राज खन्ना
25 जून 1975 की शाम चन्द्रशेखर ने रीगल सिनेमा में बीपी कोइराला और शैलजा आचार्य के साथ “शोले“ फ़िल्म देखी। वापसी में दयानन्द सहाय ने दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई विपक्षी दलों की मीटिंग का उन्हें हाल बताया। कहा आज जेपी ने अपने भाषण में कमाल कर दिया। चन्द्रशेखर ने कहा, “यह आखिरी भाषण है।“ बाद में चंद्रशेखर ने लिखा, “फिर उस रात के आखिरी पहर साढ़े तीन बजे फोन आया। जेपी को गिरफ़्तार करने पुलिस गांधी प्रतिष्ठान पहुंच गई है। टैक्सी से हम वहां पहुंचे। जेपी ने कहा कि पुलिस आ गई है। वे गाड़ी में बैठे तो पीछे हम टैक्सी से चले। पार्लियामेंट थाने में पुलिस जेपी को अन्दर ले गई। एक दरोगा ने मुझे रोक दिया। पंद्रह मिनट बाद एक डीएसपी आया। उसने कहा सर आप बाहर कैसे खड़े हैं? दरोगा के रोकने की बात कही। वह अंदर ले गया। थोड़ी देर बैठने के बाद एसपी (इंटेलिजेंस) आये। स्थानीय एसपी के कान में कुछ कहा। बात करने को मुझे बाहर ले गए। कहा जेपी के लिए गाड़ी आ गई है। मेरी हिम्मत नहीं है। आप कहिए। आपको तो दूसरी जगह जाना है। मैं समझ नहीं पाया। उन्होंने जब दोबारा मेरे जाने की बात की, तो पूछा कि क्या मुझ पर भी वारंट है? उन्होंने कहा, हाँ। पुलिस आपके घर गई है।“ “जेपी से मैंने कहा आप तो जाइये। आपकी गाड़ी आ गई है। मुझे दूसरी जगह जाना है। उन्होंने पूछा आप लोग भी गिरफ्तार हैं। थाने से बाहर निकलते जेपी ने कहा, “विनाशकाले-विपरीत बुद्धि।“ थाने में पीलू मोदी, राज नारायण, बीजू पटनायक, अशोक मेहता, सिकन्दर बख़्त, राम धन, के आर मलकानी भी पहुंच चुके थे।“ अटलजी-आडवाणी जी बंगलौर में एक संसदीय समिति की बैठक में हिस्सा लेने गए हुए थे। उन दोनों को वहीं गिरफ्तार किया गया। जयपुर की महारानी गायत्री देवी और ग्वालियर की राजमाता सिंधिया को भी जेल भेजा गया। बांग्लादेश युद्ध की कामयाबी ने इंदिराजी को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 352 सीटें हासिल हुई थीं। विपक्ष हताश था। उसी बीच 1973 में गुजरात में छात्रों का आंदोलन शुरु हुआ। फौरी कारण हॉस्टल में भोजन की दरों में बढोत्तरी था। फिर यह आंदोलन फैलता गया। लोग बढ़ते गए और नई मांगें भी जुड़ती गईं। मोरारजी देसाई गुजरात के मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल की बर्खास्तगी और विधानसभा भंग करने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गए। जबरदस्त जनदबाव के बीच केंद्र को विधानसभा भंग करनी पड़ी। बिहार का छात्र आंदोलन वहां की गफूर सरकार के खिलाफ़ था। आजादी के बाद से राजनीति से दूर रहने वाले जयप्रकाश नारायण की शख्सियत बहुत बड़ी थी। आंदोलन से उनके जुड़ाव का देशव्यापी प्रभाव पड़ा। जिधर वह निकले छात्र-युवा, “अंधकार में एक प्रकाश-जयप्रकाश-जयप्रकाश“ के नारों के साथ उमड़ पड़े। पटना में बेकाबू पुलिस ने उन पर भी लाठियां चला दीं। नानाजी देशमुख और अंगरक्षक ने खुद पर प्रहार झेलकर जेपी की रक्षा की। इस हमले ने आंदोलन का अनेक राज्यों में विस्तार किया। उधर 12 जून 1975 की तारीख़ ने देश की दिशा ही बदल दी। इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिराजी का रायबरेली से लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचन चुनावी कदाचार के आरोप में रद्द कर दिया। 12 जून को ही गुजरात विधानसभा के चुनाव नतीजे आये।