-छोटे राज्य बनाकर योगी को सीमित करने का प्रयास
लखनऊ। उप्र का एक और बंटवारा जल्द हो सकता है। इसके लिए तानाबाना बुना जा रहा है। इस ताने-बाने के पीछे असली वजह भाजपा की आंतरिक राजनीति है। भाजपा सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा योगी आदित्यनाथ को पूर्वांचल तक सीमित रखने के लिए नए राज्य पूर्वांचल के गठन की कवायद शुरु कर दी है।
दरअसल, योगी आदित्यनाथ मोदी और शाह के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। पूर्वांचल एवं नाथ समुदाय के प्रभावी नेता होने के कारण भाजपा और संघ उनको नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए रणनीति बनाई गई है कि 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उप्र का एक और बंटवारा करके पूर्वांचल राज्य का गठन किया जाए और योगी को वहां का मुख्यमंत्री बना दिया जाए।
बनारस हो सकती है राजधानी
सूत्र बताते हैं कि पूर्वांचल राज्य के गठन का खाका तैयार करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने करीबी पूर्व नौकरशाह एके शर्मा को जिम्मेदारी सौंपी है। शर्मा को उत्तर प्रदेश भेजने और उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाने को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। शर्मा कुछ समय से प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सक्रिय हैं। सूत्र बताते हैं की बनारस को पूर्वांचल की राजधानी बनाया जा सकता है। इसलिए शर्मा वहां डेरा डालकर पूर्वांचल राज्य का खाका तैयार कर रहे हैं।
नए राज्य के जिलों को लेकर असमजंस
नए राज्य में कितने जिले होंगे इसकी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हो पाई है। सूत्र बताते हैं की योगी सरकार ने पूर्वांचल विकास के लिए 28 जिलों का चयन किया था। लेकिन केंद्र द्वारा तैयार किए जा रहे प्रस्ताव में पूर्वांचल के गोरखपुर समेत 23 से 25 जिले शामिल हो सकते हैं। इसमें लगभग 125 विधानसभा सीटें भी होंगी। कहा जा रहा है कि इन पहलुओं को लेकर योगी सहमत नहीं है। माना जाता है कि यूपी की सत्ता का रास्ता पूर्वांचल से ही होकर जाता है। जिसके पास पूर्वांचल में अधिक सीटें आईं, वही उ.प्र. की सत्ता पर काबिज होता है। बीते 27 साल में हुए चुनावों को देखें तो पूर्वांचल का मतदाता कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा। 2017 में 27 साल बाद भाजपा को प्रचंड बहुमत तो मिला, लेकिन 10 जिलों में भाजपा फिर भी कमजोर है।
1991 में भाजपा ने जीती थीं 82 सीटें
राममंदिर लहर के बीच 1991 में जब भाजपा पहली बार यूपी की सत्ता पर काबिज हुई तो 221 सीट लेकर आई थी। चूंकि उस समय परिसीमन नहीं हुआ था। पूर्वांचल के 28 जिलों में कुल 152 में से 82 सीट पर भगवा लहराया था। जबकि यह सर्वविदित है कि उसके बाद साल दर साल भाजपा का प्रदर्शन कमजोर होता गया। 1991 के बाद 2017 में भाजपा को पूर्वांचल की 28 जिलों की 164 विधानसभा सीट में से 115 सीट मिली थीं, जो कि भाजपा का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।
10 जिलों में भाजपा कमजोर
पूर्वाचंल के 28 जिलों में शामिल 10 जिलों में भाजपा अभी भी कमजोर है। यहॉ समाजवादी पार्टी का दबदबा बना हुआ है। कुछ जिले ऐसे हैं जहां 2017 में भाजपा ने बढ़त बनाई है, लेकिन 2022 चुनावों में यह बढ़त बनी रहेगी, इस बात पर आशंका है। इन दस जिलों में शामिल 3 जिलों में परिसीमन के बाद सीटों की गिनती में फेरबदल संभव है।
नए राज्य का मामला पकड़ेगा जोर
अगल पूर्वांचल राज्य बनाने की जो कवायद चल रही है। उसे अमली जामा पहनाया जाता है, तो बुंदेलखंड और हरित प्रदेश की मांग तेज हो जाएगी। क्योंकि लंबे समय से इनकी मांग मध्यप्रदेश एवं पश्चिमी उ.प्र. में चल रही है।
उत्तर प्रदेश का एक और बंटवारा ?
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