Wednesday, March 4, 2026
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आज रात से थम जायेगी शहनाई की धुन, 22 अप्रैल से शुरू होंगे वैवाहिक कार्यक्रम

-15 दिसम्बर से खरमास, तीर्थ स्थल की यात्रा करने के लिए उत्तम मास

वाराणसी (हि.स.)। वर्ष 2020 के अन्तिम माह में शुक्रवार की देर रात से शहनाई की धुन नहीं गूंजेगी। वर्ष के अन्तिम लग्न मुहूर्त को देख शहर में वैवाहिक कार्यकमों की धूम मची रही। शहर के हर लान, वैवाहिक कार्यक्रम स्थलों पर समारोह की तैयारियों के साथ बारात के स्वागत में भी लोग जुट रहे। 
शनिवार से अगले चार महीनों तक लग्न मुहूर्त नहीं है। 15 दिसम्बर से खरमास भी शुरू हो जायेगा। ऐसे में लोगों को मांगलिक कार्यो और शादी ब्याह के लगन के लिए 21 अप्रैल 2021 तक इंतजार करना होगा। ज्योतिष विद मनोज उपाध्याय के अनुसार 2021 में अप्रैल माह के 22 अप्रैल से शादी विवाह का मुर्हूत मिल रहा है। अप्रैल में  22, 24, 25, 26, 27, 30 को शुभ मुहूर्त है। इसी तरह मई माह में एक मई, तीन मई, सात मई, आठ मई, 15 मई, 21 मई, 22 और 24 मई को लग्न है। जून माह में चार मुहूर्त है। इसमें चार जून,पांच जून,19 और 30 जून को है। जुलाई माह में भी तीन मुहूर्त एक जुलाई, दो और 15 जुलाई को शुभ मुहूर्त है। इसके बाद नवम्बर माह में 06 और दिसम्बर माह 2021 में 06 मुहूर्त है। वर्ष 2020 में कोरोना काल के चलते वैवाहिक समारोह लोग टालते रहे। हरि प्रबोधिनी एकादशी से सात दिन ही लोगों को वैवाहिक कार्य के लिए मुहूर्त मिल पाया था। 
क्या है खरमास ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य देव धनु राशि में प्रवेश करते हैं तो खरमास लग जाता है। इस काल कोे संतों ने खरमास या मलमास इसलिए नाम दिया था कि ताकि सांसारिक कामों से मुक्त होकर पूरे महीने लोग आध्यात्मिक लाभ के लिए कर्म करें। पौष खरमास का मास है। जिसमें किसी भी तरह के मांगलिक कार्य, विवाह, जनेउ या फिर अन्य संस्कार नहीं किए जाते हैं। तीर्थ स्थल की यात्रा करने के लिए खरमास सबसे उत्तम मास माना गया है। मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख है कि भगवान सूर्य अपने सात घोड़ों (रश्मियों) के सहारे इस सृष्टि की यात्रा करते हैं। परिक्रमा के दौरान सूर्य को एक क्षण भी रुकने और धीमा होने का अधिकार नहीं है। लेकिन अनवरत यात्रा के कारण सूर्य के सातों घोड़े हेमंत ऋतु में थककर एक तालाब के निकट रुक जाते हैं, ताकि पानी पी सकें। 
सूर्य को अपना दायित्व बोध याद आ जाता है कि वह रुक नहीं सकते, चाहे घोड़ा थककर भले ही रुक जाए। यात्रा को अनवरत जारी रखने के लिए तथा सृष्टि पर संकट नहीं आए इसलिए सूर्यदेव तालाब के समीप खड़े दो गधों को रथ में जोतकर यात्रा को जारी रखते हैं। गधे अपनी मंद गति से पूरे पौष मास में ब्रह्मांड की यात्रा करते रहे। इस कारण सूर्य का तेज बहुत कमजोर हो धरती पर प्रकट होता है। मकर संक्रांति के दिन पुनः सूर्यदेव अपने घोड़ों को रथ में जोतते हैं। तब उनकी यात्रा पुनः रफ्तार पकड़ लेती है। इसके बाद धरती पर सूर्य का तेजोमय प्रकाश बढ़ने लगता है।

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