जनता मोर्चे की बढ़त ने कांग्रेस पर दोहरा दबाव बनाया। निर्वाचन रद्द होने के बाद इंदिराजी के इस्तीफ़े की मांग तेज हुई। उनके छोटे पुत्र संजय गांधी उस समय तक उनकी मदद में सक्रिय हो चुके थे। दिल्ली तथा पास-पड़ोस के राज्यों से जुटने वाली और जुटाई जा रही भीड़ इंदिराजी के समर्थन में आगे आ रही थी। हाईकोर्ट ने उन्हें अपील के लिए 20 दिन का समय दिया था। बीच के 12 दिन भारी संशय और तनाव भरे थे। पर 24 जून को सुप्रीमकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ के जस्टिस कृष्णा अय्यर ने उन्हें राहत दी। जस्टिस अय्यर ने लोकसभा में मतदान के उनके अधिकार पर पाबन्दी लगाई लेकिन प्रधानमन्त्री के पद पर बने रहने की इजाजत दे दी। विपक्ष फिर भी आक्रामक था। 25 जून को दिल्ली की सभा ऐतिहासिक थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण और अन्य प्रमुख विपक्षी नेताओं ने जनता से संघर्ष तेज करने की अपील की। कहा कि सरकार कानूनी और नैतिक दोनो ही नज़रियों से सत्ता में रहने का हक़ खो चुकी है। सुरक्षा और सैन्य बलों से सरकार के आदेश न मानने की अपील की गई।
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सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत के बाद इंदिराजी ने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए कमर कस ली। 15 अगस्त 1947 की आधी रात देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश की आजादी की घोषणा की थी। आजादी के जश्न में उस रात देश नहीं सोया था। सूरज जल्दी झांका था। तब अगली सुबह उम्मीद और उल्लास के नए उजाले के साथ आयी थी। 28 वर्ष के अंतराल पर 25 जून 1975 की आधी रात उस आजादी की आत्मा ’लोकतंत्र’ के अपहरण का फैसला लिया गया। विडंबना यह कि यह फैसला लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले पंडित नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी का था। इस रात देश भर के तमाम घरों के दरवाजों पर पुलिस की दस्तक थी। अगली सुबह पर आतंक-दमन का पहरा था। बदनसीबी से इस सिलसिले को लम्बे समय तक जारी रहना था। इंदिराजी के मित्र बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक इमरजेंसी की योजना लेकर आगे आये। योजना पर मन्त्रिमण्डल की सहमति की औपचारिकता अगली सुबह निभाई गई। राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद बिना नानुकुर के रात में ही इस पर दस्तख़त कर चुके थे। वह रात विरोधियों पर कहर बन कर टूटी। देशव्यापी गिरफ्तारियां हुईं। वह हर आवाज जो सरकार के विरोध में उठती थी या उठ सकती थी, उसका अगला ठिकाना जेल था। अखबारों की बिजली काटी गई। सेंसरशिप लागू की गई। नागरिक अधिकार छीन लिए गए। लाखों विपक्षी जेल में थे। बाकी देश खुली जेल था। लोकतंत्र के सूरज पर तानाशाही का ग्रहण लग चुका था। अगले इक्कीस महीने सत्तादल की मनमानी और पुलिस-प्रशासन की जुल्म ज्यादतियों की तकलीफ़देह दास्तानों से भरपूर थे। नियम-कानून दरकिनार थे। नौकरशाही-पुलिस का राज था। परिवार नियोजन का बेहद जरूरी कार्यक्रम जबरिया नसबंदी और लक्ष्य पूरे करने की होड़ में लोगों की प्रबल नाराजगी का कारण बन गया। वर्ष 1973-74 में जहाँ देश में महज 9.4 लाख नसबंदी हुई। वहीं इमरजेंसी के दौरान 1976-77 में इसकी संख्या 82.6 लाख थी। सौंदर्यीकरण अभियान के तहत तुर्कमान गेट पर चले बुलडोजरों और इस दौरान हुई व्यापक हिंसा ने सरकार की बहुत बदनामी कराई। संजय गांधी और उनकी मंडली की संविधानेतर सत्ता ने कांग्रेस के तमाम दिग्गजों को घुटनों के बल कर दिया। उनके प्रति वफ़ादारी साबित करने की होड़ थी और उसी में ही खैरियत भी थी। इसके लिए कुछ भी कहने और कर गुजरने से परहेज नहीं था। