Monday, February 16, 2026
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आईजीआईडीआर मुम्बई के प्रो. महेन्द्र देव ने कहा, कृषि कानूनों में हुए बदलाव किसानों के हित में

-बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में आयोजित कांफ्रेंस आन एग्रीकल्चरल मार्केटिंग

लखनऊ (हि.स.)। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के अर्थशास्त्र विभाग और इंडियन सोसाइटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल मार्केटिंग (आईएसएएम) के संयुक्त तत्वावधान में 34वें नेशनल कांफ्रेंस ऑन एग्रीकल्चरल मार्केटिंग का आयोजन किया गया। 
कांफ्रेंस के मुख्य वक्ता प्रो. महेंद्र देव, वीसी, आईजीआईडीआर, मुम्बई, ने भारतीय कृषि के बदलते स्वरूप, हाल ही में बदले कृषि कानूनों और एग्रीकल्चर मार्केटिंग रिफॉर्म पर भी बात की। उन्होंने कहा कि हाल ही में कृषि कानूनों से संबंधित जो भी बदलाव हुए हैं, जिसमें कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, प्राइवेट और फॉरेन इन्वेस्टमेंट की बात कही गई है, वह किसानों के हित में है।  उन्होंने खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में और अधिक काम करने और इस दिशा में किसानों को प्रशिक्षण देने का सुझाव भी दिया। छोटे किसानों को आधारिक संरचना और संस्थागत सहयोग प्रदान करने की बात कही। उन्होंने कृषि उपज विपणन समिति के नियमों और कानूनों के बारे में भी जानकारी प्रदान की।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र पर बोलते हुए विश्वविद्यालय कुलपति आचार्य संजय सिंह ने कहा कि कृषि उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराना आवश्यक है। यह किस प्रकार संभव होगा, कैसे किसान अपना उत्पाद बेचकर लाभ प्राप्त करे। इस विषय में किसानों के पास जानकारी होना आवश्यक है। आज इस विषय पर आयोजित यह कांफ्रेंस हर मायने में बेहद उपयोगी है। विश्वविद्यालय इस दिशा में हर संभव मदद करने के लिए तैयार है। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा गोद लिए गए 5 गांव और उसके सतत विकास के लिए विवि द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बारे में भी सभी को जानकारी दी। उन्होंने किसानों को विपणन के गुर सिखाने का सुझाव भी दिया और साथ ही पशुधन को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाए जिससे लाभ अर्जित किया जा सके, इसका भी प्रशिक्षण देने का सुझाव कुलपति  ने दिया।

अंजनी कुमार, डायरेक्टर, मंडी परिषद, लखनऊ, ने कहा कि हमें किताबी ज्ञान से उठकर व्यावहारिक कौशल सीखना चाहिए। हमें छोटे और सीमांत किसानों के विकास के लिए प्रयास करना चाहिए। किसानों की आय बढ़ाने के लिए हमें मंडी को किसानों की दहलीज तक ले जाना पड़ेगा। उन्होंने  ट्राईबल मार्केटिंग की बात पर जोर देते हुए कहा कि वे जनजातियां जो अभी भी जंगलो पर निर्भर हैं। उनके द्वारा तैयार उत्पाद को बाजार उपलब्ध कराना भी एक चुनौती है, हमें इस दिशा में भी प्रयास करना चाहिए, ताकि अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का भी कल्याण हो सके।

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