वह सख्त जरूर थे पर किसी को नुक़सान पहुँचाना उनका कभी उद्देश्य नहीं रहा होगा। विश्वविद्यालय में तो गुरु शिष्य का रिश्ता ट्रेन में सवार ऐसे हमसफ़र माफ़िक़ रहा जो यात्रा के दौरान एक-दूसरे को पहचान तो गये पर गंतव्य पर पहुँचने के बाद किसी का किसी से लेना देना नहीं रहा। इस दौरान वह अपने मन की बात करते रहे और हम अपने मन की करते रहे। सब मिलाकर एक अदद गुरु की तलाश में हम पूरी तरह से फेल हो गए हैं। जब हमारे कुछ प्रिय मित्रों को हमारी इस मनोदशा का ज्ञान हुआ तो उन्होंने हमें यह नेक सलाह दी कि उम्र के इस पायदान में अब हम गुरु की तलाश बन्द कर दें और खुद गुरु बन जाये। उन लोगों द्वारा बताया गया कि अब गुरुओं का जमाना लद गया है और गुरु घंटालों का जमाना आ गया है। अब तो माहौल ‘गुरु गुड़ै रहे चेला चीनी हो गये‘ वाला हो गया है। हमें अपने मित्रों की बात जँच गई और हमने अब गुरु ढूँढने का अभियान ख़त्म कर दिया है और खुद गुरु बन जाने का मन बना लिया है। जैसा देश वैसा भेष। देखना है कि हम एक कामयाब गुरु बन पाते हैं या नहीं।
(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं।)
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