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देव कांत बरुआ ’इंदिरा इज़ इंडिया’ के नारे लगा रहे थे। जेल में बीमार जेपी के लिए बंसीलाल कह रहे थे, ’उन्हें मरने दो।’ गृह मंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी किनारे थे। संजय मंडली के सदस्य उनके राज्य मंत्री ओम मेहता की तूती बोलती थी। संजय गांधी की कसौटी पर फिसड्डी साबित होने के चलते इंद्र कुमार गुजराल को अपमानित करके सूचना प्रसारण मंत्री पद से हटाया गया। उनकी जगह लेने वाले विद्या चरण शुक्ल ने प्रेस को दुरुस्त करने-रखने के लिए सारी मर्यादाएं लांघ दीं। भय के उस दौर को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद और ’द इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ के संपादक सरदार खुशवंत सिंह के मध्य हुए एक वार्तालाप के जरिये समझा जा सकता है। खुशवंत सिंह इमरजेंसी के प्रबल समर्थक थे और उन दिनो इंदिराजी-संजय गांधी के बहुत खास माने जाते थे। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा, ’इमरजेंसी ने सत्ताधारी लोगों में कितना अहंकार पैदा कर दिया था, इसका उदाहरण मेरे दिल्ली से लौटने के कुछ दिन बाद सामने आया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सम्मान में गवर्नर अली यावर जंग ने राजभवन में दोपहर भोज का आयोजन किया था। राष्ट्रपति ने इमरजेंसी के बारे में कोई आलोचनापरक लेख पढ़ा था। उन्होंने यह मानकर कि वह ’द इलेस्ट्रेटेड वीकली’ में छपा है, मुझसे दिल्लगी के लहजे में पूछा, ’क्या इरादा है तुम्हारा? क्या तुम्हें इमरजेंसी के बारे में नहीं बताया गया? मैंने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर वे क्या कह रहे हैं? महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एसबी चव्हाण जो राष्ट्रपति के बगल बैठे थे, उनकी भी यही स्थिति थी। फिर भी, बिना तथ्यों की जांच के उन्होंने द इलेस्ट्रेटेड वीकली के विरुद्ध कार्रवाई का आदेश दे दिया। मैं जब दफ्तर लौटा तो मुझे एक आदेश पकड़ा दिया गया, जिसके अनुसार प्रकाशन से काफी पहले हर चित्र और लेख को सेंसर को भेजना जरूरी था। मैंने श्रीमती इंदिरा गांधी को फोन मिलाया। उनके प्रेस सलाहकार शारदा प्रसाद से बात हुई। श्रीमती गांधी उस उसी शाम मास्को जाने वाली थीं। शारदा प्रसाद ने वह नाराज करने वाला लेख ढूँढ़ लिया था। वह ’फेमिना’ में छपा था। राष्ट्रपति ने स्वीकार किया कि उन्होंने विवेकहीनता का परिचय दिया था।’
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विपक्षियों को जेल में डालने के बाद अदालतों को हदों में बांधने का अभियान शुरु हुआ। 22 जुलाई 1975 को संविधान का 38वां संशोधन लाया गया। उसके जरिये इमरजेंसी की घोषणा को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया। राष्ट्रपति/राज्यपाल/केंद्र शासित प्रमुखों द्वारा जारी अध्यादेशों को अविवादित मानते हुए उन्हें न्यायिक पुनर्विचार से पृथक माना गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपील के फैसले का इंतजार नही किया गया। 10 अगस्त 1975 को पेश 39वें संशोधन ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा लोकसभा स्पीकर के निर्वाचन से सम्बन्धित विवादों को न्यायिक परीक्षण से मुक्त कर दिया। 28 अगस्त 1976 को प्रस्तुत 42वें संशोधन का दायरा व्यापक था। संविधान की प्रस्तावना में “समाजवादी“, “धर्मनिरपेक्ष“, “एकता“ ,“अखण्डता“ शब्द जोड़े गए। मूल अधिकारों पर संविधान के नीति निर्देशक सिद्धान्तों की सर्वोच्चता सुनिश्चित की गई। 10 मौलिक कर्तव्यों को अनुच्छेद 51(क)(भाग पअ क) में जोड़ा गया। इसके द्वारा संविधान को न्यायिक परीक्षण से मुक्त किया गया। सभी लोकसभा-विधानसभा की सीटों को शताब्दी के अंत तक के लिए स्थिर किया गया। किसी केंद्रीय कानून के परीक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय और राज्य के कानून के लिए अधिकार हाई कोर्ट को दिया गया। पर इसका उपबन्ध अदालतों के लिए किसी कानून को रद्द करना मुश्किल करता था। वह उपबंध था “ किसी भी संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर पांच से अधिक न्यायधीशों की बेंच द्वारा दो तिहाई बहुमत से निर्णय लिया जाएगा। यदि बेंच के न्यायाधीशों की संख्या पांच ही हो तो सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाएगा।“ 1971 में चुनी लोकसभा का कार्यकाल 1976 में पूर्ण हो रहा था। उस समय तक इंदिराजी चुनाव को लेकर मन नही बना पायीं थीं। इस संशोधन ने लोकसभा के कार्यकाल को भी पांच वर्ष से बढ़कर छः वर्ष कर दिया गया। सत्ता की मनमानी और उसे मजबूत करने की कोशिशों ने संविधान को माखौल में बदल दिया। किसी बुक सेंटर पर भारतीय संविधान की प्रति मांगने पर अजूबे के तौर पर देखा जाता था। एक आहत दुकानदार का जबाब था,“ अब यह छपना बन्द हो चुका है।“ विपक्ष जेल में था। अदालतें डरी हुई थीं। प्रेस पाबंदियों में जकड़ा हुआ था। अनेक जजों और अखबारों ने सत्ता से तालमेल बिठाना सीख लिया था। जो ढर्रे पर नही आये, उन्हें पुलिस तथा अन्य सरकारी एजेंसियों का उत्पीड़न झेलना पड़ा। लेकिन जोर-जबरदस्ती की भी एक सीमा थी। दहशत के बीच इमरजेंसी की शुरुआती कामयाबी कुछ महीने बीतने तक लापता हो चुकी थी। हर तरफ से सरकारी मशीनरी के जुल्म और लूट की शिकायतें थीं। नैतिक बल खो देने के कारण सरकार अपनी चमक खो चुकी थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंदिराजी की छवि और विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा था। खुशामदी उन्हें जीत के प्रति आश्वस्त कर रहे थे। खुफिया एजेंसियों के लोगों को नौकरी बचानी थी। उन्होंने भी आसमानी अनुमान पेश किए। संविधान अपने अनुकूल ढाला जा चुका था। जीत तय मानी गयी। 18 जनवरी 1977 को लोकसभा चुनाव के फैसले की घोषणा कर दी गई। तारीख़ें 20-24 मार्च 1977 की थीं। विपक्षियों की रिहाई शुरु की गई। हिसाब लगाया गया था कि उन्नीस महीने जेल में बिता कर निकले नेताओं को सम्भलने का मौका ही नही मिलेगा। पर इमरजेंसी की ज्यादतियों से नाराज जनता के लिए पार्टी-उम्मीदवार बेमानी थे। जयप्रकाशजी की कोशिशों से बिखरे विपक्षियों ने चरण सिंह के भारतीय लोकदल का चुनाव निशान हलधर लिया। जनता पार्टी का नाम दिया। जनता ने सिर्फ कांग्रेस को सत्ता से बेदख़ल नही किया। रायबरेली जहां से पिछली बार इंदिराजी जीतकर अदालत से हारी थीं, को इस बार जनता ने हराया। बाजू की अमेठी लोकसभा सीट पर संजय गांधी पराजित हुए। पूरे उत्तर भारत से कांग्रेस साफ थी। जनता पार्टी की लोकसभा सीटें 298 थीं। अपनी आत्मकथा में लाल कृष्ण आडवाणी ने उस चुनाव के परिणामों के विषय में लिखा, ’सरकारी मीडिया ने कांग्रेस की पराजय की खबर को दबाने की कोशिश की, विशेषकर प्रधानमंत्री और उनके पुत्र की। इससे कई तरह के कयास और अफवाहें उड़ीं। बाद में मुझे उस दिन क्या हुआ, इसके संबंध में जानकारी पी.टी.आई. संवाददाता के.पी.कृष्णनउन्नी के संस्मरण से मिली। एक बार जब वोटों की गिनती ने यह दिखाना शुरू किया कि जनता पार्टी बड़ी विजय की ओर बढ़ रही है तब कृष्णनउन्नी ने एक खबर टाइप की जिसका शीर्षक था, कांग्रेस के तीस वर्षीय शासन का अंत; जल्द ही एक गैर-कांग्रेसी मंत्रिमंडल कार्यभार संभालेगा..।’ कृष्णन को हैरानी हुई कि उनके संपादक ने इस खबर को रोकने को कहा। कृष्णन के अनुसार संपादक ने उन्हें बताया कि इंदिराजी तीनों सेना प्रमुखों से मिलकर यह जानने का प्रयास करेंगी कि यदि वह चुनाव परिणामों के विरुद्ध जाकर सत्ता में बनी रहती हैं तो क्या वे उनका समर्थन करेंगे? एक बार यह पता चल जाने के बाद कि सेना प्रमुखों ने श्रीमती गांधी के सत्ता में बने रहने के प्रयास को ठुकरा दिया है, संपादक ने यह खबर जारी की।’ इमरजेंसी आधिकारिक रूप से 23 मार्च 1977 को समाप्त हो गई।
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24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई की अगुवाई में जनता पार्टी की सरकार बनी। इमरजेंसी की ज्यादतियों के खिलाफ़ एकजुट हुए इस पार्टी के घटक जल्दी ही आपस में उलझने लगे। 15 जुलाई 1979 को मोरारजी सरकार का इस्तीफ़ा हो गया। इस सरकार की नाकामियों और उस वक्त या बाद में उसके किरदारों की भूमिका एक अलग विषय है। पर लोकतन्त्र और भारतीय संविधान में आस्था रखने वाले इस सरकार के एक बड़े योगदान को जरुर याद रखना चाहेंगे। साथ में मशहूर वकील शांति भूषण को जरूर याद कर सकते हैं। यह शांति भूषण थे, जिन्होंने राजनारायण के वकील के तौर पर हाईकोर्ट में जबरदस्त पैरवी करके इंदिराजी का चुनाव रद्द कराया था। उन्हीं शांति भूषण ने जनता पार्टी की सरकार के कानून मंत्री के तौर पर, इमरजेंसी में नखविहीन कर दी गईं अदालतों की गरिमा वापस कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इंदिराजी की सरकार ने संविधान के 42वें संशोधन के जरिये उच्चतम और उच्च न्यायालय के अधिकारों में कटौती की थी। जनता पार्टी सरकार ने 43 वें संशोधन के जरिये सम्बन्धित अनुच्छेद 32क,131क,144क,226क और 228क को हटाकर पुरानी स्थिति बहाल कर दी। इस संशोधन ने अनुच्छेद 31घ को भी निरस्त कर दिया, जो राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए केंद्र को विशेष शक्ति देता था। इसी सरकार ने 44वां संशोधन पारित और लागू किया। इसके अन्तर्गत राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने के लिए “आन्तरिक अशांति“ के स्थान पर “सैन्य विद्रोह“ का आधार शामिल करके किसी सरकार के लिए आपातस्थिति लागू करना बेहद मुश्किल कर दिया गया। सम्पत्ति के अधिकार को मूल के स्थान पर कानूनी अधिकार के दायरे में लाया गया। राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री के निर्वाचन के विवाद निर्णीत करने की उच्चतम न्यायालय की शक्तियां उसे वापस दी गईं और लोकसभा-विधानसभाओं का कार्यकाल छः की जगह फिर से पांच वर्ष किया गया। ’इमरजेंसी’ अब इतिहास का हिस्सा है। लेकिन उसका जिक्र बार-बार होता है। ’अघोषित इमरजेंसी’ और ’इमरजेंसी जैसे हालात’ बताते हुए सरकार पर विपक्ष के प्रहार होते रहते हैं। क्या इमरजेंसी फिर आ सकती है? यह सवाल 2015 में इमरजेंसी की चालीसवीं बरसी पर लाल कृष्ण आडवाणी से पूछा गया था। तब तक भाजपा में हाशिये पर पहुंच चुके आडवाणी जी का उत्तर था, ‘मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ भी किया गया है, जिससे मुझे यह आश्वासन मिले कि नागरिक स्वतन्त्रताओं पर फिर से रोक नहीं लगाई जाएगी या उन्हें नष्ट नहीं किया जाएगा। बिल्कुल भी नहीं।’

(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता व सम-सामयिक विषयों पर टिप्पणीकार हैं।)
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